भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२६८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः कारणात् प्रकाश विमर्शसामरस्यरूपान्निखिल¹जगद्रूपात् । दीपाद् दीपमिव प्रसृतं महाभासं कारणानुरूपम् । एवमुक्तप्रकारेण । उदितं कथितम् । न्यासं विन्यस्य । स्वात्मनोऽभेदेन ²चिन्तयेत् । श्रीचक्रावयवान् सशक्तिकान् स्वदेहा- वयवैरपृथक्त्वेन विभाव्य तदधिष्ठात्र्या परया च स्वात्मनोऽभेदं³ भावयेदित्यर्थः ॥८०-८१॥ उक्तैस्त्रिभिः षोढान्यासैः परचिदानन्दलक्षणं भावयन् परिपक्वहृदयो बाह्य- पूजाक्रियायोग्यतार्थे करशुद्ध्यादिन्यासं कुर्यादित्याह— ततश्च करशुद्ध्यादिन्यासं कुर्यात् समाहितः ॥८१॥ ततः त्रिविधन्यासानन्तरम् । करशुद्ध्यादिन्यासम् । कारणात्मपरामृष्टकार्यरूपाऽङ्गुलिस्थिताम्⁴ । करोमि चिन्मयीं शुद्धिं करयोः ⁵स्पर्शशोधिनीम् ॥ (सु० वा० २४) प्रकाश-विमर्श का सामरस्यमय स्वरूप ही सारे जगत् का कारण है। ¹एक दीपक से जलाया गया दूसरा दीपक जैसे अपने कारणभूत दीपक के ही समान प्रकाशित होता है, उसी तरह से ऊपर बताया गया न्यास भी अपने कारणभूत परम तत्त्व के समान ही सर्वत्र व्याप्त है, ऐसा विचार कर उक्त न्यास के द्वारा अपने शरीर को परम तत्त्व से अभिन्न माने। समस्त शक्तियों से सम्पन्न श्रीचक्र के अवयवों को अपने शरीर के यंत्रों से अभिन्न मानकर उनको अधिष्ठात्री परम शक्ति से अपनी अभिन्नता की भावना करे ॥८०-८१॥ इस तरह से षोढा न्यास, श्रीचक्र न्यास और मूलदेव्यादि न्यास—इन तीन न्यासों की सहायता से स्वयं अपने को साधक परचिदानन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित मान कर निर्मल- चित्त हो जाय। तब बाह्य पूजा की योग्यता अर्जित करने के लिये करशुद्धि आदि न्यासों को करे, यही विषय अब वर्णित है— इसके बाद समाहित चित्त हो साधक करशुद्धि आदि न्यासों को सम्पन्न करे ॥८१॥ उक्त त्रिविध न्यासों को संपन्न करने के बाद साधक करशुद्धि आदि न्यासों को करे। शिवानन्द मुनि ने सुभगोदयवासना में करशुद्धि न्यास की विधि यह बताई है— पांचभौतिक देह में कार्यरूप से प्रकट हुई दाहिने और बायें हाथ की अंगुलियाँ वास्तव में अपने कारणभूत प्रकाश और विमर्श से अभिन्न हैं। प्रकाश और विमर्श की कारण के रूप में भावना कर मैं इन कार्यरूप में परिणत अंगुलियों में चित्स्वरूपिणी शुद्धि १. निखिलनिधान-झ.। २. विचि-क. ग.। ३. नोऽप्यभेदं-ख. ने. ज. झ. उ.। ४. भूताङ्गुलिस्थितम्-मु.। ५. परिशोधिनीम्-मु., स्पर्शबोधिनीम्-क. ग.। १. ठीक इसी अभिप्राय का श्लोक कालिदास के रघुवंश में भी मिलता है—"न कारणात् स्वाद् बिभिदे कुमारः प्रवर्तितो दीप इव प्रदीपात्" (५/३७)