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योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५१ चतुर्दशारचक्रव्यापकमाह— तदन्तश्चतुर्दशारचक्राय नम इत्यपि ॥५४॥ विन्यस्य तदन्तः अष्टदलपद्मस्यान्तः “चतुर्दशारचक्राय नमः” इति मन्त्रेण चतुर्दश- कोणस्थानानि ललाटादीनि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य ॥५४-५५॥ चतुर्दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्य कोणेषु न्यसेच्छक्तीश्चतुर्दश । सर्वसंक्षोभिण्याद्यास्तु सर्वसंक्षोभिण्याद्याः सर्वसंक्षोभिणीसर्वविद्राविणीसर्वाकर्षिणीसर्वह्लादिनी¹- सर्वसंमोहिनीसर्वस्तम्भिनीसर्वजृम्भिणीसर्ववशङ्करीसर्वरञ्जनीसर्वोन्मादिनीसर्वार्थ- साधिनीसर्वसम्पत्ति²पूरणीसर्वमन्त्रमयीसर्वद्वन्द्वक्षयङ्कर्यः। ³शिष्टं स्पष्टम् ॥५५॥ तत्कोणानि प्रतिज्ञापूर्वकमाह— तस्य कोणानि वक्ष्म्यहम् ॥५५॥ ललाटे दक्षभागे च दक्षगण्डांसमध्यतः । ⁴पार्श्वान्तरूरुजङ्घान्तवार्मजङ्घादि पार्वति ॥५६॥ चतुर्दशार चक्र का व्यापक न्यास बताते हैं— इसके भीतर “चतुर्दशारचक्राय नमः” इन मन्त्र से चतुर्दशार चक्र का विन्यास करे ॥ अष्टदल पद्म के भीतर “चतुर्दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से चतुर्दश कोण के प्रति- निधि ललाट आदि स्थानों को छूते हुए व्यापक न्यास करना चाहिये ॥५४-५५॥ चतुर्दशकोण में न्यस्तव्य शक्तियों को बताते हैं— इसके कोणों में सर्वसंक्षोभिणी इत्यादि चौदह शत्रियों का विन्यास करे ॥ सर्वसंक्षोभिणी, सर्वविद्राविणी, सर्वाकर्षिणी, सर्वह्लादिनी, सर्वसंमोहिनी, सर्वस्तम्भिनी, सर्वजृम्भणी, सर्ववशङ्करी, सर्वरञ्जनी, सर्वोन्मादिनी, सर्वार्थसाधिनी, सर्वसम्पत्तिपूरणी, सर्वमन्त्रमयी और सर्वद्वन्द्वक्षयङ्करी ये चौदह शक्तियाँ है। शेष शब्दों का अर्थ स्पष्ट है ॥५५॥ अब प्रतिज्ञा के साथ इनके कोणों का वर्णन करते हैं— अब मैं इनके कोणों का वर्णन कर रहा हूँ। ललाट में, ललाट के दाहिने भाग में, दक्षिण कपोल, दक्षिण स्कन्ध, पार्श्व, जंघा और पिण्डली में तथा इसी तरह १. ह्लादकारिणी—ख. ने. ज. झ. उ. । २. रूपिणी—ख. ने. ज. झ. । ३. ‘शिष्टं स्पष्टम्’ नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. दक्षपार्श्वोरु—ख. ने. ।

२५२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वामोरौ वामपार्श्वे च वामांसे वामगण्डके । ललाटवामभागे च तथा वै पृष्ठ इत्यपि ॥५७॥ दक्षभागे ललाटस्यैव। ललाट इति प्रकृतत्वाद् दक्षगण्डदक्षांसमध्यत¹ इत्यर्थः। ²पार्श्वान्तरूरुजङ्घान्तैरिति त्रिभिरपि दक्षशब्दो युज्यते। वामजङ्घादि इत्यादि- शब्दः शिष्टार्थारम्भद्योतकः। वामांस इत्यत्रापि मध्य इति योज्यम्। पृष्ठमिति शिरसः पृष्ठमेव³ ज्ञेयम्, दक्षवामयोः प्रथमं ललाटोपादानात्। ललाटं शिरसः पुरस्ताद्भागः ॥५५-५७॥ बहिर्दशारचक्रव्यापकमाह— ⁴ततो दशारचक्राय नम इत्यपि पार्वति। ततः चतुर्दशारकोणन्यासानन्तरम्, “दशारचक्राय नमः” इति मन्त्रेण दक्षा- क्ष्यादिदशकोणानि संस्पृश्य व्यापकम्, अपिशब्दाद्विन्यसेदिति योज्यम् ॥ से हे पार्वति ! बाईं पिण्डली, जंघा, पार्श्व, स्कन्ध, कपोल और ललाट के वाम भाग में एवं ललाट के पृष्ठ भाग में इन दलों की भावना करे ॥५६-५७॥ ललाट में और ललाट के ही दाहिने हिस्से में ये दो स्थान होंगे। ललाट के दक्षभाग की तरह गण्ड, अंस आदि का भी दक्ष भाग ही गृहीत होगा। इसी तरह से पार्श्व, ऊरु और जंघा के साथ भी दक्ष शब्द संयुक्त होगा। वाम जंघा के बाद का आदि शब्द विपरीत क्रम से उन सभी स्थानों का सूचक है, जिनका वर्णन अभी किया गया है। न्यास करते समय इन सभी स्थानों के मध्य भाग का स्पर्श किया जाता है, अतः वामांस के साथ भी मध्य शब्द जुड़ेगा। पृष्ठ शब्द यहाँ सिर के पृष्ठ भाग का सूचक है, क्योंकि दक्ष और वाम ललाट के अतिरिक्त यहाँ ललाट का भी अलग से ग्रहण किया गया है। इसलिये परावर्तन क्रम में यहाँ ललाट का पृष्ठ भाग, अर्थात् सिर का पृष्ठ भाग ही गृहीत होगा, क्योंकि ललाट सिर का पूर्व भाग है ॥५५-५७॥ बहिर्दशार चक्र का न्यास बताते हैं— हे पार्वति ! इसके बाद “बाह्यदशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से बहिर्दशार चक्र का न्यास करे ॥ चतुर्दशार चक्र के कोणों का न्यास सम्पन्न करने के उपरान्त “दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से दाहिनी आँख आदि दस स्थानों का स्पर्श करते हुए व्यापक न्यास करे ॥ १. मध्य इ-उ. । २. पार्श्वोरुज-ख. ने. । ३. मिति ज्ञेयम्-क. ग., मवसेयम्- ४. पु. बहिर्दशार-क.

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५३ दशारचक्रस्य कोणान्याह— तस्य कोणानि दक्षाक्षिनासिकामूलनेत्रके¹ ॥५८॥ कुक्षीशवायुकोणेषु जानुद्वयगुदेषु च । कुक्षिनैर्ऋतिवह्व्याख्यकोणे² ष्वैव³ तस्य दशारचक्रस्य, कोणानि देशाऽपि, दशसु दक्षाक्ष्यादिस्थानेषु, भावनी- यानीति⁴ शेषः । कुक्षीशवायुकोणेषु । छान्दसत्वाद् द्वित्वे बहुवचनम् । बाहुद्वय- मारभ्योरुद्वयपर्यन्तं कुक्षिशब्देन लक्ष्यते । तेन कुक्षेरुपरिभागः प्राची, अधोभागः प्रतीची, दक्षिणवामपार्श्वे दक्षिणोदीच्यौ । कोणशब्देन बाहू ऊरू च लक्ष्येते । तेन वामबाहुमूलमीशकोणः, वामोरूमूलं वायुकोणः, दक्षिणोरूमूलं नैर्ऋतिकोणः, दक्षिण- बाहुमूल⁵मग्निकोणः । सुगममन्यत् ॥५८-५९॥ दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— न्यसेत् पुनः ॥५९॥ अब इस दशार चक्र के कोणों को बताते हैं— इस दशार चक्र के कोणों की दाहिनी आँख, नासिकामूल, बाईं आँख, वाम बाहु, वामोरु, दक्षिण और वाम जानु, गुदा, दक्षिण ऊरु और दक्षिण बाहु इन दस स्थानों में भावना करे ॥५८-५९॥ उस दशार चक्र के सभी दस कोणों की दक्षिण नेत्र आदि दस स्थानों में भावना करनी चाहिये । कुक्षीशवायुकोणेषु तथा कुक्षिनैर्ऋतिवह्व्याख्यकोणेषु इन दोनों स्थानों में द्विवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग वैदिक पद्धति के अनुसार मानना चाहिये । कुक्षि शब्द यहाँ दोनों बाहुओं से दोनों जंघाओं तक फैले धड़ का वाचक है । इसके अनुसार धड़ का ऊपरी भाग प्राची (पूर्व), नीचे का भाग प्रतीची (पश्चिम) दिशा का और उसका दाहिना तथा बायां भाग दक्षिण और उत्तर दिशा का सूचक होगा । कोण शब्द से दोनों बाहुओं और दोनों जंघाओं बोध होगा । इस तरह से वाम बाहुमूल, ईशान कोण, वाम जंघामूल वायु कोण, दक्षिण जंघामूल नैर्ऋति कोण और दक्षिण बाहुमूल अग्निकोण का सूचक माना जायगा । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥५८-५९॥ इन दस कोणों में न्यस्तव्य शक्तियाँ ये हैं— १. नासामूलास्यनेत्रके-क. ग., लान्यनेत्रके-से. । २. णयोश्च-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ३. 'दशापि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. नीत्यर्थः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. न्नेर्ऋता-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. ।

