योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 309, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५९ मयाऽप्येतत् त्वदन्यस्य कस्यापि न पुरा¹ प्रकटीकृतमित्याह— गुप्ताद् गुप्ततरं चैतत् तवाऽद्य प्रकटीकृतम्। गुप्तादपि² गुप्ततरम्, रहस्यादप्यत्यन्त³रहस्यत्वात्। एतत् तव मदंशभूत- विमर्शात्मिकायाः प्रियतमाया अपि यतो ⁴मयाऽद्य प्रकटीकृतम्। पुराऽन्यस्मै न प्रकटीकृतमिति तात्पर्यम् ।।६९।। अस्यैव न्यासस्य पुनः प्रकारान्तरमाह— मूलदेव्यादिकं न्यासमणिमादिमन्तं पुनर्न्यसेत् ।।६९।। पूर्वमणिमादिमूलदेव्यन्तं श्रीचक्रावरणदेवतान्या(समुक्त्वा⁵?सं कृत्वा) इदानीं मूलदेव्याद्यणिमादिमन्तं पुनः श्रीचक्रावरणदेवतान्यासं कुर्यादित्यर्थः ।।६८।। मूल⁶देव्यादिन्यासप्रकारमेवाह— शिरस्त्रिकोणे पूर्वादि कामेश्वर्यादिका न्यसेत्। मैंने भी अब तक इसको तुम्हारे सिवाय किसी को नहीं बताया है, यही बात अब कह रहे हैं— गुप्त से भी गुप्ततर इस न्यास को आज ही मैंने तुम्हारे सामने प्रकट किया है ।। गुप्त से भी गुप्ततर का अभिप्राय है कि यह न्यास रहस्यों का भी रहस्य है, इसीलिये इसको बहुत ही छिपा कर रखा जाता है। आज तक मैंने इसीलिये इसको छिपा कर रखा। तुम तो मेरे ही विमर्शात्मक स्वरूप वाली मेरी प्रियतमा हो, अतः आज मैंने तुम्हारे सामने इस रहस्य को खोला है। इससे पहले इसको किसी को भी नहीं बताया है ।। इसी न्यास की अब दूसरी विधि बताते हैं— पुनः इसी न्यास को मूलदेवी से प्रारंभ कर अणिमादि पर्यन्त क्रम से संपन्न करे ।।६९।। अभी अणिमादि से प्रारंभ कर मूलदेवी पर्यन्त न्यास की विधि बताई गई है। अब मूलदेवी से प्रारंभ कर अणिमादि पर्यन्त श्रीचक्र के आवरण देवताओं के विन्यास की विधि बताई जा रही है कि आगे बताए क्रम से उन देवताओं का अपनी देह में न्यास करे ।।६९।। इसी मूलदेव्यादि न्यास की विधि बताते हैं— शिरःस्थान स्थित त्रिकोण के मध्य में मूलदेवी का और त्रिकोण की तीनों रेखाओं में कामेश्वरी आदि का न्यास करे ।। १. 'पुरा' नास्ति-क. ग. । २. 'अपि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. दप्यतिरह- ख. ज. झ. उ. । ४. प्रियतमेन मया-क. ग. । ५. न्यासमुक्तम्-क. । न्यास उक्त इति पाठेन भाव्यम् । ६. देव्यादि-ख. ने. ज. उ.