भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 297, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 297

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४७ चतुरस्रान्त्यरेखायां व्यापकमाह— न्यस्तव्याश्चतुरस्रान्त्यरेखायै नम इत्यपि ॥४७॥ विन्यसेद् व्यापकत्वेन पूर्वोक्तान्तेश्च विग्रहे। “चतुरस्रान्त्यरेखायै नमः” इति² मन्त्रेण। विग्रहे देहे। पूर्वोक्तान्तः पूर्वोक्तानां ब्राह्म्यादिस्थानानामन्तर्देशेषु व्यापकत्वेन न्यस्तव्याः। न्यासयोग्ये³ विन्य- सेत् ॥४७-४८॥ तस्यां चतुरस्रान्त्यरेखायां न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्याः स्थानेषु दशसु मुद्राणां दशकं न्यसेत् ॥४८॥ तस्याः चतुरस्रान्त्यरेखायाः। दशसु स्थानेषु त्रिखण्डामुद्रासहितानां⁴ संक्षोभिण्यादिमुद्राणां दशकं न्यसेत् ॥४८॥ तासां स्थानान्याह— ब्राह्मण्याद्यष्टस्थानां⁵न्तस्तासामष्टौ न्यसेत्⁶ ततः। शिष्टे द्वे द्वादशान्ते च पादाङ्गुष्ठे च विन्यसेत् ॥४९॥ चतुरस्र की अन्तिम रेखा में व्यापक न्यास बताते हैं— “चतुरस्रान्त्यरेखायै नमः” इस मन्त्र से पूर्वोक्त ब्राह्मी आदि शक्तियों के स्थान से बाद वाली अन्तिम रेखा में व्यापक न्यास करना चाहिये ॥४७-४८॥ “चतुरस्रान्त्यरेखायै नमः” इस मन्त्र से शरीर में पूर्वोक्त ब्राह्मी आदि शक्तियों के स्थान के बाद वाले स्थान में व्यापक न्यास के द्वारा आगे बताई गई शक्तियों का न्यास करना चाहिये ॥४७-४८॥ इस रेखा में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— चतुरस्र की इस अन्तिम रेखा के दस स्थानों में दस मुद्राओं का न्यास करना चाहिये ॥४८॥ उस चतुरस्र की अन्तिम रेखा के दस स्थानों में त्रिखण्डा मुद्रा के साथ अन्य संक्षोभिणी आदि ¹मुद्राओं का न्यास करना चाहिये ॥४८॥ इन मुद्राओं के विन्यास के स्थान ये हैं— इन दस मुद्राओं में से आठ का न्यास ब्राह्मणी आदि आठ शक्तियों के न्यास- १. न्तर—ने., स्ताश्च—छ., क्तानां च—उ.। २. इत्यादि—ज. झ. उ.। ३. योगेन न्य- क. ग. । ४. सहितसंक्षोभिण्यादिमुद्रादशकं—ख. उ.। ५. नामन्तर—छ. ज. । ६. प्रविन्य- सेत्—उ., न्यसेदथ—ख. ङ. च. छ. ज. झ. ।

  1. त्रिखण्डा आदि दस मुद्राओं का बाह्य और आन्तर स्वरूप क्रमशः नि० पो० (३।३-२७) तथा यो० हृ० (१।५७-७१) में देखना चाहिये।