भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २६७ पृष्ठवंशशब्देन पश्चाद्भागो लक्ष्यते। दक्षजङ्घायाः पश्चिमादिचतुर्दिक्षु वायव्या¹- दिविदिक्षु च ता ब्रह्माण्याद्या न्यस्तव्या इत्यर्थः ॥७९॥ अणिमाद्यावरणन्यासमाह— वामजङ्घां समारभ्य वामादिक्रमतोऽपि च ॥७९॥ सिद्ध्राष्टकं न्यसेत् तेषु द्वयं पादतले न्यसेत् । वामजङ्घां समारभ्य वामजङ्घायाः पश्चिमभागमारभ्य। वामादिक्रमतोऽपि च वामान्त²रालक्रमेण। तेष पूर्वोक्तेषु स्थानेषु। सिद्ध्राष्टकं न्यसेत्। शिष्टद्वयं पादतले पादतलयोर्न्यसेदित्यर्थः³ ॥७९-८०॥ उक्तन्यासस्योत्कर्षं दर्श⁴यन्नुपसंहृत्य फलभूतां वासनां विधत्ते— कारणात् प्रसृतं न्यासं दीपाद दीपमिवोदितम् ॥८०॥ एवं विन्यस्य देवेशि⁵ स्वाभेदेन⁶ विचिन्तयेत् । पद्धति से करना चाहिये। यहाँ पृष्ठवंश शब्द केवल पिछले भाग को लक्षित करेगा। दाहिनी जंघा की पश्चिम आदि चार दिशाओं में और वायव्य आदि चार विदिशाओं में ब्रह्माणी इत्यादि आठ देवियों का न्यास करना चाहिये ॥७९॥ अब अणिमा आदि आवरण देवियों का न्यास बताते हैं— वाम जंघा के वाम भाग से और वाम अन्तराल क्रम से भी आठ सिद्धियों का न्यास करे। बची दो सिद्धियों का न्यास पाद-तल में करे ॥७९-८०॥ वाम जंघा के पश्चिम भाग से प्रारम्भ कर और वाम अन्तराल के क्रम से भी उन्हीं पूर्वोक्त आठ स्थानों में आठ सिद्धियों का न्यास करे। बची हुई दो सिद्धियों का न्यास अपने पैरों के दोनों तलवों में करे ॥७९-८०॥ इस न्यास की उत्कृष्टता को बताते हुए अब इस प्रकरण का उपसंहार किया जा रहा है, साथ ही इसके प्रभाव से संपन्न होने वाली अभेद वासना का भी उपदेश किया जा रहा है— एक दीपक से दूसरे दीपक की भाँति अपने परम कारण परम तत्त्व से प्रज्वलित यह न्यास उससे भिन्न नहीं है। अतः हे देवेशि ! अपने शरीर में इनका न्यास करने के उपरान्त साधक अपने को उस परम तत्त्व से अभिन्न माने ॥८०-८१॥ १. व्याद्यन्तरालेषु-ख. नि. ज. झ. उ. । २. रालादि-ख. ज. झ. उ. । ३. दिति-झ., 'इत्यर्थः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ४. यितुमुप-ख. । ५. देवेशीं-ख. ग. ज. झ. । ६. न्यासप्रभावेन-ख., स्वात्माभेदेन जि-क., स्वात्माभेदेन-ग. ।