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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

नतिपाण्योऽश्विनोपूर्वाः सर्वाभरणभूषिताः । एतास्तु विन्यसेद् देवि स्थानेष्वेषु सुरार्चिते ॥२९॥ कटिबन्ध इति कटिबन्धयोरिति द्वन्द्वपरम्। अन्यथा सप्तविंशतिसंख्या न घटते। कर्णद्वय इति दक्षिणादितः, "दक्षनेत्रे च वामे च" (३।२६) इति क्रमस्यो- पक्रान्तत्वात्। वरदाभयपाणयो नतिपाण्य इत्युक्त्या बाहुचतुष्टयं गम्यते। शेषं सुगमम् ॥२६-२९॥ योगिनीन्यासमाह— विशुद्धौ हृदये नाभौ स्वाधिष्ठाने च मूलके । आज्ञायां धातुनाथाश्च न्यस्तव्या डादिदेवताः ॥३०॥ अमृतादियुताः सम्यग् ध्यातव्याश्च सुरेश्वरि । पादे लिङ्गे च कुक्षौ च हृदये बाहुमूलयोः ॥३१॥ विशुद्धौ तालुमूले षोडशदलकमले। ¹हृदयेऽनाहते द्वादशदलकमले। नाभौ मणिपूरके दशदलकमले। स्वाधिष्ठाने षड्दलकमले। मूलके चतुर्दलकमले। आज्ञायां द्विदलकमले। धातवस्त्वगसृङ्मांसमेदो²मज्जाशुक्राणि, तेषां नाथाः करना चाहिये। सभी अश्विनी आदि नक्षत्र जलते हुए कालानल के समान हैं। इनके दो हाथ वर और अभय मुद्रा से सुशोभित हैं और बाकी के दो हाथ प्रणाम की मुद्रा में हैं ॥२६-२९॥ कटिबन्ध में एकवचन दोनों कटिबन्धों का सूचक है। इसके बिना स्थानों की सत्ताईस संख्या पूरी नहीं हो सकती। कर्णद्वय इत्यादि स्थलों पर पहले दक्षिण तब बाद में वाम भाग में न्यास किया जाता है। नेत्र के प्रसंग में इस क्रम को यहीं (३।२६) बताया गया है, अतः अन्यत्र भी इसी क्रम का अनुसरण करना उचित है। वरदाभयपाणि और नतिपाणि विशे- षणों से इनके चार हाथ हैं, यह सिद्ध होता है। बाकी पदों का अर्थ स्पष्ट है ॥२६-२९॥ अब योगिनीन्यास का उपदेश करते हैं— विशुद्धि, हृदय, नाभि, स्वाधिष्ठान, मूलाधार और आज्ञा चक्रों में छः धातुओं की स्वामिनी डाकिनी आदि योगिनियों का विन्यास करना चाहिये। अमृता आदि देवियों के साथ इनका ध्यान भी करना चाहिये। पाद, लिङ्ग, कुक्षि, हृदय और दोनों बाहुमूलों में इनका न्यास किया जाता है ॥३०-३१॥ तालुमूलस्थित षोडशदल कमल को विशुद्धि, हृदयस्थित द्वादशदल कमल को अनाहत, नाभिस्थित दशदल कमल को मणिपूरक, षड्दल कमल को स्वाधिष्ठान और चतुर्दल कमल को मूलाधार कहते हैं। आज्ञाचक्र में द्विदल कमल है। त्वचा, रक्त, मांस, मेदा, १. 'हृदये''''द्विदलकमले' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. मेदोऽस्थि-सार्वत्रिको पाठः।

२३८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः स्वामिन्यः। दादिदेवताः डाकिनीराकिनीलाकिनीकाकिनीसाकिनीहाकिन्यः। अमृतादियुताः स्वच्छन्दसंग्रहोक्ताः। यथा— अमृता प्रथमा देवी द्वितीयाकर्षिणी मता। इन्द्राणी च तृतीया स्यादींशानी तु चतुर्थिका॥ पञ्चमी स्यादुमा देवी षष्ठी चैवोर्ध्वकेशिनी। सप्तमी ऋद्धिदा प्रोक्ता ऋषा चाष्टमिकी मता॥ लृका नवमिका प्रोक्ता लृषा स्याद् दशमी तथा। एकादशी^१ यथा चैकपादा द्वादशिका शिवे॥ ऐश्वर्याभिरता पश्चादोङ्कारी तु त्रयोदशी। चतुर्दशी^२ चौषधात्मा पञ्चाधिकदशाऽम्बिका॥ षोडशी त्वःक्षरा देवी प्रोक्ताः षोडश ^३कण्ठगाः। कालरात्रिश्च खातीता गायत्री च ततः परम्॥ घण्टाधारी च ङार्णात्मा चण्डा छाया जयाऽपि च। झङ्कारी ज्ञानरूपा च टङ्कहस्ता ततः परम्॥ ठङ्कारी द्वादश ह्येता द्वादशारे समर्चयेत्। ^४डामरी चैव ढङ्कारी ^५णामिनी तामसी तथा॥ मज्जा और शुक्र ये छः ^१धातुएं हैं। इनकी स्वामिनियां है दादि देवता, अर्थात् डाकिनी, राकिनी, लाकिनी, काकिनी, साकिनी और हाकिनी नामक योगिनियां। अमृता आदि देवियों के नाम स्वच्छन्दसंग्रह में बताये गये हैं। जैसे कि— ^२अमृता पहली देवी है। दूसरी आकर्षिणी मानी गई है। तीसरी इन्द्राणी और चौथी ईशानी है। पाँचवीं उमा देवी और छठी ऊर्ध्वकेशिनी है। सातवीं का नाम ऋद्धिदा और आठवीं का ऋषा है। नवमी लृका तथा दसवीं लृषा है। एकपादा ग्यारहवीं है और हे शिवे ! ऐश्वर्याभिरता बारहवीं तथा ओङ्कारी तेरहवीं देवी है। औषधात्मा चौदहवीं और पन्द्रहवीं देवी अम्बिका है। सोलहवीं अःक्षरा देवी है। ये सभी सोलह देवियां कण्ठ, अर्थात् तालुगत विशुद्धिचक्र में विन्यस्त की जाती हैं। कालरात्रि, खातीता, गायत्री, घण्टाधारी, ङार्णात्मा, चण्डा, छाया, जया, झङ्कारी, ज्ञानरूपा, टङ्कहस्ता और १. शीति सा-उ. । २. दंश्योष-ख. ने. झ. उ. । ३. शक्तयः-क. ग. । ४. डाकिनीं- क. ग. ने. ज. । ५. णादिनीं-ने. । १. पृ० १९० की टिप्पणी देखिये। स्वच्छन्दसंग्रह के इस लम्बे उद्धरण में छः चक्रों और उनकी अधिष्ठात्री योगिनियों की चर्चा है। २. पहले (१।२५-२६) अकुल आदि शब्दों की व्याख्या के प्रसंग में स्वच्छन्दसंग्रह के इसी उद्धरण के आधार पर टिप्पणी में वरदा आदि शक्तियों के नाम दिये गये हैं।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २३९ थान्तां दाक्षायणीं चैव धात्रीं १नन्दां च पार्वतीम् । २फट्कारीं दशपत्रेषु पूर्वादीशान्तिमं यजेत् ॥ बन्धि(न्दि)नीं भद्रकालीं च महामायां यशस्विनीम् । रक्तां लम्बोष्ठिकां चैव पूजयेत् क्रमशः प्रिये ॥ चतुष्पत्रे च देवेशि वरदां च श्रियं तथा। षष्ठां सरस्वतीं चैव पूजयेत् क्रमशः शिवे ॥ क्षमां हंसवतीं चैव पूजयेच्च ३द्विपत्रके। ४एताभिः शक्तिभिर्युक्ता ध्यातव्याश्च सुरेश्वरि ॥ (इति ।) ५"न्यासं निर्वर्तयेत्” (३।८) इत्ययमान्तरो न्यासः । ६ध्यानं त्वागमान्तरा- दवगन्तव्यम् ॥३०-३१॥ राशिन्यासमाह— दक्षिणं ७पादमारभ्य वामपादावसानकम् । मेषादिराशयो वर्णैर्न्यस्तव्या सह पर्वति ॥३२॥ ठङ्कारी ये बारह देवियाँ हृदयस्थित द्वादशदल कमल में विन्यस्त की जाती हैं। डामरी, ढङ्कारी, णामिनी, तामसी, थान्ता, दाक्षायणी, धात्री, नन्दा, पार्वती, फट्‍कारी ये दस देवियाँ नाभिस्थित दशार पद्म में विन्यस्त की जाती हैं। पूर्व से लेकर ईशान पर्यन्त इनका यजन किया जाना चाहिये । बन्धि(न्दि)नी, भद्रकाली, महामाया, यशस्विनी, रक्ता, लम्बोष्ठिका, इन छः देवियों को हे प्रिये ! स्वाधिष्ठान नामक षड्दल कमल में विन्यस्त करना चाहिये । हे शिवे ! हे देवेशि ! चतुष्पत्र आधार कमल में वरदा, श्री, षण्ढा और सरस्वती इन चार देवियों का यजन करना चाहिये । क्षमा और हंसवती को दो दल वाले आज्ञाचक्र में विन्यस्त करना चाहिये । इन शक्तियों के साथ क्रमशः डाकिनी प्रभृति योगिनियों का ध्यान करना चाहिये ॥ न्यास का विधान करने वाला (३।८ से प्रारंभ हुआ ) यह प्रकरण आन्तर न्यास का वर्णन करता है । ध्यान तो दूसरे आगमों से जानना चाहिये ॥३०-३१॥ राशिन्यास की पद्धति यह है— हे पर्वति ! दाहिने पैर से लेकर वाम पाद पर्यन्त स्थानों में मेष आदि राशियों का वर्णों के साथ न्यास करना चाहिये ॥३२॥ १. नादां-ने. ज. झ. उ. । २. फेत्कारीं-ख. झ. उ. । ३. द्विपत्रयोः-क. ग. ज. । ४. छ.ज.मातृकयोः श्लोकार्धोऽयं मूले स्थाप्यते । ५. न्यासं निर्वर्त्य एवं मातरो ध्यातव्या अपीत्यर्थः । ध्यानं निर्वर्त्यायमान्तरो न्यास इत्यर्थः-ख. ने. झ. उ., अमृतादीनां ध्याना- नन्तरं न्यास इत्यर्थः-ज. । ६. ध्यानमागमा-क. ग. उ. । ७. पार्श्वं-क. च. छ. ज. ८. पार्वति-क. ख. च. छ. ज. झ. उ.

