भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २६३ १स्पष्टम् ॥७४॥ सर्वसंक्षोभिण्याद्यावरणन्यासमाह— हृदये मनुकोणस्थाः शक्तयोऽपि च पूर्ववत् ॥७४॥ हृदये वक्षसि । पूर्ववत् प्रादक्षिण्येन । मनुकोणस्थाः शक्तयश्चतुर्दशकोण- निवासिन्यः सर्वसंक्षोभिण्याद्याः, न्यस्तव्या इति शेषः ॥७४॥ अनङ्गकुसुमाद्यावरणन्यासमाह— २नाभावष्टदलं तत्तु वंशे वामे च पार्श्वके । उदरे सव्यपार्श्वे च न्यसेदादिचतुष्टयम् ॥७५॥ वंशवामान्तरालादि न्यसेदन्यच्चतुष्टयम् । नाभौ नाभिदेशे, अष्टदलं पद्मम् । तत्त्विति३ तत् पूर्वोक्तानङ्गकुसुमाद्यष्टकं परामृश्यते । तदादिचतुष्टयम् अनङ्गकुसुमाऽनङ्गमेखलाऽनङ्गमदनाऽनङ्गमदना- तुराणां चतुष्टयम् । वंशः४ पृष्ठास्थि । सव्यपार्श्वं दक्षिणपार्श्वम् । वंशवामान्तरालादि वंशवामपार्श्वयोरन्तरालम् । आदिशब्दाद् वामपार्श्वपुरोभागयोरन्तरालं पुरोभाग- इसका अर्थ स्पष्ट है ॥७४॥ सर्वसंक्षोभिणी आदि आवरण देवताओं का न्यास बताते हैं— चतुर्दशार चक्र स्थित शक्तियों का विन्यास हृदय के चारों तरफ प्रदक्षिणा क्रम से करे ॥७४॥ हृदय अर्थात् अपने वक्षस्थल में, पहले बताई गई विधि से, अर्थात् प्रदक्षिणा के क्रम से मनुकोण (चतुर्दशार) स्थित सर्वसंक्षोभिणी आदि चौदह शक्तियों का विन्यास करना चाहिये ॥७४॥ अनङ्गकुसुमा आदि आवरण देवताओं का न्यास बताते हैं— नाभि में अष्टदल कमल है । उसके पीछे, बायें भाग में, उदर में और दाहिने भाग में स्थित चार दलों में अनङ्गकुसुमा आदि चार देवियों का तथा इन्हीं चारों स्थानों के अन्तराल में स्थित चार दलों में चार देवियों का विन्यास करना चाहिये ॥७५-७६॥ नाभिस्थान में अष्टदल पद्म की स्थिति मानी गई हैं । तत् शब्द से पूर्वोक्त अनंग- कुसुमा आदि आठ देवियों का ग्रहण किया जाता है । इनमें से पहली चार हैं—अनंग- कुसुमा, अनंगमेखला, अनंगमदना और अनंगमदनातुरा । वंश शब्द पीठ की हड्डी का वाचक है । सव्य पार्श्व का अर्थ है दक्षिण भाग, वंशवामान्तरालादि का अर्थ है वंश और १. स्पष्टमेतत्-ज. । २. नाभौ त्वष्ट-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ३. 'तत्त्विति.... तुराणां चतुष्टयम्' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ४. तद्धि वंशे वंशपृष्ठास्थिनि-ख. ज. झ. उ. ।