योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 301, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५१ चतुर्दशारचक्रव्यापकमाह— तदन्तश्चतुर्दशारचक्राय नम इत्यपि ॥५४॥ विन्यस्य तदन्तः अष्टदलपद्मस्यान्तः “चतुर्दशारचक्राय नमः” इति मन्त्रेण चतुर्दश- कोणस्थानानि ललाटादीनि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य ॥५४-५५॥ चतुर्दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्य कोणेषु न्यसेच्छक्तीश्चतुर्दश । सर्वसंक्षोभिण्याद्यास्तु सर्वसंक्षोभिण्याद्याः सर्वसंक्षोभिणीसर्वविद्राविणीसर्वाकर्षिणीसर्वह्लादिनी¹- सर्वसंमोहिनीसर्वस्तम्भिनीसर्वजृम्भिणीसर्ववशङ्करीसर्वरञ्जनीसर्वोन्मादिनीसर्वार्थ- साधिनीसर्वसम्पत्ति²पूरणीसर्वमन्त्रमयीसर्वद्वन्द्वक्षयङ्कर्यः। ³शिष्टं स्पष्टम् ॥५५॥ तत्कोणानि प्रतिज्ञापूर्वकमाह— तस्य कोणानि वक्ष्म्यहम् ॥५५॥ ललाटे दक्षभागे च दक्षगण्डांसमध्यतः । ⁴पार्श्वान्तरूरुजङ्घान्तवार्मजङ्घादि पार्वति ॥५६॥ चतुर्दशार चक्र का व्यापक न्यास बताते हैं— इसके भीतर “चतुर्दशारचक्राय नमः” इन मन्त्र से चतुर्दशार चक्र का विन्यास करे ॥ अष्टदल पद्म के भीतर “चतुर्दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से चतुर्दश कोण के प्रति- निधि ललाट आदि स्थानों को छूते हुए व्यापक न्यास करना चाहिये ॥५४-५५॥ चतुर्दशकोण में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— इसके कोणों में सर्वसंक्षोभिणी इत्यादि चौदह शत्रियों का विन्यास करे ॥ सर्वसंक्षोभिणी, सर्वविद्राविणी, सर्वाकर्षिणी, सर्वह्लादिनी, सर्वसंमोहिनी, सर्वस्तम्भिनी, सर्वजृम्भणी, सर्ववशङ्करी, सर्वरञ्जनी, सर्वोन्मादिनी, सर्वार्थसाधिनी, सर्वसम्पत्तिपूरणी, सर्वमन्त्रमयी और सर्वद्वन्द्वक्षयङ्करी ये चौदह शक्तियाँ है। शेष शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥५५॥ अब प्रतिज्ञा के साथ इनके कोणों का वर्णन करते हैं— अब मैं इनके कोणों का वर्णन कर रहा हूँ। ललाट में, ललाट के दाहिने भाग में, दक्षिण कपोल, दक्षिण स्कन्ध, पार्श्व, जंघा और पिण्डली में तथा इसी तरह १. ह्लादकारिणी—ख. ने. ज. झ. उ. । २. रूपिणी—ख. ने. ज. झ. । ३. ‘शिष्टं स्पष्टम्’ नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. दक्षपार्श्वोरु—ख. ने. ।