भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३१ १तत्प्रकाराणां गणनामाह— गणेशैः प्रथमो न्यासो द्वितीयस्तु ग्रहैर्मतः । नक्षत्रैश्च तृतीयः स्याद् योगिनीभिश्चतुर्थकः ॥९॥ राशिभिः पञ्चमो न्यासः षष्ठः पीठैर्निगद्यते । सुगमम् । न्यासं न्यासजातम्, जातावेकवचनम् । निर्वर्तयेदिति शेषः ॥९-१०॥ षोढा षट्प्रकारन्यास एकएव, तत्प्रकारं षोढान्यासमाहात्म्यं फलं चाह— षोढान्यासस्त्वयं प्रोक्तः सर्वत्रैवापराजितः ॥१०॥ एवं यो न्यस्तगात्रस्तु स पूज्यः सर्वयोगिभिः । नास्त्यस्य पूज्यो लोकेषु पितृमातृमुखो जनः ॥११॥ स एव पूज्यः सर्वेषां स स्वयं परमेश्वरः । षोढान्यासविहीनं यं प्रणमेदेष पार्वति ॥१२॥ सोऽचिरान्मृत्युमाप्नोति नरकं च प्रपद्यते । छः प्रकार के न्यास की ही अब गणना करते हैं— गणेशों से पहला न्यास, ग्रहों से दूसरा, नक्षत्रों से तीसरा, योगिनियों से चौथा, राशियों से पाचवाँ और पीठों से छठा न्यास किया जाता है ॥९-१०॥ इसका अर्थ स्पष्ट है । न्यास शब्द में एकवचन जाति का वाचक है । इससे इन छः न्यासों को करे, ऐसा अर्थ होगा । इस श्लोक में 'निर्वर्तयेत्' क्रिया का अध्याहार आठवें श्लोक से कर लिया जाता है ॥९-१०॥ षोढा न्यास की एक जाति है, अर्थात् इन सबको निर्दिष्ट क्रम के अनुसार एक साथ किया जाता है । अब इनकी पद्धति, माहात्म्य और फल का निरूपण किया जा रहा है— यह षोढा न्यास सर्वत्र अपराजेय माना गया है । आगे बताई गई विधि से जो इसका अनुष्ठान करता है, वह सभी योगियों का भी पूज्य बन जाता है । लोक में माता-पिता जैसे पूजनीय जन भी इसके लिये पूज्य नहीं रह जाते । वही सबका पूज्य हो जाता है । वह स्वयं परमेश्वर बन जाता है । हे पार्वति ! ऐसा योगी षोढा न्यास से हीन व्यक्ति को यदि प्रणाम कर दे, तो उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है और वह नरक में जाता है ॥१०-१३॥ १. तत्प्रकारमाह—ख. ने. ज. झ. उ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)