२५४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः सर्वसिद्धिप्रदादीनां शक्तीनां दशकं प्रिये । सर्वसिद्धिप्रदाद्याः सर्वसिद्धिप्रदासर्वसम्पत्प्रदासर्वप्रियङ्करीसर्वमङ्गलकारिणी- सर्वकामप्रदासर्वदुःखविमोचनीसर्वमृत्युप्रशमनीसर्वविघ्ननिवारिणीसर्वाङ्गसुन्दरीसर्व- सौभाग्यदायिन्यः । शेषं स्पष्टम् ॥५९-६०॥ अन्तर्दशारचक्र¹व्यापकमाह— तदन्तश्च दशारादिचक्राय नम इत्यपि ॥६०॥ विन्यस्य तदन्तः बाह्यदशारान्तः, “अन्तर्दशारचक्राय नमः” इति मन्त्रेण दक्षिणनासादि- ³दशकोणानि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य ॥६०-६१॥ दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्य कोणेषु सर्वज्ञाद्याश्च विन्यसेत् । सर्वज्ञाद्याः सर्वज्ञासर्वशक्तिसर्वैश्वर्य⁴प्रदासर्वज्ञानमयीसर्वव्याधिविनाशिनीसर्वा- धारस्वरूपा⁵सर्वपापहरासर्वानन्दमयीसर्वरक्षास्वरूपिणीसर्वेप्सितफलप्रदाः । स्पष्ट- मन्यत् ॥६०॥ हे प्रिये ! इन दस कोणों के दस स्थानों में सर्वसिद्धिप्रदा इत्यादि दस शक्तियों का विन्यास करे ॥५९-६०॥ सर्वसिद्धिप्रदा, सर्वसम्पत्प्रदा, सर्वप्रियङ्करी, सर्वमङ्गलकारिणी, सर्वकामप्रदा, सर्व- दुःखविमोचिनी, सर्वमृत्युप्रशमनी, सर्वविघ्ननिवारिणी, सर्वाङ्गसुन्दरी और सर्वसौभाग्य- दायिनी ये दस शक्तियाँ है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥५९-६०॥ अन्तर्दशार चक्र का व्यापक न्यास बताते हैं— बाह्य दशार के भीतर “अन्तर्दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से अन्तर्दशार चक्र का विन्यास करे ॥६०-६१॥ बाह्य दशार चक्र के भीतर “अन्तर्दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से दस कोणों के प्रतिनिधि दक्षिण नासा आदि स्थानों को स्पर्श करते हुए व्यापक न्यास करे ॥६०-६१॥ इन दस कोणों में न्यस्तव्य शक्तियाँ ये हैं— अन्तर्दशार के दस कोणों से सर्वज्ञा आदि शक्तियों को विन्यस्त करे ॥६१॥ सर्वज्ञा, सर्वशक्ति, सर्वैश्वर्यप्रदा, सर्वज्ञानमयी, सर्वव्याधिविनाशिनी, सर्वाधारस्वरूपा, सर्वपापहरा, सर्वानन्दमयी, सर्वरक्षास्वरूपिणी, सर्वेप्सितफलप्रदा ये दस शक्तियाँ हैं। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥ १॥ १. तथा-क. ग. । 'चक्र' नास्ति-ख. झ. उ. । ३. दक्ष(श) स्थानानि-क. ग. । ४. प्रदायिनी-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. स्वरूपिणी-ख. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५५ तस्य कोणान्याह- दक्षनासा सृक्किणी च स्तनं वृषणमेव च ॥६१॥ सीवनी वाममुष्कं च स्तनं सृक्किणिनासिके । नासाग्रं चैव विज्ञेयं कोणानां दशकं तथा ॥६२॥ स्पष्टम् ॥६१-६२॥ अष्टकोणचक्रव्यापकमाह— तदन्तरष्टकोणादिचक्राय नम इत्यपि । विन्यस्य तदन्तः दशारान्तः, "अष्टकोणादिचक्राय नमः" इति मन्त्रेण चिबुकाद्यष्ट- कोणानि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य । अष्टकोणचक्रस्यादित्वं त्रिकोणा (दी? दि) तर- चक्रेभ्यः प्रथममुत्पन्नत्वात् ॥६३॥ अष्टकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्य कोणेषु वशिन्याद्यष्टकं न्यसेत् ॥६३॥ तस्य अष्टारचक्रस्य, कोणेषु । वशिन्याद्यष्टकं वशिनीकामेश्वरीमोदिनी- विमलाऽरुणाजयिनीसर्वेश्वरीकौलिन्त्यः ॥६३॥ अन्तर्दशार के विन्यास के कोण ये हैं— दक्ष नासापुट, सृक्किणी (होठों का दक्षिण भाग), दक्ष स्तन, दक्ष वृषण, सीवनी, वाम मुष्क (वृषण), वाम स्तन, वाम सृक्किणी, वाम नासापुट और नासाग्र ये अन्तर्दशार के दस कोण हैं ॥६१-६२॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥६१-६२॥ अष्टकोण चक्र का व्यापक न्यास बताते हैं— दशार चक्र के भीतर "अष्टकोणादिचक्राय नमः" इस मन्त्र से अष्टकोण चक्र का विन्यास करे ॥६३॥ अन्तर्दशार चक्र के भीतर "अष्टकोणादिचक्राय नमः" इस मन्त्र से चिबुक (ठोडी) आदि दस स्थानों को छूते हुए व्यापक न्यास करे। अष्टकोण को आदिचक्र इसलिये कहा गया है कि त्रिकोण से अन्य चक्रों की अपेक्षा यह पहले उत्पन्न हुआ है ॥६३॥ अष्टकोण में न्यस्तव्यू शक्तियों को बताते हैं— इस अष्टार चक्र के कोणों में वशिनी आदि आठ शक्तियों का विन्यास करे ॥६३॥ इस अष्टार चक्र के आठ कोणों में वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयिनी, सर्वेश्वरी और कौलिनी इन आठ शक्तियों का विन्यास करे ॥६३॥