२४० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः पादादिस्थानेषु दक्षिणादितो वामान्तम् । मेषादिराशयः$^१$ मेषवृषमिथुन- कर्कसिंहकन्यातुलावृश्चिकधनुर्मकरकुम्भमीनाः । वर्णैर्मातृकाक्षरैः सह न्यस्तव्याः । राशीनां वर्णा आगमान्तरसंवादान्मयोच्यन्ते— आद्यैश्चतुर्भिः सहितो मेषो दक्षपदे$^२$ऽक्षरैः । उकाराद्यैस्त्रिभिर्वर्णैर्वृषभो लिङ्गदक्षिणे ॥ ऋकाराद्यैस्त्रिभिर्वर्णैर्मिथुनं कुक्षिदक्षिणे । एऐभ्यां कर्कटो राशियुक्तो$^३$ वक्षसि दक्षिणे ॥ ओऔभ्यां सहितः सिंहो दक्षिणबाहुमूलके । अंअःशवर्गकैः कन्या $^४$शिरोदक्षिणभागतः ॥ कवर्गण तुला मूर्ध्नि वामे तद्बाहुमूलके । वृश्चिकश्च चवर्गेण टवर्गेण धनुर्हृदि ॥ वामे तवर्गसंयुक्तो मकरः कुक्षिवामतः । पवर्गेण पुनः कुम्भो $^५$लिङ्गवामप्रदेशतः ॥ यवर्गः क्षार्णसंयुक्तो $^६$मीनाख्यो वामपादके । इति ॥३२॥

पैर आदि स्थानों में दक्षिण भाग से आरम्भ कर वाम भाग पर्यन्त मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन इन बारह राशियों का मातृका वर्णों के साथ विन्यास करना चाहिये । अन्य आगम के प्रमाण से यहाँ $^१$राशियों के वर्णों का उल्लेख किया जा रहा है— अकार आदि चार अक्षरों के साथ दाहिने पैर में मेष राशि का, उकार आदि तीन वर्णों के साथ लिंग के दक्षिण भाग में वृष का, ऋकार आदि तीन वर्णों के साथ कुक्षि के दक्षिण में मिथुन का, ए और ऐ से संयुक्त कर्क राशि का वक्ष (हृदय) के दक्षिण में, ओ और औ के साथ सिंह का बाहुमूल के दक्षिण में, अं और अः वर्णों के साथ कन्या का शिर के दाहिने भाग में न्यास करना चाहिये । कवर्ग के साथ तुला का शिर के बायें भाग में, चवर्ग के साथ वृश्चिक का बाहुमूल के वाम भाग में, टवर्ग के साथ धनु का हृदय के वाम भाग में, तवर्ग के साथ मकर का कुक्षि के वाम भाग में, पवर्ग के साथ कुम्भ का लिंग के वाम भाग में और यकार से क्षकार पर्यन्त अक्षरों के साथ मीन का बायें पैर में न्यास करना चाहिये ।।३२।।

१. इतः परम्—'मेषादिमीनान्ताः' इत्यधिकं-क. ग. । २. दे स्वरैः-क. ग. । ३. युंतो-ख. ने. झ. उ. । ४. शिखा-ख. ने. झ. उ. । ५. वामे लिङ्ग-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. मीनः स्यात्-ख ने. ज. झ. उ. । १. प्रपंचसार (४।३४-३७) में यह विषय वर्णित है । लगता है, अमृतानन्द ने ऐसे ही आगमों की सहायता से इस विषय को स्वलिखित श्लोकों में संगृहीत कर दिया है ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४१ पीठन्यासमाह— पीठानि विन्यसेद् देवि मातृकास्थानके पुनः१ । मातृकास्थानक इति जातावेकवचनम् । वैखरीवर्णस्थानेष्वित्यर्थः ॥ ननु कानि तानि पीठानीत्यत आह— तेषां नामानि कथ्यन्ते शृणुष्वावहिता प्रिये२ ॥३३॥ बहुत्वात् पीठानां पीठनाम्नां धर्तुमशक्यत्वादत्यन्तसावधाना भवेत्यर्थः ॥३३॥ तन्नामान्याह— कामरूपं वाराणसीं नेपालं पौण्ड्रवर्धनम् । पुर३स्थिरं कान्यकुब्जं पूर्णशैलं तथार्बुदम् ॥३४॥ आम्रातकेश्वर५काम्रे त्रिस्रोतः कामकोटकम् । कैलाशं भृगुनगरं केदार४पूर्णचन्द्रके ॥३५॥ श्रीपीठमोड्ड्रारपीठं जालन्ध्रं६ मालवोत्कले७ । ८कुलान्तं देविकोट्टं च गोकर्णं मारुतेश्वरम् ॥३६॥ अब पीठन्यास बताते हैं— हे देवि ! मातृका के वैखरी वर्णों में पीठों का न्यास करे ॥ ‘मातृकास्थानके’ यहाँ एकवचन जातिवाचक है। इसका अर्थ होगा कि मातृका के वैखरी वर्णों के जो स्थान हैं, उन्हीं स्थानों में पीठों का भी न्यास करे ॥ वे पीठ कौन-कौन से हैं, इस विषय में कहते हैं— हे प्रिये ! अब मैं उनके नाम बता रहा हूँ। तुम सावधान होकर सुनो ॥३३॥ पीठ बहुत से हैं, उनके अनेक नाम हैं। इनको याद रख पाना कठिन है, अतः बहुत सावधान होकर तुम इनके नाम सुनो ॥३३॥ अब पीठों के नाम बताये जा रहे हैं— कामरूप, वाराणसी, नेपाल, पौण्ड्रवर्धन, पुरस्थिर, कान्यकुब्ज, पूर्णशैल, अर्बुद, आम्रातकेश्वर, एकाम्र, त्रिस्रोत, कामकोटक, कैलाश, भृगुनगर, केदार, पूर्णचन्द्रक, श्रीपीठ, ओड्ड्रारपीठ, जालन्धर, मालव, उत्कल, कुलान्त, देविकोट्ट, १. न्यासवत्-ने. छ. ज. । २. प्रिये-ने. च. छ. ज. झ. । ३. चरस्थिरं-क. ग. ड. । ४. रं चन्द्रपुष्करम्-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ५. मेकपादं च-च. ज. झ., मेकवी- राख्यं-छ. उ. । ६. जालाख्यं-ख. ने. छ. ज. झ. उ. । ७. वं तथा-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ८. कुलमट्टं च-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । १६

