भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२४८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तासां मुद्राणां मध्ये, अष्टौ१ मुद्रा ब्रह्माण्याद्यष्टस्थानानामन्तर्देशेष्वष्टसु विन्यसेत्२। शिष्टे द्वे मुद्रे३ द्वादशान्ते४ पादाङ्गुष्ठे च विन्यसेत्। द्वादशान्तं षोडशान्तेन्दुमण्डलादधः सूर्यमण्डलस्थानम् ' तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— षोडशान्तमिति ख्यातं व्योमस्थानेन्दुमण्डलम्। तदधःस्थानगं सूर्यबिम्बं द्वादशशक्तिकम् ॥ द्वादशान्त५मिति ख्यातं स्थितं व्योमप्रदेशकम्। इति तेन बिन्दुतत्त्वं चतुष्पत्राम्बुजं च तत् ॥ ६सूर्यबिम्बमधश्चोर्ध्वं सार्धैकाङ्गुलिदेशतः। इति७ रीत्या ललाटस्थानबिन्दुतत्त्वोपरि स्थितं सूर्यमण्डलस्थानं ललाटोर्ध्वं द्वादशान्तपदेन लक्ष्यते ॥४९॥ षोडशदलपद्मव्यापकमाह— तदन्तः षोडशदलपद्माय नम इत्यपि । विन्यस्य स्थान के अनुसार ही करना चाहिये। बाकी बची दो मुद्राओं को द्वादशान्त और पादाङ्गुष्ठ में विन्यस्त करे ॥४९॥ इन मुद्राओं में से आठ मुद्राओं का विन्यास ब्रह्माणी आदि शक्तियों के स्थानों के अन्तर्गत आठ स्थानों में करना चाहिये। बाकी बची दो मुद्राओं का विन्यास द्वादशान्त और पादाङ्गुष्ठ में किया जाय। षोडशान्त नामक चन्द्रमण्डल के नीचे स्थित सूर्यमण्डल के स्थान को द्वादशान्त कहते हैं। जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है— उस आन्तर आकाश में विराजमान चन्द्रमण्डल षोडशान्त के नाम से प्रसिद्ध है। उसके नीचे बारह शक्तियों से संवलित सूर्यमण्डल स्थित है। इस आकाश प्रदेश को द्वादशान्त कहते हैं। इसके नीचे चार दल वाले कमल में बिन्दुतत्त्व का निवास है और इसी से डेढ़ अंगुल ऊपर सूर्यबिम्ब स्थित है ॥ इसके अनुसार ललाटस्थित बिन्दुतत्त्व के ऊपर सूर्यमण्डल है। ललाट के ऊपर स्थित यह सूर्यमण्डल ही द्वादशान्त कहा जाता है ॥४९॥ षोडशदल पद्म का व्यापक न्यास बताते हैं— इन चतुरस्रों के भीतर “षोडशदलपद्माय नमः” इस मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥ १. अष्ट-क. ग. । २. विन्यस्य-ख. ने. . झ. । ३. 'मुद्रे' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. द्वादशान्तपादाङ्गुष्ठयोर्वि-ख. ने. ज. झ. । ५. न्तं स्मृतं तेन-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. सूर्यं बिन्दुमधश्चोर्ध्वं-ख. झ. उ. । ७. अनेन-ज. ।