२५६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तस्य कोणाष्टकमाह— चिबुकं कण्ठहृदयनाभीनां चैव दक्षिणम्। ज्ञेयं पार्श्वचतुष्कं च मणिपूरादि वामकम्॥६४॥ चतुष्टयं च पार्श्वनामेतत् कोणाष्टकं पुनः। चिबुकादीनां पार्श्वचतुष्कं दक्षिणम्। मणिपूरादि, मणिपूरकं नाभिस्थानम्, नाभिहृदयकण्ठचिबुकानां वामकं^२ पार्श्वचतुष्कं चैतत्कोणाष्टकम्॥६४-६५॥ अनन्तरमायुधावरणन्यासमाह— हृदयस्थत्रिकोणस्य चतुर्दिक्षु बहिर्न्यसेत्॥६५॥ शरचापौ पाशसृणी हृदये^३ वक्षसि तिष्ठतीति हृदयस्थं स्तनद्वयमध्यनिम्नत्रिकोणाकारं हृदयस्थ- त्रिकोणमित्युच्यते। तस्य बहिश्चतुर्दिक्षु प्रागादिषु कामेश्वरीकामेश्वरयोः शरचापौ पाशसृणी ^४चेत्यायुधंचतुष्टयं ^५मिलितं न्यसेत्। ^६शरचापौ पाशसृणी इति पुंस्त्री- भेदेन प्रत्येकं द्वन्द्वमित्यष्टौ। अत्रैव वक्ष्यति— इसके आठ कोणों को कहते हैं— चिबुक (ठोडी), कण्ठ, हृदय और नाभि इन चारों का दाहिना भाग तथा मणिपूर (नाभि) आदि का बायां भाग, ये ही सब मिल कर अष्टकोण चक्र के आठ कोण बनते हैं ॥६४-६५॥ चिबुक (ठोडी) आदि के चार दाहिने पार्श्व (भाग) और मणिपूर आदि, अर्थात् नाभि, हृदय, कण्ठ, चिबुक के चार बायें पार्श्व मिलकर इस कोणाष्टक की रचना करते हैं ॥६४-६५॥ अब आयुधावरण न्यास को कहते हैं— हृदय में स्थित त्रिकोण की चारों दिशाओं में बाहर की तरफ बाण, धनुष, पाश और अंकुश का न्यास करे ॥६५-६६॥ हृदयस्थ त्रिकोण का अर्थ है दोनों स्तनों के मध्य में नीचे विद्यमान त्रिकोण के आकार का स्थान। उसके बाहर पूर्व आदि चारों दिशाओं में कामेश्वरी और कामेश्वर दोनों के बाण, धनुष, पाश और अंकुश इन चार-चार आयुधों का न्यास करे। शरचापौ तथा पाशसृणी पदों में 'शरो च चापौ च, पाशौ च सृणी च' इस तरह का द्विवचनान्त १. मतम्—क. ग.। २. वाम-ख. ग. ने. ज., नास्ति-झ. उ.। ३. 'हृदये''''प्रागादिषु' इति पाठाऽग्रे 'पाशद्वयं न्यसेत्' इत्यतः परं दृश्यते-ख. ज. झ. उ.। ४. चेत्यायुधाष्टकं-क.। ५. 'मिलितं' नास्ति-क. ग. ने. उ.। ६. 'शर''''मिलितं' केवलं झ. दृश्यते।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५७ बाणान् नेत्रे भ्रुवोश्चापौ कर्णे पाशद्वयं न्यसेत् । १सृणिद्वयं च नासाग्रे दक्षिणाग्रं तु विन्यसेद् ॥ (३।७०-७१) इति ॥६५-६६॥ ततस्त्रिकोण२चक्रव्यापकमाह— त्रिकोणाय नमस्तथा । विन्यस्य “त्रिकोणाय नमः” इति मन्त्रेण रेखात्रयं संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य ॥ त्रिकोणे न्यस्तव्या देवीराह— तस्य कोणेषु अग्रदक्षान्तरेषु च ॥६६॥ कामेश्वर्यादिदेवीनां३ मध्ये देवीं च विन्यसेत् । तस्य त्रिकोणस्य, अग्रदक्षोत्तरेषु कामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिन्यः, तासां कामे- श्वर्यादिदेवीनां मध्ये देवीं च विन्यसेदिति । मध्ये बैन्दवे श्रीचक्रे । देवीं प्रकाश- विमर्शसामरस्यरूपां त्रिपुरसुन्दरीं च४ विन्यसेदित्यर्थः ॥६६-६७॥ द्वन्द्व समास है । इससे पुरुष और स्त्री, कामेश्वर और कामेश्वरी के भेद से आठ आयुधों का विन्यास किया जायगा । यहीं आगे (३।७०-७१) आठ आयुधों के विषय में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि दोनों नेत्रों में बाणों को, दोनों भौंहों पर धनुषों को, दोनों कानों में पाशों को और नासाग्रों में दक्षिणाग्र अंकुशों को रखे ॥६५-६६॥ इसके बाद त्रिकोण चक्र का न्यास बताते हैं— “त्रिकोणाय नमः” इस मन्त्र से इस चक्र का न्यास करे ॥ “त्रिकोणाय नमः” इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए तीनों रेखाओं का स्पर्श करते हुए व्यापक न्यास करे ॥ त्रिकोण में इन देवियों का न्यास किया जाता है— उस त्रिकोण के अग्र, दक्षिण और उत्तर में कामेश्वरी आदि देवियों का और मध्य भाग में त्रिपुरसुन्दरी का न्यास करे ॥६६-६७॥ उस त्रिकोण की आगे की, दाहिनी और बाईं रेखाओं में कामेश्वरी, वज्रेश्वरी और भगमालिनी देवी का और तीनों देवियों के बीच में देवी (त्रिपुरसुन्दरी) का विन्यास करे । मध्य का अर्थ यहाँ बैन्दव चक्र है । इस बैन्दव चक्र में प्रकाशविमर्शसामरस्य-स्वरूपिणी त्रिपुरसुन्दरी का न्यास करना चाहिये ॥६६-६७॥ १. नास्ति श्लोकार्धः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'चक्र' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ३. देवाश्च-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ४. 'च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । १७

२५८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः श्रीचक्रन्यासमुपसंहरति— एवं मयोदितो देवि न्यासो गुह्यतमक्रमः ॥६७॥ स्पष्टम्¹ ॥६७॥ अतस्त्वयाऽप्येतन्न्यासजातं गोप्यमित्याह— एतद् गुह्यतमं² कार्यं त्वया वै वीरवन्दिते । स्पष्टम्³ ॥ ननु किमेतन्न कस्मैचिदपि कथनीयमित्यत⁴ आह— समयस्थाय दातव्यं समयस्थाय ⁵कौलिकाय समयाचारनिष्ठाय देयम् । पशुसमयाचार⁶निष्ठाय न देयमित्यर्थः ॥ ननु कौलिकसमयस्थायाऽपि⁷ सर्वस्मै देयम् ? नेत्याह— नाशिष्याय कदाचन ॥६८॥ समयस्थायापि अशिष्याय⁸ न देयम् ॥६८॥

इस श्रीचक्रन्यास का अब उपसंहार करते हैं— हे देवि ! इस तरह से मैंने तुमको इस न्यास की अत्यन्त गोपनीय पद्धति को समझाया है ॥६७॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥६७॥ यह अत्यन्त गोपनीय है, इसीलिये तुम्हें भी इस न्यास को गुप्त रखना चाहिये— हे वीरवन्दिते ! तुम्हें भी इसे अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है । क्या इसे किसी को नहीं बताना चाहिये, इस पर कहते हैं— नियमों का पालन करने वाले को ही इसे बताना चाहिये ॥ समय (नियम) का पालन करने वाले कौलिक को ही, आचारनिष्ठ साधक को ही इसका उपदेश करना चाहिये । अन्य सम्प्रदायों के आचार, नियम आदि का अनुसरण करने वालों को इसका उपदेश नहीं करना चाहिये ॥ क्या सभी कौलिकों को इसका उपदेश किया जा सकता है? इस पर कहते हैं, नहीं— जो शिष्य नहीं है, उसको इसका उपदेश कभी न करे ॥६८॥ कौलिक आचार-विचार का पालन करने वाला भी यदि शिष्य नहीं बना है, तो उसको इस विषय का उपदेश नहीं करना चाहिये ॥६८॥