२४२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः अट्टहासं च विरजं राजगृहं¹ महापथम् । कोलापुरमेलापुरं ²कालेशं तु जयन्तिका ॥३७॥ उज्जयिनीं³ विचित्रं च क्षीरकं हस्तिनापुरम् । ओड्डीशं च प्रयागाख्यं षँष्ठी मायापुरी तथा ॥३८॥ जलेशं मलयं शैलं मेरुं गिरिवरं तथा । माहेन्द्रं वामनं चैव हिरण्यपुरमेव च ॥३९॥ महालक्ष्मीपुरोड्याणे छायाछैत्रमतः परम् । एते पीठाः समुद्दिष्टा मातृकारूपकाः स्थिताः ॥४०॥ एते पीठाः समुद्दिष्टा गृहीतनामानः पीठाः । मातृकारूपकाः स्थिताः मातृका रूपं येषां ते मातृकारूपकाः । क्रमेणादिक्षान्तानामेकैकं वर्णमेकैकस्यादावुक्त्वा तत्त- द्वर्ण⁶स्थानेषु पीठानां न्यासं कुर्यादित्यर्थः । [⁷पीठानां मातृकामयताकथनं गणेशा- दीनामप्युपलक्षणम् । वर्गवर्णानामादौ वैखर्यक्षराण्यागमान्तरसंवादाद् विभज्य योज्यानीत्यर्थः] ॥३४-४०॥ गोकर्ण, मारुतेश्वर, अट्टहास, विरज, राजगेह, महापथ, कोलापुर, एलापुर, कालेश, जयन्तिका, उज्जयिनी, चित्रा, क्षीरक, हस्तिनापुर, ओड्डीश, प्रयाग, षष्ठी, मायापुर, जलेश, मलयशैल, मेरुगिरि, माहेन्द्र, वामन, हिरण्यपुर, महालक्ष्मीपुर, ओडयाण, छायाछत्र—ये पचास पीठ हैं। मातृकाओं के साथ इनका न्यास किया जाता है ॥३४-४०॥ इस तरह से यहाँ ¹पचास पीठों के नाम बताये गये हैं। ये सब मातृका वर्णों के ही प्रतिरूप हैं, अर्थात् वैखरी मातृका के एक-एक वर्ण से एक-एक पीठ की उत्पत्ति हुई है, अतः इन पीठों में वर्ण प्रतिबिम्बित हैं। इसीलिये क्रमशः अकार से क्षकार पर्यन्त एक- एक वर्ण का उच्चारण कर उन-उन वर्णों के स्थानों में ही इन पीठों का भी न्यास करना चाहिये । [पीठों को जैसे यहाँ मातृकामय कहा है, उसी तरह से गणेश, ग्रह, नक्षत्र आदि की भी मातृकामयता माननी चाहिये । वर्ग वर्णों के आरंभ में वैखरी वर्णों के संयो- जन की विधि अन्य आगमों से जाननी चाहिये] ॥३४-४०॥ १. गेहं-क. ग.। २. ओड्डारं-च. छ. ज. झ.। ३. न्यपि चित्रा च-क. ग., चित्राख्यं- ड. । ४. षष्ठं मायापुरं-क. ग. । ५. पुर-ड. उ. । ६. 'वर्ण' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । ७. 'पीठानां ॰॰॰नीयर्थः' नास्ति-ख. ज. झ. ब. उ. । १. पीठ ५० है या ५१, इस विषय में अपनी व्याख्या में भास्करराय ने अन्तिम पक्ष का समर्थन किया है। उपोद्घात में इस विषय पर विचार करने का प्रयत्न किया जायगा।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४३ षोढान्यासानन्तरं श्रीचक्रन्यासस्याऽवश्यंभावित्वात् तदिदानीं श्रीचक्रन्यास- माह— एवं षोढा पुरा¹ कृत्वा श्रीचक्रन्यासमाचरेत् । एवम् उक्तप्रकारेण, षोढा षट्प्रकारं न्यासम्, पुरा¹ कृत्वा, पश्चात् श्रीचक्र- न्यासमाचरेदित्यर्थः ॥४१॥ श्रीचक्रन्यासस्य महाप्रयोजनत्वादनन्यकथितमप्यद्य प्रियायै कथयामीत्याह— श्रीमत्त्रिपुरसुन्दर्याश्चक्रन्यासं शृणु प्रिये ॥४१॥ यन्न कस्यचिदाख्यातं तनुशुद्धिकरं परम् । आनन्द²कणभिक्षार्थं शब्दस्पर्शादिपक्कणे । अटत्यविरतं येन तद्दारिद्र्यं विदुर्बुधाः ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या संकोचलक्षणदारिद्र्यविघातिनी³ परिपूर्णपरानन्द- रूपा सम्पत् श्रीरित्युच्यते । तद्वती त्रिपुरसुन्दरी । त्रिपुरा तुरीयरूपत्वात्, सुन्दरी षोढान्यास के बाद चक्रन्यास का अनुष्ठान अवश्य किया जाता है। इसलिये अब चक्रन्यास का वर्णन करते हैं— इस तरह से पहले षोढान्यास करके तब श्रीचक्र का न्यास करे ॥४१॥ ऊपर बताई गई विधि से गणेश, ग्रह, नक्षत्र आदि के भेद से वर्णित छः प्रकार के न्यासों को पहले करके बाद में श्रीचक्रन्यास करना चाहिये ॥४१॥ यह श्रीचक्रन्यास बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, अब तक इसका उपदेश किसी को नहीं किया गया था, अब भगवती को उसका उपदेश किया जा रहा है— हे प्रिये ! भगवती श्रीमती त्रिपुरसुन्दरी के इस चक्रन्यास को तुम सुनो । इसको अब तक मैंने किसी को नहीं बताया है। यह उत्कृष्ट न्यास साधक के शरीर को पवित्र बना देता है ॥४१-४२॥ आनन्द के एक कण की भीख माँगने के लिये व्यक्ति शब्द, स्पर्श रूपी कोल-भीलों की बस्ती में निरन्तर भटकता रहता है । विद्वानों की दृष्टि में मनुष्य की वास्तविक दरिद्रता यही है ।। किसी ¹प्रामाणिक व्यक्ति का यह कथन है । व्यक्ति का यह संकुचित स्वरूप ही सबसे बड़ी दरिद्रता है । इस दारिद्र्य को दूर करने वाली परिपूर्ण परमानन्द स्वरूपिणी १. पुरः-क. ग. । २. कन्द-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. निर्वर्तिनी-ख. ने. झ. उ. ।

  1. ऋजुविमर्शिनीकार शिवानन्द ने इसको भट्ट गंगाधर मिश्र के वचन के रूप में उद्धृत किया है (पृ० ६९) । वहीं (पृ० १३४) भट्ट गंगाधर के किसी स्तोत्र का भी उल्लेख मिलता है । हो सकता है ये सभी श्लोक उस स्तोत्र ग्रन्थ के ही हों ।

