भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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नतिपाण्योऽश्विनोपूर्वाः सर्वाभरणभूषिताः । एतास्तु विन्यसेद् देवि स्थानेष्वेषु सुरार्चिते ॥२९॥ कटिबन्ध इति कटिबन्धयोरिति द्वन्द्वपरम्। अन्यथा सप्तविंशतिसंख्या न घटते। कर्णद्वय इति दक्षिणादितः, "दक्षनेत्रे च वामे च" (३।२६) इति क्रमस्यो- पक्रान्तत्वात्। वरदाभयपाणयो नतिपाण्य इत्युक्त्या बाहुचतुष्टयं गम्यते। शेषं सुगमम् ॥२६-२९॥ योगिनीन्यासमाह— विशुद्धौ हृदये नाभौ स्वाधिष्ठाने च मूलके । आज्ञायां धातुनाथाश्च न्यस्तव्या डादिदेवताः ॥३०॥ अमृतादियुताः सम्यग् ध्यातव्याश्च सुरेश्वरि । पादे लिङ्गे च कुक्षौ च हृदये बाहुमूलयोः ॥३१॥ विशुद्धौ तालुमूले षोडशदलकमले। ¹हृदयेऽनाहते द्वादशदलकमले। नाभौ मणिपूरके दशदलकमले। स्वाधिष्ठाने षड्दलकमले। मूलके चतुर्दलकमले। आज्ञायां द्विदलकमले। धातवस्त्वगसृङ्मांसमेदो²मज्जाशुक्राणि, तेषां नाथाः करना चाहिये। सभी अश्विनी आदि नक्षत्र जलते हुए कालानल के समान हैं। इनके दो हाथ वर और अभय मुद्रा से सुशोभित हैं और बाकी के दो हाथ प्रणाम की मुद्रा में हैं ॥२६-२९॥ कटिबन्ध में एकवचन दोनों कटिबन्धों का सूचक है। इसके बिना स्थानों की सत्ताईस संख्या पूरी नहीं हो सकती। कर्णद्वय इत्यादि स्थलों पर पहले दक्षिण तब बाद में वाम भाग में न्यास किया जाता है। नेत्र के प्रसंग में इस क्रम को यहीं (३।२६) बताया गया है, अतः अन्यत्र भी इसी क्रम का अनुसरण करना उचित है। वरदाभयपाणि और नतिपाणि विशे- षणों से इनके चार हाथ हैं, यह सिद्ध होता है। बाकी पदों का अर्थ स्पष्ट है ॥२६-२९॥ अब योगिनीन्यास का उपदेश करते हैं— विशुद्धि, हृदय, नाभि, स्वाधिष्ठान, मूलाधार और आज्ञा चक्रों में छः धातुओं की स्वामिनी डाकिनी आदि योगिनियों का विन्यास करना चाहिये। अमृता आदि देवियों के साथ इनका ध्यान भी करना चाहिये। पाद, लिङ्ग, कुक्षि, हृदय और दोनों बाहुमूलों में इनका न्यास किया जाता है ॥३०-३१॥ तालुमूलस्थित षोडशदल कमल को विशुद्धि, हृदयस्थित द्वादशदल कमल को अनाहत, नाभिस्थित दशदल कमल को मणिपूरक, षड्दल कमल को स्वाधिष्ठान और चतुर्दल कमल को मूलाधार कहते हैं। आज्ञाचक्र में द्विदल कमल है। त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, १. 'हृदये''''द्विदलकमले' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. मेदोऽस्थि-सार्वत्रिको पाठः।