१. स्पष्टमेतत्–ज. । २. तरं–ख. च. छ. ज. झ. उ. । ३. स्पष्टमेतत्–ज. । ४. आह–क. ग. । ५. कौलिकसम–ख. ने. झ. उ. । ६. पराय–ख. ने. ज. झ. उ. । ७. 'अपि' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ८. ष्याय अन्याशिष्याय–क. ग. झ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५९ मयाऽप्येतत् त्वदन्यस्य कस्यापि न पुरा¹ प्रकटीकृतमित्याह— गुप्ताद् गुप्ततरं चैतत् तवाऽद्य प्रकटीकृतम्। गुप्तादपि² गुप्ततरम्, रहस्यादप्यत्यन्त³रहस्यत्वात्। एतत् तव मदंशभूत- विमर्शात्मिकायाः प्रियतमाया अपि यतो ⁴मयाऽद्य प्रकटीकृतम्। पुराऽन्यस्मै न प्रकटीकृतमिति तात्पर्यम् ।।६९।। अस्यैव न्यासस्य पुनः प्रकारान्तरमाह— मूलदेव्यादिकं न्यासमणिमादिमन्तं पुनर्न्यसेत् ।।६९।। पूर्वमणिमादिमूलदेव्यन्तं श्रीचक्रावरणदेवतान्या(समुक्त्वा⁵?सं कृत्वा) इदानीं मूलदेव्याद्यणिमादिमन्तं पुनः श्रीचक्रावरणदेवतान्यासं कुर्यादित्यर्थः ।।६८।। मूल⁶देव्यादिन्यासप्रकारमेवाह— शिरस्त्रिकोणे पूर्वादि कामेश्वर्यादिका न्यसेत्। मैंने भी अब तक इसको तुम्हारे सिवाय किसी को नहीं बताया है, यही बात अब कह रहे हैं— गुप्त से भी गुप्ततर इस न्यास को आज ही मैंने तुम्हारे सामने प्रकट किया है ।। गुप्त से भी गुप्ततर का अभिप्राय है कि यह न्यास रहस्यों का भी रहस्य है, इसीलिये इसको बहुत ही छिपा कर रखा जाता है। आज तक मैंने इसीलिये इसको छिपा कर रखा। तुम तो मेरे ही विमर्शात्मक स्वरूप वाली मेरी प्रियतमा हो, अतः आज मैंने तुम्हारे सामने इस रहस्य को खोला है। इससे पहले इसको किसी को भी नहीं बताया है ।। इसी न्यास की अब दूसरी विधि बताते हैं— पुनः इसी न्यास को मूलदेवी से प्रारंभ कर अणिमादि पर्यन्त क्रम से संपन्न करे ।।६९।। अभी अणिमादि से प्रारंभ कर मूलदेवी पर्यन्त न्यास की विधि बताई गई है। अब मूलदेवी से प्रारंभ कर अणिमादि पर्यन्त श्रीचक्र के आवरण देवताओं के विन्यास की विधि बताई जा रही है कि आगे बताए क्रम से उन देवताओं का अपनी देह में न्यास करे ।।६९।। इसी मूलदेव्यादि न्यास की विधि बताते हैं— शिरःस्थान स्थित त्रिकोण के मध्य में मूलदेवी का और त्रिकोण की तीनों रेखाओं में कामेश्वरी आदि का न्यास करे ।। १. 'पुरा' नास्ति-क. ग. । २. 'अपि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. दप्यतिरह- ख. ज. झ. उ. । ४. प्रियतमेन मया-क. ग. । ५. न्यासमुक्तम्-क. । न्यास उक्त इति पाठेन भाव्यम् । ६. देव्यादि-ख. ने. ज. उ.

२६२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः चूडादिकेऽर्धनिम्नेऽर्धं शेषार्धं कर्णपृष्ठके । कर्णपूर्वे त्वपाङ्गे च तस्य मूले च विन्यसेत् ॥७३॥ कर्णोत्तरं कर्णस्य पश्चाद्भागः । चूडादिके चूडाया आदिर्र्लाटम् । अर्धनिम्ने कर्णोत्तरानन्तरं न्यसेदिति सम्प्रदायः । निम्नं शिरःपश्चान्निम्नस्थलम् अवटुरेव । कोऽर्थः ? चूडादिनेत्रमूलापाङ्गकर्णपूर्वपृष्ठेषु सर्वज्ञादीनां दशानामर्धं विन्यसेत् । ४अथ तासामेवार्धमवट्वन्तरकर्णपृष्ठपूर्वान्यनेत्रापाङ्गमूलेषु विन्यसेदित्यर्थः । ननु सर्वज्ञादीनां नाम न कीर्तितम्, कथमत्र ता एव न्यस्तव्याः कथ्यन्ते ? उच्यते— पूर्वचक्रे वशिन्याद्या न्यस्तव्याः कथिताः, अनन्तरोपरिचक्रे सर्वसिद्ध्याद्या न्यस्तव्याः कथ्यन्ते । अतस्तयोरपि मध्य५दशस्थानेषु पारिशेष्यात् सर्वज्ञाद्या न्यस्तव्या इति गृह्यन्ते ॥७२-७३॥ सर्वसिद्धाद्यावरणन्यासमाह— सर्वसिद्धादिकं कण्ठे प्रादक्षिण्येेन विन्यसेत् । का तथा बाकी बचे आधे देवताओं का अवटु, कर्णपृष्ठ, कर्णपूर्व, अपाङ्ग और नेत्रमूल में विन्यास करे ॥७२-७३॥ कर्णोत्तर का अर्थ है कान का पिछला भाग । चूडा का अर्थ यहाँ केश लिया गया है । शिर के केशों का आरंभ ललाट से ही होता है । कान के पिछले हिस्से के बाद अर्धनिम्न स्थान में न्यास करना चाहिये । यहाँ निम्न शब्द से सिर के पीछे का नीचे का भाग गृहीत होता है, जिसको अवटु (गर्दन का पिछला भाग) कहते हैं । इसका भाव यह है कि ललाट नेत्रमूल, अपाङ्ग, कर्णमूल और कर्णपृष्ठ में सर्वज्ञा प्रभृति दस देवियों में से आधी पाँच देवियों का न्यास करे । इसके बाद उन्हीं में से बची हुई आधी देवियों का अवटु, कर्णपृष्ठ कर्णमूल, अपाङ्ग और नेत्रमूल में विन्यास करे । प्रश्न उठता है कि यहां सर्वज्ञा आदि के नामों का तो उल्लेख है नहीं, तब उनका यहाँ न्यास कैसे किया जा सकता है ? इसका समाधान यह है कि पूर्व चक्र में वशिनी आदि के न्यास का उल्लेख है और आगे वाले चक्र में सर्वसिद्धि आदि देवियों के न्यास का उल्लेख मिलता है । अतः इन दोनों के बीच में विद्यमान इस चक्र के दस स्थानों में बीच में बची हुई सर्वज्ञा प्रभृति देवियों का ही विन्यास प्राप्त होगा ॥७२-७३॥ सर्वसिद्धि आदि देवताओं का न्यास बताते हैं— सर्वसिद्धि आदि दस देवियों का कण्ठ के चारों तरफ प्रदक्षिणा क्रम से विन्यास करे ॥७४॥ १. चूडादिके च निम्नाग्रे—ख. ने. च. ज. झ. । २. शेषार्धं कर्णपृष्ठयोः—ख. ने. च. ज. झ.। ३. कर्णे पूर्वे—क. ग. ने., कर्णमूले—ड.। ४. अथवाऽऽसामेवोत्तरार्धमवट्वन्तरकर्ण— ड.। ५. मध्यवर्ति—क., मध्यग—ख. ने. च. ज. झ.

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २६३ १स्पष्टम् ॥७४॥ सर्वसंक्षोभिण्याद्यावरणन्यासमाह— हृदये मनुकोणस्थाः शक्तयोऽपि च पूर्ववत् ॥७४॥ हृदये वक्षसि । पूर्ववत् प्रादक्षिण्येन । मनुकोणस्थाः शक्तयश्चतुर्दशकोण- निवासिन्यः सर्वसंक्षोभिण्याद्याः, न्यस्तव्या इति शेषः ॥७४॥ अनङ्गकुसुमाद्यावरणन्यासमाह— २नाभावष्टदलं तत्तु वंशे वामे च पार्श्वके । उदरे सव्यपार्श्वे च न्यसेदादिचतुष्टयम् ॥७५॥ वंशवामान्तरालादि न्यसेदन्यच्चतुष्टयम् । नाभौ नाभिदेशे, अष्टदलं पद्मम् । तत्त्विति३ तत् पूर्वोक्तानङ्गकुसुमाद्यष्टकं परामृश्यते । तदादिचतुष्टयम् अनङ्गकुसुमाऽनङ्गमेखलाऽनङ्गमदनाऽनङ्गमदना- तुराणां चतुष्टयम् । वंशः४ पृष्ठास्थि । सव्यपार्श्वं दक्षिणपार्श्वम् । वंशवामान्तरालादि वंशवामपार्श्वयोरन्तरालम् । आदिशब्दाद् वामपार्श्वपुरोभागयोरन्तरालं पुरोभाग- इसका अर्थ स्पष्ट है ॥७४॥ सर्वसंक्षोभिणी आदि आवरण देवताओं का न्यास बताते हैं— चतुर्दशार चक्र स्थित शक्तियों का विन्यास हृदय के चारों तरफ प्रदक्षिणा क्रम से करे ॥७४॥ हृदय अर्थात् अपने वक्षस्थल में, पहले बताई गई विधि से, अर्थात् प्रदक्षिणा के क्रम से मनुकोण (चतुर्दशार) स्थित सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह शक्तियों का विन्यास करना चाहिये ॥७४॥ अनङ्गकुसुमा आदि आवरण देवताओं का न्यास बताते हैं— नाभि में अष्टदल कमल है । उसके पीछे, बायें भाग में, उदर में और दाहिने भाग में स्थित चार दलों में अनङ्गकुसुमा आदि चार देवियों का तथा इन्हीं चारों स्थानों के अन्तराल में स्थित चार दलों में चार देवियों का विन्यास करना चाहिये ॥७५-७६॥ नाभिस्थान में अष्टदल पद्म की स्थिति मानी गई हैं । तत् शब्द से पूर्वोक्त अनंग- कुसुमा आदि आठ देवियों का ग्रहण किया जाता है । इनमें से पहली चार हैं—अनंग- कुसुमा, अनंगमेखला, अनंगमदना और अनंगमदनातुरा । वंश शब्द पीठ की हड्डी का वाचक है । सव्य पार्श्व का अर्थ है दक्षिण भाग, वंशवामान्तरालादि का अर्थ है वंश और १. स्पष्टमेतत्-ज. । २. नाभौ त्वष्ट-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ३. 'तत्त्विति.... तुराणां चतुष्टयम्' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ४. तद्धि वंशे वंशपृष्ठास्थिनि-ख. ज. झ. उ. ।