२४४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः भेदंलक्षणप्रपञ्चापरपर्यायपरमदौर्भाग्यपरिपन्थिपरमाद्वैतसौभाग्यपदाधिरूढा सर्व- प्राणिष्वात्मतया परमप्रेमास्पदीभूता परचित्कला । तस्याश्चक्रं शिवादिक्षितिपर्यन्त- ^१तत्त्वमयम्, तदाविर्भाव(भूमिः?मिम्) । ^२त(स्या?स्य) न्यासं शृणु प्रिये । प्रियायै मदेकरस्यलालसायै कथयामि । यन्न कस्यचिदाख्यातम्, अतिरहस्यत्वात् । ^३श्री- चक्रन्यासस्य महाप्रयोजनत्वादनन्यकथितमपि प्रियायै ते कथयामीत्यर्थः । तनुशुद्धि- करं परम् । तनोः षट्त्रिंशत्तत्त्वात्मनः शुद्धिं परचित्पर्यवसानलक्षणां करोति । अतः एव परमुत्कृष्टमितरन्यासेभ्यः ॥४१-४२॥ श्रीचक्रन्यासप्रकारमाह— चतुरस्राद्यरेखायै नम इत्यादितो न्यसेत् ॥४२॥ दक्षांसपृष्ठपाण्यग्रस्फिक्कपादाङ्गुलीष्वथ । वामाङ्घ्यङ्गुलीषु स्फिक्के पाण्यग्रे चांसपृष्ठके ॥४३॥ सचूलीमूलपृष्ठेषु^४ व्यापकत्वेन सुन्दरि । सम्पत्ति ही यहाँ श्री कही गई है । यह श्री भगवती त्रिपुरसुन्दरी ही है । तीन रूपों से ऊपर तुरीय स्वरूपिणी देवी त्रिपुरा है और भेद (द्वैत) रूप में भासित हो रहे इस प्रपंच (जगत्) रूपी परम दुर्भाग्य का नाश कर परम अद्वैत स्वरूप सौभाग्य को देने वाली, सभी प्राणियों में अपनी-अपनी आत्मा के रूप में प्रतीत हो रही, परम प्रेम से ओतप्रोत यह परचित्कला ही सुन्दरी है। इस भगवती त्रिपुरसुन्दरी के चक्र से ही शिव से पृथिवी पर्यन्त तत्त्वमय जगत् का आविर्भाव होता है । हे प्रिये ! उस श्रीचक्र के न्यास को अब तुम सुनो । मेरे साथ एकरस होने की लालसावाली प्रिया को अब मैं इसका उपदेश कर रहा हूँ । इस विषय के अत्यन्त रहस्यपूर्ण होने से ही इसे अब तक किसी को नहीं सुनाया था । यह श्रीचक्र न्यास अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, अतः यद्यपि अब तक इसको किसी को नहीं बताया गया, किन्तु अब तुमको मैं इसका उपदेश कर रहा हूं। यह न्यास ३६ तत्त्वों वाले शरीर को पर चित्कला में लीन करके उसको निर्मल बना देता है । इसीलिये अन्य न्यासों की अपेक्षा यह उत्तम है ॥४१-४२॥ अब इस श्रीचक्रन्यास की विधि बताते हैं— “चतुरस्राद्यरेखायै नमः” इस मन्त्र से सबसे पहले दाहिने कन्धे के पिछले हिस्से में, दाहिने हाथ की अंगुलियों में, दक्षिण नितम्ब भाग में, दाहिने पैर की अंगुलियों में, बायें पैर की अंगुलियों में, वाम नितम्ब भाग में, बायें हाथ की अंगुलियों में, बायें कन्धे के पीछे तथा सिर के आगे के और पीछे के हिस्से में— इस तरह से इन दस स्थानों में हे सुन्दरि ! व्यापक न्यास करना चाहिये ॥४२-४४॥ १. तत्त्वचक्रमयं तदविनाभाव-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'तस्या' नास्ति-क. ग. । ३. 'श्रीचक्र ... यामीत्यर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. 'सुन्दरि' इत्यादिकं नास्ति-क.

तृतीयः ] दीपिकभाषानुवादसहितम् २४५ “चतुरस्राद्यरेखायै नमः" इति¹ मन्त्रेण आदितो दक्षांसपृष्ठादिचूलीपृष्ठान्त- स्थानेषु दशसु व्यापकत्वेन न्यसेत् । दक्षांसस्य पृष्ठं पश्चाद्भागः । सचूलीमूलेति । मूलं शिरसः पुरस्ताद्भागः । पृष्ठं शिरसः पश्चाद्भागः । स्फिग्वेव स्फिक्कम् ²ऊरु- सन्धिः । स्पष्टमन्यत् ॥४२-४४॥ एषु स्थानेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— अत्रैव स्थानदशकेऽणिमाद्या दश न्यसेत् ॥४४॥ सिद्धीः अणिमालघिमामहिमेशितावशित्वप्राकाम्यभुक्तीच्छाप्राप्तिसर्वकामाख्याः सिद्ध- योऽणिमाद्या दश ॥४४-४५॥ चतुरस्रमध्यरेखायां व्यापकमाह— तदन्तश्च तनुव्यापकत्वेन सुन्दरि । चतुरस्रमध्यरेखायै नम इत्यपि वल्लभे ॥४५॥ ³विन्यसेत् “चतुरस्राद्यरेखायै नमः" इस मन्त्र से प्रथमतः दाहिने कन्धे के पृष्ठ भाग से लेकर चूली (सिर) के पृष्ठ भाग पर्यन्त दस स्थानों में व्यापक न्यास करे । दाहिने कन्धे का पृष्ठ पिछला भाग है। मूल का अर्थ सिर का अगला भाग और पृष्ठ पिछला हिस्सा है। स्फिक् के लिये ही स्फिक्वक शब्द प्रयुक्त है । इसका अर्थ ऊरु सन्धि अर्थात् नितम्ब भाग है । बाकी शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥४२-४४॥ इन स्थानों में जिन शक्तियों का विन्यास करना है, अब उनको बताया जा रहा है— इन्हीं दस स्थानों में अणिमा आदि दस सिद्धियों का न्यास करना चाहिये ॥४४-४५॥ अणिमा, लघिमा, महिमा, ईशिता, वशिता, प्राकाम्य, भुक्ति, इच्छा, प्राप्ति और सर्वकामा—ये दस सिद्धियाँ हैं ॥४४-४५॥ चतुरस्र की मध्यरेखा में व्यापक न्यास इस तरह से किया जाता है— हे सुन्दरि ! वल्लभे ! इसके अन्दर की मध्यरेखा में “चतुरस्रमध्यरेखायै नमः" इस मन्त्र से पूरे शरीर में व्यापक न्यास करे ॥४५-४६॥ १. इत्यादि-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'ऊरुसन्धिः' नास्ति-क. ग. ने. । ३. विन्यस्य- ख. छ. ज., तस्याः-क. ग. ।

