योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः दक्षिणपार्श्वयोरन्तरालं दक्षपार्श्वपृष्ठवंशयोश्चान्तरालं गृह्यते । अन्यच्चतुष्टयम् अनङ्गरेखानङ्गवेगिन्यनङ्गाङ्कुशानङ्गमालिनीनां चतुष्टयम् । नाभिदेशस्य पश्चिमादिदक्षिणपार्श्वान्तमनङ्गकुसुमादीनां चतुष्टयं ^१वाय्वादिनैर्ऋतान्तमनङ्ग- रेखादीनां चतुष्टयं न्यसेदित्यर्थः ॥७५-७६॥ कामाकर्षिण्याद्यावरणन्यासमाह— स्वाधिष्ठाने न्यसेत् स्वस्य पूर्वाद्दक्षावसानकम् ॥७६॥ चतस्रस्तु चतस्रस्तु चतुर्दिक्षु क्रमान्न्यसेत् । स्वाधिष्ठानकमलप्रदेशे, स्वस्य पूर्वात् पूर्वदिगादिरारभ्य, दक्षावसानकं दक्षिणदिगवसानपर्यन्तम्, चतुर्दिक्षु प्रतिदिशं चतस्रश्चतस्रः शक्तयः कामाकर्षि- ण्याद्याः क्रमेण न्यस्तव्याः । ननु कामाकर्षिण्याद्या इति कथं^२मनुमीयन्ते ? इति चेदुच्यते—पूर्ववदेव ^३पूर्वोत्तरचक्रयोः शक्तीनां नामग्रहणाद् मध्यचक्रशक्तीनां पारि- शेण्यान्नामान्यनुक्तान्यप्यवसीयन्त इति ॥७६-७७॥ वाम पार्श्व के बीच का स्थान। आदि शब्द से वाम पार्श्व और उदर के बीच का स्थान, उदर और दक्षिण भाग का अन्तराल तथा दक्षिण भाग और पृष्ठवंश का अन्त- राल गृहीत होता है। इन चार अन्तरालों में अनंगरेखा, अनंगवेगिनी, अनंगांकुशा और अनंगमालिनी—इन चार देवियों का विन्यास किया जाता है। इसका भाव यह हुआ कि नाभिस्थान के पश्चिम से लेकर दक्षिण पार्श्व पर्यन्त चार दिशाओं में अनङ्गकुसुमा आदि चार देवियों और उनके अन्तराल में स्थित वायव्य से नैर्ऋत्य पर्यन्त चार विदिशाओं में अनङ्गरेखा आदि चार देवियों का विन्यास करे ॥७५-७६॥ कामाकर्षिणी आदि आवरण देवताओं का न्यास बताते हैं— अपने स्वाधिष्ठान कमल की पूर्व दिशा से दक्षिण दिशा पर्यन्त चार दिशाओं में चार-चार शक्तियों का क्रम से विन्यास करे ॥७६-७७॥ अपने स्वाधिष्ठान कमल स्थान में पूर्व दिशा से आरंभ कर दक्षिण दिशा पर्यन्त चारों दिशाओं में कामाकर्षिणी आदि चार-चार शक्तियों का क्रमशः विन्यास करना चाहिये। यहाँ फिर प्रश्न होता है कि श्लोक में तो कामाकर्षिणी आदि का नाम नहीं है, तब उन्हीं का यहाँ न्यास किया जायेगा, यह कैसे मालूम हुआ ? उत्तर यह है कि अभी सर्वज्ञा प्रभृति शक्तियों के विन्यास में जो पद्धति अपनाई गई, उसी पद्धति से यहां भी निर्णय किया जायगा । पूर्व और उत्तर चक्रों की शक्तियों का नाम मिलता है। बीच के इस चक्र की शक्तियों का नाम न होने पर भी बची हुई शक्तियों का यहाँ विन्यास पारिशेष्य न्याय से मान लिया जायगा ॥७६-७७॥ १. 'वाय्वादि'...'चतुष्टयं' नास्ति-क. ग. उ. । २. मवसी-क. । ३. पूर्वोक्तचक्र- शक्तीनां नामग्रहणात् पारिशेष्यान्नामान्युक्तान्यवसीयन्त-ख. ते. ज्ञ. ज.।