२६४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः दक्षिणपार्श्वयोरन्तरालं दक्षपार्श्वपृष्ठवंशयोश्चान्तरालं गृह्यते । अन्यच्चतुष्टयम् अनङ्गरेखानङ्गवेगिन्यनङ्गाङ्कुशानङ्गमालिनीनां चतुष्टयम् । नाभिदेशस्य पश्चिमादिदक्षिणपार्श्वान्तमनङ्गकुसुमादीनां चतुष्टयं ^१वाय्वादिनैर्ऋतान्तमनङ्ग- रेखादीनां चतुष्टयं न्यसेदित्यर्थः ॥७५-७६॥ कामाकर्षिण्याद्यावरणन्यासमाह— स्वाधिष्ठाने न्यसेत् स्वस्य पूर्वाद्दक्षावसानकम् ॥७६॥ चतस्रस्तु चतस्रस्तु चतुर्दिक्षु क्रमान्न्यसेत् । स्वाधिष्ठानकमलप्रदेशे, स्वस्य पूर्वात् पूर्वदिगादिरारभ्य, दक्षावसानकं दक्षिणदिगवसानपर्यन्तम्, चतुर्दिक्षु प्रतिदिशं चतस्रश्चतस्रः शक्तयः कामाकर्षि- ण्याद्याः क्रमेण न्यस्तव्याः । ननु कामाकर्षिण्याद्या इति कथं^२मनुमीयन्ते ? इति चेदुच्यते—पूर्ववदेव ^३पूर्वोत्तरचक्रयोः शक्तीनां नामग्रहणाद् मध्यचक्रशक्तीनां पारि- शेण्यान्नामान्यनुक्तान्यप्यवसीयन्त इति ॥७६-७७॥ वाम पार्श्व के बीच का स्थान। आदि शब्द से वाम पार्श्व और उदर के बीच का स्थान, उदर और दक्षिण भाग का अन्तराल तथा दक्षिण भाग और पृष्ठवंश का अन्त- राल गृहीत होता है। इन चार अन्तरालों में अनंगरेखा, अनंगवेगिनी, अनंगांकुशा और अनंगमालिनी—इन चार देवियों का विन्यास किया जाता है। इसका भाव यह हुआ कि नाभिस्थान के पश्चिम से लेकर दक्षिण पार्श्व पर्यन्त चार दिशाओं में अनङ्गकुसुमा आदि चार देवियों और उनके अन्तराल में स्थित वायव्य से नैर्ऋत्य पर्यन्त चार विदिशाओं में अनङ्गरेखा आदि चार देवियों का विन्यास करे ॥७५-७६॥ कामाकर्षिणी आदि आवरण देवताओं का न्यास बताते हैं— अपने स्वाधिष्ठान कमल की पूर्व दिशा से दक्षिण दिशा पर्यन्त चार दिशाओं में चार-चार शक्तियों का क्रम से विन्यास करे ॥७६-७७॥ अपने स्वाधिष्ठान कमल स्थान में पूर्व दिशा से आरंभ कर दक्षिण दिशा पर्यन्त चारों दिशाओं में कामाकर्षिणी आदि चार-चार शक्तियों का क्रमशः विन्यास करना चाहिये। यहाँ फिर प्रश्न होता है कि श्लोक में तो कामाकर्षिणी आदि का नाम नहीं है, तब उन्हीं का यहाँ न्यास किया जायेगा, यह कैसे मालूम हुआ ? उत्तर यह है कि अभी सर्वज्ञा प्रभृति शक्तियों के विन्यास में जो पद्धति अपनाई गई, उसी पद्धति से यहां भी निर्णय किया जायगा । पूर्व और उत्तर चक्रों की शक्तियों का नाम मिलता है। बीच के इस चक्र की शक्तियों का नाम न होने पर भी बची हुई शक्तियों का यहाँ विन्यास पारिशेष्य न्याय से मान लिया जायगा ॥७६-७७॥ १. 'वाय्वादि'...'चतुष्टयं' नास्ति-क. ग. उ. । २. मवसी-क. । ३. पूर्वोक्तचक्र- शक्तीनां नामग्रहणात् पारिशेष्यान्नामान्युक्तान्यवसीयन्त-ख. ते. ज्ञ. ज.।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २६५ सर्वसंक्षोभिण्यादिमुद्राशक्त्यावरणन्यासमाह— मूलाधारे न्यसेन्मुद्रादशकं साधकोत्तमः ॥७७॥ मूलाधारे मूलाधारप्रदेशे । शेषं १ स्पष्टम् ॥७७॥ ननु किं मूलाधारे मुद्रादशकं २ ध्यानेन न्यस्तव्यम् ? इत्याशङ्कायामाह— पुनर्वंशे ३ च सव्ये च वामे चैवान्तरालके । ऊर्ध्वाधो दशमु द्राश्च पुनःशब्दात् "नाभावष्टदलं तत्तु" (३।७५) इत्यष्टदलन्यासोक्तस्थाना- न्युच्यन्ते । वंशे पृष्ठवंशे । सव्ये च पार्श्वे । चकारा ४ दुत्तरदक्षिणयोः पार्श्वयोर्ग्रह- णम् । वामे चैवान्तरालके पृष्ठवंशवामपार्श्वान्तराले । चकाराद् वामपार्श्वा- द्यन्तरालानि गृह्यन्ते । कोऽर्थः ? पृष्ठवंशादिदिक्षु वायव्याद्यन्तरालेषु च, ऊर्ध्वा- ५धश्च दश मुद्रा न्यसेत् । ननु ऊर्ध्वाध इति किमान्तरं स्थानद्वयम् ? नेत्याह— ऊर्ध्वाध इति (आ?ना) ६न्तरोधर्ध्वाधः स्थानद्वयम्, सर्वसंक्षोभिणी आदि मुद्राशक्तिरूप आवरण देवताओं का न्यास अब बताते हैं— साधकोत्तम अपने मूलाधार में दस मुद्राशक्तियों का न्यास करे ॥७७॥ मूलाधार शब्द का प्रयोग यहाँ मूलाधार चक्र के स्थान के अर्थ में किया गया है । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥७७॥ प्रश्न है कि मूलाधार स्थान में दस मुद्राओं का न्यास ध्यान के द्वारा करना है अथवा कोई दूसरी पद्धति है ? इसका समाधान यह है— पुनः अष्टदल की तरह वंश (पीठ), वाम, दक्षिण और उत्तर स्थानों में तथा उनके चार अन्तरालों में एवं ऊपर तथा नीचे—इन दस स्थानों में दस मुद्राओं का न्यास करना चाहिये ॥७८॥ पुनः शब्द अष्टदल पद्म के न्यास के अवसर पर (३।७५) बताई गई पद्धति से ही यहाँ भी न्यास किया जाय, इस बात की सूचना देता है । वंश शब्द पृष्ठवंश का बोधक है । 'सव्ये च' यहाँ का चकार उत्तर और दक्षिण भाग का भी अध्याहार करता है । वाम अन्तराल शब्द पृष्ठवंश और वाम पार्श्व के बीच की विदिशा का बोधक है । यहाँ भी चकार शब्द बाकी तीनों अन्तरालों का भी अध्याहार करता है । इसका भाव यह है कि पृष्ठवंश (पश्चिम) आदि दिशाओं में और वायव्य आदि विदिशाओं में तथा ऊपर-नीचे— इन दस दिशाओं में दस मुद्राओं का न्यास करे । यहाँ फिर प्रश्न उठता है कि ऊपर १. शिष्टम्-झ. उ. । २. केन विधानेन-क. ग. । ३. पुनः सव्ये च वंशे च-ख. नै. च. छ. ज. झ. । ४. दुत्तरयोर्ग्रह-ख. ज. झ. उ. । ५. धस्ताच्च-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. अनन्तरो(क्तो)र्ध्वाधः-ज. झ.