२४६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तदन्तः सिद्धिस्यानानामन्तर्देशे "चतुरस्रमध्यरेखायै नमः" १इति मन्त्रेण तनुव्यापकत्वेन विन्यसेदित्यन्वयः२ ॥४५-४६॥ चतुरस्रमध्यरेखायां न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्याः३ स्थानेषु ब्रह्माण्याद्यास्तथाऽष्टसु । तस्याः चतुरस्रमध्यरेखायाः । अष्टसु स्थानेषु । ब्रह्माण्याद्या ब्रह्माणीमाहे- श्वरीकौमारीवैष्णवीवाराहीन्द्राणीचामुण्डामहालक्ष्मीः । तथा विन्यसेदित्य- न्वयः ॥४६॥ तासां स्थानाष्टकमाह— पादाङ्गुष्ठद्वये पार्श्वे दक्षे मूर्ध्नोऽन्यैपार्श्वके ॥४६॥ वामदक्षिणजान्वोश्च बहिरांसद्वये तथा। स्पष्टम्५ ॥४६-४७॥ इसके अन्दर, अर्थात् दस सिद्धियों का जहाँ विन्यास किया गया, उस रेखा से बाद की मध्य रेखा में "चतुरस्रमध्यरेखायै नमः" इस मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥४५-४६॥ चतुरस्र की मध्यरेखा में इन शक्तियों का न्यास करना चाहिये— उस चतुरस्र रेखा के आठ स्थानों में ब्रह्माणी आदि आठ शक्तियों का न्यास करना चाहिये ॥४६॥ उस चतुरस्र की मध्यरेखा के आठ स्थानों में ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा और महालक्ष्मी—इस आठ शक्तियों का न्यास करना चाहिये ॥४६॥ इनके आठ स्थानों को अब बताते हैं— पैरों के दोनों अंगूठों में, सिर के दाहिने और बायें भाग में, वाम और दक्षिण जानुओं (घुटनों) में तथा दोनों कन्धों के बाहरी भागों में इनका न्यास किया जाता है ॥४६-४७॥ इस श्लोक का अर्थ स्पष्ट है ॥४६-४७॥ १. इत्यादि-ख. ज. झ. उ. । २. दित्यर्थः-क. ग. ने. झ. । ३. स्थानेषु विन्यस्य- क. ग. ने. झ.। ४. मूर्धन्य-क. ग. ने. झ. । ५. स्पष्टमेतत्-ज.।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४७ चतुरस्रान्त्यरेखायां व्यापकमाह— न्यस्तव्याश्चतुरस्रान्त्यरेखायै नम इत्यपि ॥४७॥ विन्यसेद् व्यापकत्वेन पूर्वोक्तान्तेश्च विग्रहे। “चतुरस्रान्त्यरेखायै नमः” इति² मन्त्रेण। विग्रहे देहे। पूर्वोक्तान्तः पूर्वोक्तानां ब्राह्म्यादिस्थानानामन्तर्देशेषु व्यापकत्वेन न्यस्तव्याः। न्यासयोग्ये³ विन्य- सेत् ॥४७-४८॥ तस्यां चतुरस्रान्त्यरेखायां न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्याः स्थानेषु दशसु मुद्राणां दशकं न्यसेत् ॥४८॥ तस्याः चतुरस्रान्त्यरेखायाः। दशसु स्थानेषु त्रिखण्डामुद्रासहितानां⁴ संक्षोभिण्यादिमुद्राणां दशकं न्यसेत् ॥४८॥ तासां स्थानान्याह— ब्राह्मण्याद्यष्टस्थानां⁵न्तस्तासामष्टौ न्यसेत्⁶ ततः। शिष्टे द्वे द्वादशान्ते च पादाङ्गुष्ठे च विन्यसेत् ॥४९॥ चतुरस्र की अन्तिम रेखा में व्यापक न्यास बताते हैं— “चतुरस्रान्त्यरेखायै नमः” इस मन्त्र से पूर्वोक्त ब्राह्मी आदि शक्तियों के स्थान से बाद वाली अन्तिम रेखा में व्यापक न्यास करना चाहिये ॥४७-४८॥ “चतुरस्रान्त्यरेखायै नमः” इस मन्त्र से शरीर में पूर्वोक्त ब्राह्मी आदि शक्तियों के स्थान के बाद वाले स्थान में व्यापक न्यास के द्वारा आगे बताई गई शक्तियों का न्यास करना चाहिये ॥४७-४८॥ इस रेखा में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— चतुरस्र की इस अन्तिम रेखा के दस स्थानों में दस मुद्राओं का न्यास करना चाहिये ॥४८॥ उस चतुरस्र की अन्तिम रेखा के दस स्थानों में त्रिखण्डा मुद्रा के साथ अन्य संक्षोभिणी आदि ¹मुद्राओं का न्यास करना चाहिये ॥४८॥ इन मुद्राओं के विन्यास के स्थान ये हैं— इन दस मुद्राओं में से आठ का न्यास ब्राह्मणी आदि आठ शक्तियों के न्यास- १. न्तर—ने., स्ताश्च—छ., क्तानां च—उ.। २. इत्यादि—ज. झ. उ.। ३. योगेन न्य- क. ग. । ४. सहितसंक्षोभिण्यादिमुद्रादशकं—ख. उ.। ५. नामन्तर—छ. ज. । ६. प्रविन्य- सेत्—उ., न्यसेदथ—ख. ङ. च. छ. ज. झ. ।

  1. त्रिखण्डा आदि दस मुद्राओं का बाह्य और आन्तर स्वरूप क्रमशः नि० पो० (३।३-२७) तथा यो० हृ० (१।५७-७१) में देखना चाहिये।

२४८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तासां मुद्राणां मध्ये, अष्टौ१ मुद्रा ब्रह्माण्याद्यष्टस्थानानामन्तर्देशेष्वष्टसु विन्यसेत्२। शिष्टे द्वे मुद्रे३ द्वादशान्ते४ पादाङ्गुष्ठे च विन्यसेत्। द्वादशान्तं षोडशान्तेन्दुमण्डलादधः सूर्यमण्डलस्थानम् ' तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— षोडशान्तमिति ख्यातं व्योमस्थानेन्दुमण्डलम्। तदधःस्थानगं सूर्यबिम्बं द्वादशशक्तिकम् ॥ द्वादशान्त५मिति ख्यातं स्थितं व्योमप्रदेशकम्। इति तेन बिन्दुतत्त्वं चतुष्पत्राम्बुजं च तत् ॥ ६सूर्यबिम्बमधश्चोर्ध्वं सार्धैकाङ्गुलिदेशतः। इति७ रीत्या ललाटस्थानबिन्दुतत्त्वोपरि स्थितं सूर्यमण्डलस्थानं ललाटोर्ध्वं द्वादशान्तपदेन लक्ष्यते ॥४९॥ षोडशदलपद्मव्यापकमाह— तदन्तः षोडशदलपद्माय नम इत्यपि । विन्यस्य स्थान के अनुसार ही करना चाहिये। बाकी बची दो मुद्राओं को द्वादशान्त और पादाङ्गुष्ठ में विन्यस्त करे ॥४९॥ इन मुद्राओं में से आठ मुद्राओं का विन्यास ब्रह्माणी आदि शक्तियों के स्थानों के अन्तर्गत आठ स्थानों में करना चाहिये। बाकी बची दो मुद्राओं का विन्यास द्वादशान्त और पादाङ्गुष्ठ में किया जाय। षोडशान्त नामक चन्द्रमण्डल के नीचे स्थित सूर्यमण्डल के स्थान को द्वादशान्त कहते हैं। जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है— उस आन्तर आकाश में विराजमान चन्द्रमण्डल षोडशान्त के नाम से प्रसिद्ध है। उसके नीचे बारह शक्तियों से संवलित सूर्यमण्डल स्थित है। इस आकाश प्रदेश को द्वादशान्त कहते हैं। इसके नीचे चार दल वाले कमल में बिन्दुतत्त्व का निवास है और इसी से डेढ़ अंगुल ऊपर सूर्यबिम्ब स्थित है ॥ इसके अनुसार ललाटस्थित बिन्दुतत्त्व के ऊपर सूर्यमण्डल है। ललाट के ऊपर स्थित यह सूर्यमण्डल ही द्वादशान्त कहा जाता है ॥४९॥ षोडशदल पद्म का व्यापक न्यास बताते हैं— इन चतुरस्रों के भीतर “षोडशदलपद्माय नमः” इस मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥ १. अष्ट-क. ग. । २. विन्यस्य-ख. ने. . झ. । ३. 'मुद्रे' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. द्वादशान्तपादाङ्गुष्ठयोर्वि-ख. ने. ज. झ. । ५. न्तं स्मृतं तेन-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. सूर्यं बिन्दुमधश्चोर्ध्वं-ख. झ. उ. । ७. अनेन-ज. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २४९ तेषां चतुरस्राणाम्, अन्तर्देशे¹ “षोडशदलपद्माय नमः” ²इति मन्त्रेण ³दक्षिण- श्रोत्रपृष्ठादिस्थानानि संस्पृश्य व्यापकं विन्यसेदित्यर्थः ॥५०॥ तद्दलेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तद्दले कामाकर्षिण्याद्याश्च विन्यसेत् ॥५०॥ तद्दले, जातावेकवचनम्, तद्दलेषु। कामाकर्षिण्याद्याः कामबुद्ध्यहङ्कार- शब्दस्पर्शरूपरसगन्धचित्तधैर्यस्मृतिनामबीजात्मामृतशरीराकर्षिण्यः,⁴ ता विन्य- सेत् ॥५०॥ तद्दलस्थानान्याह— दलानि दक्षिणश्रोत्रपृष्ठमंसं च कूर्परम् । करपृष्ठं चोरुजानुगुल्फपादतलं तथा ॥५१॥ वामपादतलाच्चै⁵वमेतदे⁶वाष्टकं मतम् । दलानीत्यादि तथेत्यन्तं स्पष्टम्। एवमुक्तप्रकारेण। वामपादतलादिवामश्रोत्र- पृष्ठान्तमेतदेवाष्टकं मतम्। स्थानाष्टकद्वयं षोडशदलानीत्यर्थः ॥५१-५२॥ इन चतुरस्रों के भीतर विद्यमान वृत्त प्रदेश में “षोडशदलपद्माय नमः” इस मन्त्र से दाहिने कान, दाहिनी पीठ आदि स्थानों का स्पर्श कर व्यापक न्यास करे ॥५०॥ इन दलों में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— इन सोलह दलों में कामाकर्षिणी आदि सोलह शक्तियों का विन्यास करे ॥५०॥ 'तद्दले' यहाँ जाति में एकवचन है। उन सोलह दलों में कामाकर्षिणी, बुद्धि, अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, चित्त, धैर्य, स्मृति, नाम, आत्मा, अमृत और शरीराकर्षिणी देवियों को विन्यस्त करे ॥५०॥ इन दलों के स्थान ये हैं— दाहिने कान की पीठ, कन्धा, कोहनी, करपृष्ठ (करभ), जंघा, घुटना, गुल्फ (टखना) और दक्षिण पादतल तथा वाम पादतल आदि ये ही आठ स्थान इनके दलों के हैं ॥५१-५२॥ 'दलानि' से 'तथा' पर्यन्त श्लोक का अर्थ स्पष्ट है। इसी तरह से वाम पादतल, गुल्फ, घुटना, जंघा, करपृष्ठ, कोहनी, कन्धा और बायें कान की पीठ ये ही स्थान विपरीत क्रम से विन्यस्त किये जाते हैं। इस तरह से दाहिने भाग और बायें भाग के ये ही आठ- आठ स्थान मिल कर सोलह दलों के प्रतिनिधि बनते हैं ॥५१-५२॥ १. देशे' नास्ति—ने. ज.। २. इत्यादि—ने. ज. झ. उ. । ३. षोडशदलदक्षिणतः श्रोत्र—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. प्यन्ता—ख. ने. ज. झ. उ. । ५. न्येव—ने. ज. झ. । ६. दप्यष्टकं—ख. ने. च. छ. ज. झ. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

