भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 313, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 313

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २६५ सर्वसंक्षोभिण्यादिमुद्राशक्त्यावरणन्यासमाह— मूलाधारे न्यसेन्मुद्रादशकं साधकोत्तमः ॥७७॥ मूलाधारे मूलाधारप्रदेशे । शेषं १ स्पष्टम् ॥७७॥ ननु किं मूलाधारे मुद्रादशकं २ ध्यानेन न्यस्तव्यम् ? इत्याशङ्कायामाह— पुनर्वंशे ३ च सव्ये च वामे चैवान्तरालके । ऊर्ध्वाधो दशमु द्राश्च पुनःशब्दात् "नाभावष्टदलं तत्तु" (३।७५) इत्यष्टदलन्यासोक्तस्थाना- न्युच्यन्ते । वंशे पृष्ठवंशे । सव्ये च पार्श्वे । चकारा ४ दुत्तरदक्षिणयोः पार्श्वयोर्ग्रह- णम् । वामे चैवान्तरालके पृष्ठवंशवामपार्श्वान्तराले । चकाराद् वामपार्श्वा- द्यन्तरालानि गृह्यन्ते । कोऽर्थः ? पृष्ठवंशादिदिक्षु वायव्याद्यन्तरालेषु च, ऊर्ध्वा- ५धश्च दश मुद्रा न्यसेत् । ननु ऊर्ध्वाध इति किमान्तरं स्थानद्वयम् ? नेत्याह— ऊर्ध्वाध इति (आ?ना) ६न्तरोधर्ध्वाधः स्थानद्वयम्, सर्वसंक्षोभिणी आदि मुद्राशक्तिरूप आवरण देवताओं का न्यास अब बताते हैं— साधकोत्तम अपने मूलाधार में दस मुद्राशक्तियों का न्यास करे ॥७७॥ मूलाधार शब्द का प्रयोग यहाँ मूलाधार चक्र के स्थान के अर्थ में किया गया है । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥७७॥ प्रश्न है कि मूलाधार स्थान में दस मुद्राओं का न्यास ध्यान के द्वारा करना है अथवा कोई दूसरी पद्धति है ? इसका समाधान यह है— पुनः अष्टदल की तरह वंश (पीठ), वाम, दक्षिण और उत्तर स्थानों में तथा उनके चार अन्तरालों में एवं ऊपर तथा नीचे—इन दस स्थानों में दस मुद्राओं का न्यास करना चाहिये ॥७८॥ पुनः शब्द अष्टदल पद्म के न्यास के अवसर पर (३।७५) बताई गई पद्धति से ही यहाँ भी न्यास किया जाय, इस बात की सूचना देता है । वंश शब्द पृष्ठवंश का बोधक है । 'सव्ये च' यहाँ का चकार उत्तर और दक्षिण भाग का भी अध्याहार करता है । वाम अन्तराल शब्द पृष्ठवंश और वाम पार्श्व के बीच की विदिशा का बोधक है । यहाँ भी चकार शब्द बाकी तीनों अन्तरालों का भी अध्याहार करता है । इसका भाव यह है कि पृष्ठवंश (पश्चिम) आदि दिशाओं में और वायव्य आदि विदिशाओं में तथा ऊपर-नीचे— इन दस दिशाओं में दस मुद्राओं का न्यास करे । यहाँ फिर प्रश्न उठता है कि ऊपर १. शिष्टम्-झ. उ. । २. केन विधानेन-क. ग. । ३. पुनः सव्ये च वंशे च-ख. नै. च. छ. ज. झ. । ४. दुत्तरयोर्ग्रह-ख. ज. झ. उ. । ५. धस्ताच्च-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. अनन्तरो(क्तो)र्ध्वाधः-ज. झ.