२६६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इन्द्रेशानदिशोर्मध्ये स्थानमन्यत्¹ प्रकीर्तितम् । नैर्ऋताम्बुदिशोर्मध्ये स्थानमन्यत् प्रकीर्तितम् ॥ इति तत्त्वविमर्शिन्यामस्मदुक्तरीत्या दशलोकपालार्चनरीत्यैव स्थानद्वयं शिष्टमुद्रा²द्वयस्य कल्पनीयम् ॥ ७८ ॥ ब्राह्मण्याद्यावरणन्यासमाह— ऊर्ध्वाधोवर्जितं पुनः ॥ ७८ ॥ ब्राह्मण्याद्यष्टकं दक्षजङ्घायां विन्यसेदित्यनुषङ्गः । शिष्टं स्पष्टम् ॥ ७८-७९ ॥ ननु दक्षजङ्घायां विन्यसेदित्युक्तम्, तत्र³ तासां कानि स्थानानीत्यत⁴ आह— तास्तु⁵ पूर्ववत् । ताः ब्राह्मण्याद्याः । पूर्ववत् “पुनर्वंशे च सव्ये च” (३।७८) इत्युक्तस्थानेषु । अत्र और नीचे ये दोनों क्या आन्तर स्थान हैं ? उत्तर है कि नहीं। तत्त्वविमर्शिनी नामक ग्रन्थ में स्वयं ग्रन्थकार ने— इन्द्र (पूर्व) और ईशान दिशा के बीच में ऊर्ध्व स्थान की तथा नैर्ऋत्य एवं पश्चिम दिशा के बीच में अधःस्थान की कल्पना की गई है ॥ इस तरह से दस लोकपालों के पूजन के प्रसंग में ऊर्ध्व और अधः स्थान की कल्पना की है । बाकी बची दो मुद्राओं का विन्यास इन्हीं स्थानों में करे ॥ ब्रह्माणी आदि आवरण देवताओं का न्यास बताते हैं— ऊर्ध्व और अधो दिशाओं को छोड़ कर बाकी आठ में ब्रह्माणी आदि देवियों का विन्यास दक्ष जंघा आदि स्थानों में करे ॥ प्रस्तुत श्लोक में कोई क्रिया नहीं है, अतः प्रसंगानुसार 'विन्यसेत्' (न्यास करे) क्रिया का अध्याहार कर लेना चाहिये । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥ ७८-७९ । प्रश्न है कि यहाँ तो केवल दक्ष जंघा का उल्लेख है, इनके आठ स्थान कौन-कौन से होगें ? इसी का निर्णय करते हैं— इनके स्थान का निर्णय पूर्ववत् करना चाहिये । इन ब्रह्माणी प्रभृति आठ देवियों के स्थानों का निर्णय पहले (३।७८) बताई गई १. मस्य—ख. ने. ज. झ. उ. । २. मुद्रास्थानद्वयमित्यर्थः—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'तत्र' नास्ति—ख. ने. झ. उ. । ४. नीत्याह—ख. ने. ज. झ. उ. । ५. ताश्च— ख. ने. च. छ. ज. झ. ।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २६७ पृष्ठवंशशब्देन पश्चाद्भागो लक्ष्यते। दक्षजङ्घायाः पश्चिमादिचतुर्दिक्षु वायव्या¹- दिविदिक्षु च ता ब्रह्माण्याद्या न्यस्तव्या इत्यर्थः ॥७९॥ अणिमाद्यावरणन्यासमाह— वामजङ्घां समारभ्य वामादिक्रमतोऽपि च ॥७९॥ सिद्ध्राष्टकं न्यसेत् तेषु द्वयं पादतले न्यसेत् । वामजङ्घां समारभ्य वामजङ्घायाः पश्चिमभागमारभ्य। वामादिक्रमतोऽपि च वामान्त²रालक्रमेण। तेष पूर्वोक्तेषु स्थानेषु। सिद्ध्राष्टकं न्यसेत्। शिष्टद्वयं पादतले पादतलयोर्न्यसेदित्यर्थः³ ॥७९-८०॥ उक्तन्यासस्योत्कर्षं दर्श⁴यन्नुपसंहृत्य फलभूतां वासनां विधत्ते— कारणात् प्रसृतं न्यासं दीपाद दीपमिवोदितम् ॥८०॥ एवं विन्यस्य देवेशि⁵ स्वाभेदेन⁶ विचिन्तयेत् । पद्धति से करना चाहिये। यहाँ पृष्ठवंश शब्द केवल पिछले भाग को लक्षित करेगा। दाहिनी जंघा की पश्चिम आदि चार दिशाओं में और वायव्य आदि चार विदिशाओं में ब्रह्माणी इत्यादि आठ देवियों का न्यास करना चाहिये ॥७९॥ अब अणिमा आदि आवरण देवियों का न्यास बताते हैं— वाम जंघा के वाम भाग से और वाम अन्तराल क्रम से भी आठ सिद्धियों का न्यास करे। बची दो सिद्धियों का न्यास पाद-तल में करे ॥७९-८०॥ वाम जंघा के पश्चिम भाग से प्रारम्भ कर और वाम अन्तराल के क्रम से भी उन्हीं पूर्वोक्त आठ स्थानों में आठ सिद्धियों का न्यास करे। बची हुई दो सिद्धियों का न्यास अपने पैरों के दोनों तलवों में करे ॥७९-८०॥ इस न्यास की उत्कृष्टता को बताते हुए अब इस प्रकरण का उपसंहार किया जा रहा है, साथ ही इसके प्रभाव से संपन्न होने वाली अभेद वासना का भी उपदेश किया जा रहा है— एक दीपक से दूसरे दीपक की भाँति अपने परम कारण परम तत्त्व से प्रज्वलित यह न्यास उससे भिन्न नहीं है। अतः हे देवेशि ! अपने शरीर में इनका न्यास करने के उपरान्त साधक अपने को उस परम तत्त्व से अभिन्न माने ॥८०-८१॥ १. व्याद्यन्तरालेषु-ख. नि. ज. झ. उ. । २. रालादि-ख. ज. झ. उ. । ३. दिति-झ., 'इत्यर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ४. यितुमुप-ख. । ५. देवेशीं-ख. ग. ज. झ. । ६. न्यासप्रभावेन-ख., स्वात्माभेदेन जि-क., स्वात्माभेदेन-ग. ।