२५० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः अष्टदलव्यापकमाह— तदन्तरे चाष्टदलपद्माय नम इत्यपि ॥५२॥ विन्यस्य तदन्तरे षोडशदलपद्मान्तरे । "अष्टदलपद्माय नमः" इति मन्त्रेण दक्ष- शङ्खादिस्थानानि संस्पृश्य व्यापकं न्यसेदित्यर्थः ॥५२-५३॥ तद्दलान्याह— तद्दलेष्वेषु दक्षशङ्खे च जत्रुके । ऊर्वन्तर्गूल्फगुल्फोरुजत्रुशङ्खे च वामतः ॥५३॥ शङ्खजत्र्वादिशब्दानां शरीरावयवावच्छिन्नानामङ्गेषु निघण्टुषु सुप्रसिद्धत्वा- दवगतिः ॥५३॥ तत्तद्दलेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— अनङ्गकुसुमाद्यास्तु शक्तीरष्टौ च विन्यसेत् । अनङ्गकुसुमाद्याः अनङ्गकुसुमानङ्गमेखलानङ्गमदनानङ्गमदनातुरानङ्ग- रेखानङ्गवेगिन्यनङ्गाङ्कुशानङ्गमालिन्यः । शेषं सुगमम् ॥५४॥ अब अष्टदल न्यास को बताते हैं— सोलह दल के भीतर "अष्टदलपद्माय नमः" इस मन्त्र से अष्टदल चक्र का विन्यास करे ॥५२-५३॥ सोलह दल वाले पद्म के भीतर "अष्टदलपद्माय नमः" इस मन्त्र से दस शंख आदि स्थानों को छूकर व्यापक न्यास करे ॥५२-५३॥ इस पद्म के दलों के स्थान ये हैं— दक्ष शंख (दाहिनी कनपटी), जत्रु (हंसुली), जंघा और टखना तथा बायां टखना, जंघा, जत्रु और शंख—ये आठ स्थान इस अष्टदल कमल के आठ दलों के हैं ॥५३॥ शंख, जत्रु आदि शब्द मनुष्य के शरीर के विभिन्न अंगों के वाचक हैं। कोश ग्रन्थों में इनका अर्थ प्रसिद्ध है ॥५३॥ इन दलों में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— इन आठ दलों में अनङ्गकुसुमा आदि आठ शक्तियों का विन्यास करना चाहिये ॥ अनङ्गकुसुमा, अनङ्गमेखला, अनङ्गमदना, अनङ्गमदनातुरा, अनङ्गरेखा, अनङ्ग- वेगिनी, अनङ्गाङ्कुशा, अनङ्गमालिनी—ये आठ शक्तियां हैं। बाकी का अर्थ सरल है ॥५४॥ Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५१ चतुर्दशारचक्रव्यापकमाह— तदन्तश्चतुर्दशारचक्राय नम इत्यपि ॥५४॥ विन्यस्य तदन्तः अष्टदलपद्मस्यान्तः “चतुर्दशारचक्राय नमः” इति मन्त्रेण चतुर्दश- कोणस्थानानि ललाटादीनि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य ॥५४-५५॥ चतुर्दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्य कोणेषु न्यसेच्छक्तीश्चतुर्दश । सर्वसंक्षोभिण्याद्यास्तु सर्वसंक्षोभिण्याद्याः सर्वसंक्षोभिणीसर्वविद्राविणीसर्वाकर्षिणीसर्वह्लादिनी¹- सर्वसंमोहिनीसर्वस्तम्भिनीसर्वजृम्भिणीसर्ववशङ्करीसर्वरञ्जनीसर्वोन्मादिनीसर्वार्थ- साधिनीसर्वसम्पत्ति²पूरणीसर्वमन्त्रमयीसर्वद्वन्द्वक्षयङ्कर्यः। ³शिष्टं स्पष्टम् ॥५५॥ तत्कोणानि प्रतिज्ञापूर्वकमाह— तस्य कोणानि वक्ष्म्यहम् ॥५५॥ ललाटे दक्षभागे च दक्षगण्डांसमध्यतः । ⁴पार्श्वान्तरूरुजङ्घान्तवार्मजङ्घादि पार्वति ॥५६॥ चतुर्दशार चक्र का व्यापक न्यास बताते हैं— इसके भीतर “चतुर्दशारचक्राय नमः” इन मन्त्र से चतुर्दशार चक्र का विन्यास करे ॥ अष्टदल पद्म के भीतर “चतुर्दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से चतुर्दश कोण के प्रति- निधि ललाट आदि स्थानों को छूते हुए व्यापक न्यास करना चाहिये ॥५४-५५॥ चतुर्दशकोण में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— इसके कोणों में सर्वसंक्षोभिणी इत्यादि चौदह शत्रियों का विन्यास करे ॥ सर्वसंक्षोभिणी, सर्वविद्राविणी, सर्वाकर्षिणी, सर्वह्लादिनी, सर्वसंमोहिनी, सर्वस्तम्भिनी, सर्वजृम्भणी, सर्ववशङ्करी, सर्वरञ्जनी, सर्वोन्मादिनी, सर्वार्थसाधिनी, सर्वसम्पत्तिपूरणी, सर्वमन्त्रमयी और सर्वद्वन्द्वक्षयङ्करी ये चौदह शक्तियाँ है। शेष शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥५५॥ अब प्रतिज्ञा के साथ इनके कोणों का वर्णन करते हैं— अब मैं इनके कोणों का वर्णन कर रहा हूँ। ललाट में, ललाट के दाहिने भाग में, दक्षिण कपोल, दक्षिण स्कन्ध, पार्श्व, जंघा और पिण्डली में तथा इसी तरह १. ह्लादकारिणी—ख. ने. ज. झ. उ. । २. रूपिणी—ख. ने. ज. झ. । ३. ‘शिष्टं स्पष्टम्’ नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. दक्षपार्श्वोरु—ख. ने. ।

