भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२६६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इन्द्रेशानदिशोर्मध्ये स्थानमन्यत्¹ प्रकीर्तितम् । नैर्ऋताम्बुदिशोर्मध्ये स्थानमन्यत् प्रकीर्तितम् ॥ इति तत्त्वविमर्शिन्यामस्मदुक्तरीत्या दशलोकपालार्चनरीत्यैव स्थानद्वयं शिष्टमुद्रा²द्वयस्य कल्पनीयम् ॥ ७८ ॥ ब्राह्मण्याद्यावरणन्यासमाह— ऊर्ध्वाधोवर्जितं पुनः ॥ ७८ ॥ ब्राह्मण्याद्यष्टकं दक्षजङ्घायां विन्यसेदित्यनुषङ्गः । शिष्टं स्पष्टम् ॥ ७८-७९ ॥ ननु दक्षजङ्घायां विन्यसेदित्युक्तम्, तत्र³ तासां कानि स्थानानीत्यत⁴ आह— तास्तु⁵ पूर्ववत् । ताः ब्राह्मण्याद्याः । पूर्ववत् “पुनर्वंशे च सव्ये च” (३।७८) इत्युक्तस्थानेषु । अत्र और नीचे ये दोनों क्या आन्तर स्थान हैं ? उत्तर है कि नहीं। तत्त्वविमर्शिनी नामक ग्रन्थ में स्वयं ग्रन्थकार ने— इन्द्र (पूर्व) और ईशान दिशा के बीच में ऊर्ध्व स्थान की तथा नैर्ऋत्य एवं पश्चिम दिशा के बीच में अधःस्थान की कल्पना की गई है ॥ इस तरह से दस लोकपालों के पूजन के प्रसंग में ऊर्ध्व और अधः स्थान की कल्पना की है । बाकी बची दो मुद्राओं का विन्यास इन्हीं स्थानों में करे ॥ ब्रह्माणी आदि आवरण देवताओं का न्यास बताते हैं— ऊर्ध्व और अधो दिशाओं को छोड़ कर बाकी आठ में ब्रह्माणी आदि देवियों का विन्यास दक्ष जंघा आदि स्थानों में करे ॥ प्रस्तुत श्लोक में कोई क्रिया नहीं है, अतः प्रसंगानुसार 'विन्यसेत्' (न्यास करे) क्रिया का अध्याहार कर लेना चाहिये । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥ ७८-७९ । प्रश्न है कि यहाँ तो केवल दक्ष जंघा का उल्लेख है, इनके आठ स्थान कौन-कौन से होगें ? इसी का निर्णय करते हैं— इनके स्थान का निर्णय पूर्ववत् करना चाहिये । इन ब्रह्माणी प्रभृति आठ देवियों के स्थानों का निर्णय पहले (३।७८) बताई गई १. मस्य—ख. ने. ज. झ. उ. । २. मुद्रास्थानद्वयमित्यर्थः—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. 'तत्र' नास्ति—ख. ने. झ. उ. । ४. नीत्याह—ख. ने. ज. झ. उ. । ५. ताश्च— ख. ने. च. छ. ज. झ. ।