२६८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः कारणात् प्रकाश विमर्शसामरस्यरूपान्निखिल¹जगद्रूपात् । दीपाद् दीपमिव प्रसृतं महाभासं कारणानुरूपम् । एवमुक्तप्रकारेण । उदितं कथितम् । न्यासं विन्यस्य । स्वात्मनोऽभेदेन ²चिन्तयेत् । श्रीचक्रावयवान् सशक्तिकान् स्वदेहा- वयवैरपृथक्त्वेन विभाव्य तदधिष्ठात्र्या परया च स्वात्मनोऽभेदं³ भावयेदित्यर्थः ॥८०-८१॥ उक्तैस्त्रिभिः षोढान्यासैः परचिदानन्दलक्षणं भावयन् परिपक्वहृदयो बाह्य- पूजाक्रियायोग्यतार्थे करशुद्ध्यादिन्यासं कुर्यादित्याह— ततश्च करशुद्ध्यादिन्यासं कुर्यात् समाहितः ॥८१॥ ततः त्रिविधन्यासानन्तरम् । करशुद्ध्यादिन्यासम् । कारणात्मपरामृष्टकार्यरूपाऽङ्गुलिस्थिताम्⁴ । करोमि चिन्मयीं शुद्धिं करयोः ⁵स्पर्शशोधिनीम् ॥ (सु० वा० २४) प्रकाश-विमर्श का सामरस्यमय स्वरूप ही सारे जगत् का कारण है। ¹एक दीपक से जलाया गया दूसरा दीपक जैसे अपने कारणभूत दीपक के ही समान प्रकाशित होता है, उसी तरह से ऊपर बताया गया न्यास भी अपने कारणभूत परम तत्त्व के समान ही सर्वत्र व्याप्त है, ऐसा विचार कर उक्त न्यास के द्वारा अपने शरीर को परम तत्त्व से अभिन्न माने। समस्त शक्तियों से सम्पन्न श्रीचक्र के अवयवों को अपने शरीर के यंत्रों से अभिन्न मानकर उनको अधिष्ठात्री परम शक्ति से अपनी अभिन्नता की भावना करे ॥८०-८१॥ इस तरह से षोढा न्यास, श्रीचक्र न्यास और मूलदेव्यादि न्यास—इन तीन न्यासों की सहायता से स्वयं अपने को साधक परचिदानन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित मान कर निर्मल- चित्त हो जाय। तब बाह्य पूजा की योग्यता अर्जित करने के लिये करशुद्धि आदि न्यासों को करे, यही विषय अब वर्णित है— इसके बाद समाहित चित्त हो साधक करशुद्धि आदि न्यासों को सम्पन्न करे ॥८१॥ उक्त त्रिविध न्यासों को संपन्न करने के बाद साधक करशुद्धि आदि न्यासों को करे। शिवानन्द मुनि ने सुभगोदयवासना में करशुद्धि न्यास की विधि यह बताई है— पांचभौतिक देह में कार्यरूप से प्रकट हुई दाहिने और बायें हाथ की अंगुलियाँ वास्तव में अपने कारणभूत प्रकाश और विमर्श से अभिन्न हैं। प्रकाश और विमर्श की कारण के रूप में भावना कर मैं इन कार्यरूप में परिणत अंगुलियों में चित्स्वरूपिणी शुद्धि १. निखिलनिधान-झ.। २. विचि-क. ग.। ३. नोऽप्यभेदं-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. भूताङ्गुलिस्थितम्-मु.। ५. परिशोधिनीम्-मु., स्पर्शबोधिनीम्-क. ग.। १. ठीक इसी अभिप्राय का श्लोक कालिदास के रघुवंश में भी मिलता है—"न कारणात् स्वाद् बिभिदे कुमारः प्रवर्तितो दीप इव प्रदीपात्" (५/३७)

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २६९ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या करशुद्धिन्यास आदिर्यस्य न्यासस्य। जातावेक^१- वचनम्। समाहितः सावधानः। करशुद्ध्यादिन्यासश्चतुःशतीशास्त्रोक्तः (१।१२६- १२९)। अतो नात्रोच्यते, केवलं नाम्नैव गृह्यते ॥८१॥ तत्रानुक्तं विद्यान्यासमाह— मूर्ध्नि गुह्ये च हृदये ^२नेत्रत्रितय एव च। श्रोत्रयोर्युगले देवि^३ मुखे च भुजयोः पुनः ॥८२॥ पृष्ठे जान्वोश्च नाभौ च विद्यान्यासं समाचरेत्। विद्याया बीजत्रयेण न्यासो विद्यान्यासः। मूर्ध्नि वाग्भवबीजम्, गुह्ये काम- राजबीजम्, हृदये शक्तिबीजम्। एवं सर्वत्र^६ स्थानत्रये बीजत्रयमुच्चरन् न्यसे- दित्यर्थः। शिष्टं स्पष्टम् ॥८२-८३॥ करशुद्ध्यादीनां नामान्याह— करशुद्धि पुनश्चैव आसनानि षडङ्गकम् ॥८३॥ श्रीकण्ठादींश्च वाग्देवीः

का आधान कर रहा हूं, जिससे कि मेरे दोनों हाथ शुद्ध हो जांय और इनसे मैं जिन पदार्थों का स्पर्श करूं, वे भी शुद्ध हो जांय, उनमें किसी प्रकार का स्पर्शदोष न आवे ॥ इन न्यासों में पहला करशुद्धि न्यास है, अतः इनको करशुद्ध्यादि न्यास कहा जाता है। एकवचन समुदाय का वाचक है। समाहित का अर्थ है सावधान। करशुद्धि आदि न्यासों का वर्णन चतुःशती शास्त्र (१।१२६-१२९) में किया जा चुका है। अतः उनका वर्णन यहां नहीं किया गया है, केवल नाम से ही उनका उल्लेख कर दिया गया है ॥८१॥ चतुःशती शास्त्र में अनुक्त विद्यान्यास का यहां वर्णन करते हैं— हे देवि ! शिर, गुह्य और हृदय में, तीनों नेत्रों में, दोनों कान और मुंह में दोनों भुजा और पृष्ठ में, दोनों जानु और नाभि में विद्या न्यास करे ॥८२-८३॥ श्रीविद्या के तीन बीजों से जो न्यास किया जाता है, उसे विद्यान्यास कहते हैं। सिर में वाग्भव बीज, गुह्य में कामराज बीज और हृदय में शक्तिबीज का न्यास करे। इसी तरह सर्वत्र तीन-तीन स्थानों में तीनों बीजों का क्रमशः उच्चारण करता हुआ साधक इस विद्या न्यास को संपन्न करे। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥८२-८३॥ अब करशुद्धि आदि न्यासों के नाम बताते हैं— करशुद्धि न्यास, आसन न्यास, षडङ्ग न्यास, श्रीकण्ठादि न्यास और वशि- न्यादि न्यास यहां किये जाते हैं। ८४-८४॥ १. वेकत्वम्-ख. ने. झ. उ.। २. नेत्रेषु त्रितयेषु च-क. ग.। ३. चैव-क. ग.। ४. ततः-ग.। ५. विद्याया द्वे-क. ग.। ६. 'सर्वत्र' नास्ति-ख. ने. झ. उ.।

२७० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वाग्देव्यो वशिन्याद्याः । श्रीकण्ठादिन्यासः १ स्वच्छन्दसंग्रहोक्तः । तन्त्रान्तरे प्रसिद्धत्त्वादिह नोक्तः । शिष्टं स्पष्टम् ।।८३-८४।। कामेश्वर्यादिदेवीनां न्यासमाह— आधारे हृदये पुनः । शिखायां बैन्दवस्थाने त्वग्निचक्रादिका न्यसेत् ।।८४।। बैन्दवस्थाने शिखायामिति व्यत्ययेन क्रमो ज्ञेयः । बैन्दवस्थानम् "दीपाकारो- ऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते" (१।२८) इति पूर्वोक्तं ललाटम् । शिखा नाम कुण्ड- लिन्या अग्रं शिवस्य विश्रान्तिस्थानम् । अत्र श्रुतिः—"तस्याः शिखाया मध्ये पर- मात्मा व्यवस्थितः" २ (तै० आ० १०।१२।१२) इति । तेन शिखाशब्देन तद्व्याप्ति- स्थानं ब्रह्मरन्ध्रं लक्ष्यते । अग्निचक्रादिकाः—"अग्निचक्रे कामगिर्यालये मित्रेश- नाथात्मके ३श्रीकामेश्वरीदेवीरुद्रात्मशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि, सूर्यचक्रे जाल- न्ध शनाथात्मके वज्रेश्वरीदेवीविष्ण्वात्मशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि, वशिनी आदि वाग्देवता कहलाती हैं। श्रीकण्ठादि न्यास स्वच्छन्दसंग्रह में वर्णित है। १अन्य तन्त्रों में यह प्रसिद्ध है, अतः यहाँ उसका वर्णन नहीं किया गया है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ।।८३-८४।। कामेश्वरी आदि देवियों का न्यास अब बताते हैं— आधार, हृदय, बैन्दव स्थान और शिखा में क्रमशः कामेश्वरी आदि देवियों का विन्यास करे ।।८४।। श्लोक में शिखा का पहले और बैन्दव स्थान का उल्लेख बाद में है, किन्तु इनका क्रम बदल कर पहले बैन्दव स्थान और बाद में शिखा को रखना चाहिये। पहले (१।२८) बताया जा चुका है कि बैन्दव स्थान ललाट को कहते हैं। कुण्डलिनी का अग्रभाग यहाँ शिखा शब्द से बोधित होता है, जहाँ कि शिव विश्राम करते हैं। तैत्तिरीय आरण्यक कहती है —"इस शिखा के मध्य में परमात्मा विराजमान हैं"। इस तरह से शिखा शब्द से शिव की व्याप्ति का स्थान ब्रह्मरन्ध्र लक्षित होता है। अग्निचक्र आदि में कामे- श्वरी आदि देवियों का न्यास निम्न मन्त्रों का उच्चारण करते हुए करना चाहिये— "मित्रेशनाथ जिसके अधिपति हैं, ऐसे कामगिरि पीठरूप अग्निचक्र में रुद्रात्मक श्रीकामेश्वरी देवी की पादुका का मैं पूजन करता हूँ। षष्ठीशनाथ जिसके अधिपति हैं, १. श्रीकण्ठन्यासः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. इतः परम्-'स ब्रह्मा स शिवः (स हरिः) सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्' इत्याधिकः पाठः-उ. । ३. 'श्री' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । १. प्रपञ्चसार प्रदर्शित श्रीकण्ठ न्यास की चर्चा पहले पृ० १६५ की तीसरी टिप्पणी में की जा चुकी है।