२५२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वामोरौ वामपार्श्वे च वामांसे वामगण्डके । ललाटवामभागे च तथा वै पृष्ठ इत्यपि ॥५७॥ दक्षभागे ललाटस्यैव। ललाट इति प्रकृतत्वाद् दक्षगण्डदक्षांसमध्यत¹ इत्यर्थः। ²पार्श्वान्तरूरुजङ्घान्तैरिति त्रिभिरपि दक्षशब्दो युज्यते। वामजङ्घादि इत्यादि- शब्दः शिष्टार्थारम्भद्योतकः। वामांस इत्यत्रापि मध्य इति योज्यम्। पृष्ठमिति शिरसः पृष्ठमेव³ ज्ञेयम्, दक्षवामयोः प्रथमं ललाटोपादानात्। ललाटं शिरसः पुरस्ताद्भागः ॥५५-५७॥ बहिर्दशारचक्रव्यापकमाह— ⁴ततो दशारचक्राय नम इत्यपि पार्वति। ततः चतुर्दशारकोणन्यासानन्तरम्, “दशारचक्राय नमः” इति मन्त्रेण दक्षा- क्ष्यादिदशकोणानि संस्पृश्य व्यापकम्, अपिशब्दाद्विन्यसेदिति योज्यम् ॥ से हे पार्वति ! बाईं पिण्डली, जंघा, पार्श्व, स्कन्ध, कपोल और ललाट के वाम भाग में एवं ललाट के पृष्ठ भाग में इन दलों की भावना करे ॥५६-५७॥ ललाट में और ललाट के ही दाहिने हिस्से में ये दो स्थान होंगे। ललाट के दक्षभाग की तरह गण्ड, अंस आदि का भी दक्ष भाग ही गृहीत होगा। इसी तरह से पार्श्व, ऊरु और जंघा के साथ भी दक्ष शब्द संयुक्त होगा। वाम जंघा के बाद का आदि शब्द विपरीत क्रम से उन सभी स्थानों का सूचक है, जिनका वर्णन अभी किया गया है। न्यास करते समय इन सभी स्थानों के मध्य भाग का स्पर्श किया जाता है, अतः वामांस के साथ भी मध्य शब्द जुड़ेगा। पृष्ठ शब्द यहाँ सिर के पृष्ठ भाग का सूचक है, क्योंकि दक्ष और वाम ललाट के अतिरिक्त यहाँ ललाट का भी अलग से ग्रहण किया गया है। इसलिये परावर्तन क्रम में यहाँ ललाट का पृष्ठ भाग, अर्थात् सिर का पृष्ठ भाग ही गृहीत होगा, क्योंकि ललाट सिर का पूर्व भाग है ॥५५-५७॥ बहिर्दशार चक्र का न्यास बताते हैं— हे पार्वति ! इसके बाद “बाह्यदशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से बहिर्दशार चक्र का न्यास करे ॥ चतुर्दशार चक्र के कोणों का न्यास सम्पन्न करने के उपरान्त “दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से दाहिनी आँख आदि दस स्थानों का स्पर्श करते हुए व्यापक न्यास करे ॥ १. मध्य इ-उ. । २. पार्श्वोरुज-ख. ने. । ३. मिति ज्ञेयम्-क. ग., मवसेयम्- ४. पु. बहिर्दशार-क.

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५३ दशारचक्रस्य कोणान्याह— तस्य कोणानि दक्षाक्षिनासिकामूलनेत्रके¹ ॥५८॥ कुक्षीशवायुकोणेषु जानुद्वयगुदेषु च । कुक्षिनैर्ऋतिवह्व्याख्यकोणे² ष्वैव³ तस्य दशारचक्रस्य, कोणानि देशाऽपि, दशसु दक्षाक्ष्यादिस्थानेषु, भावनी- यानीति⁴ शेषः । कुक्षीशवायुकोणेषु । छान्दसत्वाद् द्वित्वे बहुवचनम् । बाहुद्वय- मारभ्योरुद्वयपर्यन्तं कुक्षिशब्देन लक्ष्यते । तेन कुक्षेरुपरिभागः प्राची, अधोभागः प्रतीची, दक्षिणवामपार्श्वे दक्षिणोदीच्यौ । कोणशब्देन बाहू ऊरू च लक्ष्येते । तेन वामबाहुमूलमीशकोणः, वामोरूमूलं वायुकोणः, दक्षिणोरूमूलं नैर्ऋतिकोणः, दक्षिण- बाहुमूल⁵मग्निकोणः । सुगममन्यत् ॥५८-५९॥ दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— न्यसेत् पुनः ॥५९॥ अब इस दशार चक्र के कोणों को बताते हैं— इस दशार चक्र के कोणों की दाहिनी आँख, नासिकामूल, बाईं आँख, वाम बाहु, वामोरु, दक्षिण और वाम जानु, गुदा, दक्षिण ऊरु और दक्षिण बाहु इन दस स्थानों में भावना करे ॥५८-५९॥ उस दशार चक्र के सभी दस कोणों की दक्षिण नेत्र आदि दस स्थानों में भावना करनी चाहिये । कुक्षीशवायुकोणेषु तथा कुक्षिनैर्ऋतिवह्व्याख्यकोणेषु इन दोनों स्थानों में द्विवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग वैदिक पद्धति के अनुसार मानना चाहिये । कुक्षि शब्द यहाँ दोनों बाहुओं से दोनों जंघाओं तक फैले धड़ का वाचक है । इसके अनुसार धड़ का ऊपरी भाग प्राची (पूर्व), नीचे का भाग प्रतीची (पश्चिम) दिशा का और उसका दाहिना तथा बायां भाग दक्षिण और उत्तर दिशा का सूचक होगा । कोण शब्द से दोनों बाहुओं और दोनों जंघाओं बोध होगा । इस तरह से वाम बाहुमूल, ईशान कोण, वाम जंघामूल वायु कोण, दक्षिण जंघामूल नैर्ऋति कोण और दक्षिण बाहुमूल अग्निकोण का सूचक माना जायगा । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥५८-५९॥ इन दस कोणों में न्यस्तव्य शक्तियाँ ये हैं— १. नासामूलास्यनेत्रके-क. ग., लान्यनेत्रके-से. । २. णयोश्च-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ३. 'दशापि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. नीत्यर्थः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. न्नेर्ऋता-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. ।

