भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२६२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः चूडादिकेऽर्धनिम्नेऽर्धं शेषार्धं कर्णपृष्ठके । कर्णपूर्वे त्वपाङ्गे च तस्य मूले च विन्यसेत् ॥७३॥ कर्णोत्तरं कर्णस्य पश्चाद्भागः । चूडादिके चूडाया आदिर्र्लाटम् । अर्धनिम्ने कर्णोत्तरानन्तरं न्यसेदिति सम्प्रदायः । निम्नं शिरःपश्चान्निम्नस्थलम् अवटुरेव । कोऽर्थः ? चूडादिनेत्रमूलापाङ्गकर्णपूर्वपृष्ठेषु सर्वज्ञादीनां दशानामर्धं विन्यसेत् । ४अथ तासामेवार्धमवट्वन्तरकर्णपृष्ठपूर्वान्यनेत्रापाङ्गमूलेषु विन्यसेदित्यर्थः । ननु सर्वज्ञादीनां नाम न कीर्तितम्, कथमत्र ता एव न्यस्तव्याः कथ्यन्ते ? उच्यते— पूर्वचक्रे वशिन्याद्या न्यस्तव्याः कथिताः, अनन्तरोपरिचक्रे सर्वसिद्ध्याद्या न्यस्तव्याः कथ्यन्ते । अतस्तयोरपि मध्य५दशस्थानेषु पारिशेष्यात् सर्वज्ञाद्या न्यस्तव्या इति गृह्यन्ते ॥७२-७३॥ सर्वसिद्धाद्यावरणन्यासमाह— सर्वसिद्धादिकं कण्ठे प्रादक्षिण्येेन विन्यसेत् । का तथा बाकी बचे आधे देवताओं का अवटु, कर्णपृष्ठ, कर्णपूर्व, अपाङ्ग और नेत्रमूल में विन्यास करे ॥७२-७३॥ कर्णोत्तर का अर्थ है कान का पिछला भाग । चूडा का अर्थ यहाँ केश लिया गया है । शिर के केशों का आरंभ ललाट से ही होता है । कान के पिछले हिस्से के बाद अर्धनिम्न स्थान में न्यास करना चाहिये । यहाँ निम्न शब्द से सिर के पीछे का नीचे का भाग गृहीत होता है, जिसको अवटु (गर्दन का पिछला भाग) कहते हैं । इसका भाव यह है कि ललाट नेत्रमूल, अपाङ्ग, कर्णमूल और कर्णपृष्ठ में सर्वज्ञा प्रभृति दस देवियों में से आधी पाँच देवियों का न्यास करे । इसके बाद उन्हीं में से बची हुई आधी देवियों का अवटु, कर्णपृष्ठ कर्णमूल, अपाङ्ग और नेत्रमूल में विन्यास करे । प्रश्न उठता है कि यहां सर्वज्ञा आदि के नामों का तो उल्लेख है नहीं, तब उनका यहाँ न्यास कैसे किया जा सकता है ? इसका समाधान यह है कि पूर्व चक्र में वशिनी आदि के न्यास का उल्लेख है और आगे वाले चक्र में सर्वसिद्धि आदि देवियों के न्यास का उल्लेख मिलता है । अतः इन दोनों के बीच में विद्यमान इस चक्र के दस स्थानों में बीच में बची हुई सर्वज्ञा प्रभृति देवियों का ही विन्यास प्राप्त होगा ॥७२-७३॥ सर्वसिद्धि आदि देवताओं का न्यास बताते हैं— सर्वसिद्धि आदि दस देवियों का कण्ठ के चारों तरफ प्रदक्षिणा क्रम से विन्यास करे ॥७४॥ १. चूडादिके च निम्नाग्रे—ख. ने. च. ज. झ. । २. शेषार्धं कर्णपृष्ठयोः—ख. ने. च. ज. झ.। ३. कर्णे पूर्वे—क. ग. ने., कर्णमूले—ड.। ४. अथवाऽऽसामेवोत्तरार्धमवट्वन्तरकर्ण— ड.। ५. मध्यवर्ति—क., मध्यग—ख. ने. च. ज. झ.

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