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७१ सोमचक्रे पूर्णगिरिपीठे ओड्डीशनाथात्मके भगमालिनीदेवीब्रह्मात्मशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि, ब्रह्मचक्रे ओड्याणपीठे १चर्यानाथात्मके श्रीमहान्त्रिपुरसुन्दरीदेवीपरब्रह्मा- त्मशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि" इति मन्त्रैर्न्यस्तव्याः। शक्तयोऽग्निसूर्यसोमब्रह्मचक्रा- त्मिकाः२। कोऽर्थः ? आधारहृदयभ्रूमध्यब्रह्मरन्ध्रेषु वह्निसूर्यसोमब्रह्मचक्रेषु कामगिरिजालन्धरपूर्णगिर्योड्याणपीठेषु रुद्रविष्णुब्रह्मपरब्रह्मात्मक३शक्ती:४ कामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिनीमहात्रिपुरसुन्दरीर्न्यसेदित्यर्थः । अयमेवार्थः सम्प्र- दायविद्भिर्देशिकेन्द्रैः५ पद्धतिषु प्रपञ्चितः ॥८४॥ तत्त्वन्यासमाह— तत्त्वत्रयं समस्तं च विद्याबीजत्रयान्वितम् । पादादिनाभिपर्यन्तमागलं शिरसस्तथा ॥८५॥ व्यापकं चैव६ विन्यस्य ऐसे जालन्धर पीठरूप सूर्यचक्र में विष्णु स्वरूप श्रीवज्रेश्वरी देवी की पादुका का मैं पूजन करता हूँ, ओड्डीशनाथ जिसके अधिपति हैं, ऐसे पूर्णगिरि पीठमय सोमचक्र में ब्रह्मात्मक श्रीभगमालिनी देवी की पादुका का पूजन करता हूँ । चर्यानाथ जिसके अधिपति हैं, ऐसे ओड्याण पीठरूप ब्रह्मचक्र में परब्रह्मस्वरूपिणी श्रीमहान्त्रिपुरसुन्दरी देवी की पादुका का मैं पूजन करता हूँ"। कामेश्वरी आदि चार शक्तियां यहां अग्नि, सूर्य, सोम और ब्रह्मचक्र स्वरूपिणी हैं। इसका भाव यह है कि आधार, हृदय, भ्रूमध्य और ब्रह्मरन्ध्र में; वह्नि, सूर्य, सोम और ब्रह्मचक्र मे; कामगिरि, जालन्धर, पूर्णगिरि और ओड्याण पीठों में; रुद्र, विष्णु, ब्रह्म और परब्रह्म की शक्तियों के रूप में कामेश्वरी, वज्रेश्वरी, भगमालिनी और महात्रिपुरसुन्दरी नामक देवियों का न्यास करे । त्रिपुरा सम्प्रदाय के जानकार बड़े-बड़े आचार्यों ने अपनी-अपनी पद्धतियों में इस अर्थ का विस्तार किया है ॥८४॥ अब तत्त्व न्यास का उपदेश करते हैं-- विद्या के तीन बीजों का व्यस्त और समस्त रूप से उच्चारण करते हुए तीन तत्त्वों का व्यस्त और समस्त रूप में पैर से नाभि पर्यन्त, नाभि से कण्ठ पर्यन्त, कण्ठ से शिर पर्यन्त और फिर समस्त शरीर में व्यापक न्यास करे ॥८५-८६॥ १. श्रीचर्या-ने. ज. झ.। २. दिकाः-क. ख. ग. ने. । ३. त्मकचक्रेषु-ज. झ. उ. । ४. 'शक्ती:' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. शिकैः-क. ने. ज. झ. उ. । ६. चेति-ख.

२७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तत्त्वत्रयम् आत्मविद्याशिवाख्यतत्त्वानां त्रयम् । समस्तं च तत्त्वत्रयसमष्टिरूपं तुरीयं तत्त्वम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— धरादिमायान्तमात्मतत्त्वं१स्यान्तर्गतं स्मृतम् । शुद्धविद्येश्वरसदाशिवा विद्याख्यतत्त्वगाः ॥ शिवशक्तिद्वयं चैव शिवतत्त्वं प्रकीर्तितम् । प्रमातृमेयप्रमितिरूपमेतत्तत्त्रयात्मकम् ॥ एतत् तत्त्वं शिवतत्त्वं सर्वतत्त्वमयं शुभम् । इति । विद्याबीजत्रयान्वितम् । विद्याया२ बीजानि वाग्भवकामराजशक्तिबीजानि, एतद्बोजसमुदायरूपं ३तुर्यबोजम्, तैश्चतुर्भिर्बीजैरन्वितम् । पादादिनाभिपर्यन्तम्४ । ५पर्यन्तपदसामर्थ्यान्नाभ्याद्यागलं ६लक्ष्यते, शिरस इति पञ्चमीसामर्थ्याद् गलादिति च७ लभ्यते । कोऽर्थः ? आत्मविद्याशिवतुरीयतत्त्वानि मूलविद्यावाग्भव- कामराजशक्तितुरीयबीजादिकानि चतुर्थ्यन्तनमो८न्तान्युच्चार्य पादादिनाभि९- आत्मा, विद्या और शिव ये तीन तत्त्व हैं। समस्त रूप से इन्हीं तीन तत्त्वों का समष्टि तुरीय तत्त्व कहलाता है। इनका वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में मिलता है— पृथिवी से लेकर माया पर्यन्त तत्त्व आत्मतत्त्व के अन्तर्गत माने जाते हैं। शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव ये विद्यातत्त्व के अन्तर्गत हैं। शिव और शक्ति ये दो तत्त्व शिव- तत्त्व कहे जाते हैं। ये तीनों तत्त्व प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के प्रतिनिधि हैं। इन सब तत्त्वों का समष्टिस্বরূপ, जहाँ कि इन भेदों की प्रतीति समाप्त हो जाती है, तुरीय परम शिवतत्त्व है। ये चारों तत्त्व विद्या के तीन बीजों से व्यष्टि और समष्टि के रूप में जुड़े हुए हैं। विद्या के तीन बीज वाग्भव, कामराज और शक्तिबीज के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन बीजों की समष्टि से तुर्यबीज बनता है। इन चार बीजों से उक्त चार तत्त्वों को संयुक्त करना चाहिये। तब एक-एक बीज का उच्चारण करते हुए एक-एक तत्त्व का क्रमशः पैर से लेकर नाभि पर्यन्त, पर्यन्त शब्द को आगे भी जोड़ कर नाभि से कण्ठ पर्यन्त, 'शिरसः' इस पंचमी विभक्ति के उदाहरण से गले से लेकर सिर तक उक्त तीन तत्त्वों का न्यास करना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि आत्मा, विद्या, शिव और तुरीय तत्त्वों को मूलविद्या के वाग्भव, कामराज, शक्ति और तुरीय बीजों से संयुक्त कर उनको चतुर्थी विभक्ति और नमः पद के साथ जोड़ देना चाहिये। तब एक-एक का उच्चारण करते हुए पैर से नाभिपर्यन्त, नाभि से कण्ठपर्यन्त, कण्ठ से मस्तक पर्यन्त और फिर १. त्वमन्त-क. ग. । २. विद्याबी-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. तुरीय-ख. ने. उ. । ४. न्तं स्पष्टम्-क. ग. । ५. आगलमित्यादिसा-क. ग. । ६. लभ्यते-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. 'च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. नमोऽन्तकानि-क. ग. । ९. नाभ्यन्तम्-ख. ने.