२५४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः सर्वसिद्धिप्रदादीनां शक्तीनां दशकं प्रिये । सर्वसिद्धिप्रदाद्याः सर्वसिद्धिप्रदासर्वसम्पत्प्रदासर्वप्रियङ्करीसर्वमङ्गलकारिणी- सर्वकामप्रदासर्वदुःखविमोचनीसर्वमृत्युप्रशमनीसर्वविघ्ननिवारिणीसर्वाङ्गसुन्दरीसर्व- सौभाग्यदायिन्यः । शेषं स्पष्टम् ॥५९-६०॥ अन्तर्दशारचक्र¹व्यापकमाह— तदन्तश्च दशारादिचक्राय नम इत्यपि ॥६०॥ विन्यस्य तदन्तः बाह्यदशारान्तः, “अन्तर्दशारचक्राय नमः” इति मन्त्रेण दक्षिणनासादि- ³दशकोणानि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य ॥६०-६१॥ दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्य कोणेषु सर्वज्ञाद्याश्च विन्यसेत् । सर्वज्ञाद्याः सर्वज्ञासर्वशक्तिसर्वैश्वर्य⁴प्रदासर्वज्ञानमयीसर्वव्याधिविनाशिनीसर्वा- धारस्वरूपा⁵सर्वपापहरासर्वानन्दमयीसर्वरक्षास्वरूपिणीसर्वेप्सितफलप्रदाः । स्पष्ट- मन्यत् ॥६०॥ हे प्रिये ! इन दस कोणों के दस स्थानों में सर्वसिद्धिप्रदा इत्यादि दस शक्तियों का विन्यास करे ॥५९-६०॥ सर्वसिद्धिप्रदा, सर्वसम्पत्प्रदा, सर्वप्रियङ्करी, सर्वमङ्गलकारिणी, सर्वकामप्रदा, सर्व- दुःखविमोचिनी, सर्वमृत्युप्रशमनी, सर्वविघ्ननिवारिणी, सर्वाङ्गसुन्दरी और सर्वसौभाग्य- दायिनी ये दस शक्तियाँ है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥५९-६०॥ अन्तर्दशार चक्र का व्यापक न्यास बताते हैं— बाह्य दशार के भीतर “अन्तर्दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से अन्तर्दशार चक्र का विन्यास करे ॥६०-६१॥ बाह्य दशार चक्र के भीतर “अन्तर्दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से दस कोणों के प्रतिनिधि दक्षिण नासा आदि स्थानों को स्पर्श करते हुए व्यापक न्यास करे ॥६०-६१॥ इन दस कोणों में न्यस्तव्य शक्तियाँ ये हैं— अन्तर्दशार के दस कोणों से सर्वज्ञा आदि शक्तियों को विन्यस्त करे ॥६१॥ सर्वज्ञा, सर्वशक्ति, सर्वैश्वर्यप्रदा, सर्वज्ञानमयी, सर्वव्याधिविनाशिनी, सर्वाधारस्वरूपा, सर्वपापहरा, सर्वानन्दमयी, सर्वरक्षास्वरूपिणी, सर्वेप्सितफलप्रदा ये दस शक्तियाँ हैं। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥ १॥ १. तथा-क. ग. । 'चक्र' नास्ति-ख. झ. उ. । ३. दक्ष(श) स्थानानि-क. ग. । ४. प्रदायिनी-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. स्वरूपिणी-ख. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५५ तस्य कोणान्याह- दक्षनासा सृक्किणी च स्तनं वृषणमेव च ॥६१॥ सीवनी वाममुष्कं च स्तनं सृक्किणिनासिके । नासाग्रं चैव विज्ञेयं कोणानां दशकं तथा ॥६२॥ स्पष्टम् ॥६१-६२॥ अष्टकोणचक्रव्यापकमाह— तदन्तरष्टकोणादिचक्राय नम इत्यपि । विन्यस्य तदन्तः दशारान्तः, "अष्टकोणादिचक्राय नमः" इति मन्त्रेण चिबुकाद्यष्ट- कोणानि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य । अष्टकोणचक्रस्यादित्वं त्रिकोणा (दी? दि) तर- चक्रेभ्यः प्रथममुत्पन्नत्वात् ॥६३॥ अष्टकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्य कोणेषु वशिन्याद्यष्टकं न्यसेत् ॥६३॥ तस्य अष्टारचक्रस्य, कोणेषु । वशिन्याद्यष्टकं वशिनीकामेश्वरीमोदिनी- विमलाऽरुणाजयिनीसर्वेश्वरीकौलिन्त्यः ॥६३॥ अन्तर्दशार के विन्यास के कोण ये हैं— दक्ष नासापुट, सृक्किणी (होठों का दक्षिण भाग), दक्ष स्तन, दक्ष वृषण, सीवनी, वाम मुष्क (वृषण), वाम स्तन, वाम सृक्किणी, वाम नासापुट और नासाग्र ये अन्तर्दशार के दस कोण हैं ॥६१-६२॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥६१-६२॥ अष्टकोण चक्र का व्यापक न्यास बताते हैं— दशार चक्र के भीतर "अष्टकोणादिचक्राय नमः" इस मन्त्र से अष्टकोण चक्र का विन्यास करे ॥६३॥ अन्तर्दशार चक्र के भीतर "अष्टकोणादिचक्राय नमः" इस मन्त्र से चिबुक (ठोडी) आदि दस स्थानों को छूते हुए व्यापक न्यास करे। अष्टकोण को आदिचक्र इसलिये कहा गया है कि त्रिकोण से अन्य चक्रों की अपेक्षा यह पहले उत्पन्न हुआ है ॥६३॥ अष्टकोण में न्यस्तव्यू शक्तियों को बताते हैं— इस अष्टार चक्र के कोणों में वशिनी आदि आठ शक्तियों का विन्यास करे ॥६३॥ इस अष्टार चक्र के आठ कोणों में वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयिनी, सर्वेश्वरी और कौलिनी इन आठ शक्तियों का विन्यास करे ॥६३॥

२५६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तस्य कोणाष्टकमाह— चिबुकं कण्ठहृदयनाभीनां चैव दक्षिणम्। ज्ञेयं पार्श्वचतुष्कं च मणिपूरादि वामकम्॥६४॥ चतुष्टयं च पार्श्वनामेतत् कोणाष्टकं पुनः। चिबुकादीनां पार्श्वचतुष्कं दक्षिणम्। मणिपूरादि, मणिपूरकं नाभिस्थानम्, नाभिहृदयकण्ठचिबुकानां वामकं^२ पार्श्वचतुष्कं चैतत्कोणाष्टकम्॥६४-६५॥ अनन्तरमायुधावरणन्यासमाह— हृदयस्थत्रिकोणस्य चतुर्दिक्षु बहिर्न्यसेत्॥६५॥ शरचापौ पाशसृणी हृदये^३ वक्षसि तिष्ठतीति हृदयस्थं स्तनद्वयमध्यनिम्नत्रिकोणाकारं हृदयस्थ- त्रिकोणमित्युच्यते। तस्य बहिश्चतुर्दिक्षु प्रागादिषु कामेश्वरीकामेश्वरयोः शरचापौ पाशसृणी ^४चेत्यायुधंचतुष्टयं ^५मिलितं न्यसेत्। ^६शरचापौ पाशसृणी इति पुंस्त्री- भेदेन प्रत्येकं द्वन्द्वमित्यष्टौ। अत्रैव वक्ष्यति— इसके आठ कोणों को कहते हैं— चिबुक (ठोडी), कण्ठ, हृदय और नाभि इन चारों का दाहिना भाग तथा मणिपूर (नाभि) आदि का बायां भाग, ये ही सब मिल कर अष्टकोण चक्र के आठ कोण बनते हैं ॥६४-६५॥ चिबुक (ठोडी) आदि के चार दाहिने पार्श्व (भाग) और मणिपूर आदि, अर्थात् नाभि, हृदय, कण्ठ, चिबुक के चार बायें पार्श्व मिलकर इस कोणाष्टक की रचना करते हैं ॥६४-६५॥ अब आयुधावरण न्यास को कहते हैं— हृदय में स्थित त्रिकोण की चारों दिशाओं में बाहर की तरफ बाण, धनुष, पाश और अंकुश का न्यास करे ॥६५-६६॥ हृदयस्थ त्रिकोण का अर्थ है दोनों स्तनों के मध्य में नीचे विद्यमान त्रिकोण के आकार का स्थान। उसके बाहर पूर्व आदि चारों दिशाओं में कामेश्वरी और कामेश्वर दोनों के बाण, धनुष, पाश और अंकुश इन चार-चार आयुधों का न्यास करे। शरचापौ तथा पाशसृणी पदों में 'शरो च चापौ च, पाशौ च सृणी च' इस तरह का द्विवचनान्त १. मतम्—क. ग.। २. वाम-ख. ग. ने. ज., नास्ति-झ. उ.। ३. 'हृदये''''प्रागादिषु' इति पाठाऽग्रे 'पाशद्वयं न्यसेत्' इत्यतः परं दृश्यते-ख. ज. झ. उ.। ४. चेत्यायुधाष्टकं-क.। ५. 'मिलितं' नास्ति-क. ग. ने. उ.। ६. 'शर''''मिलितं' केवलं झ. दृश्यते।