भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 308

२५८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः श्रीचक्रन्यासमुपसंहरति— एवं मयोदितो देवि न्यासो गुह्यतमक्रमः ॥६७॥ स्पष्टम्¹ ॥६७॥ अतस्त्वयाऽप्येतन्न्यासजातं गोप्यमित्याह— एतद् गुह्यतमं² कार्यं त्वया वै वीरवन्दिते । स्पष्टम्³ ॥ ननु किमेतन्न कस्मैचिदपि कथनीयमित्यत⁴ आह— समयस्थाय दातव्यं समयस्थाय ⁵कौलिकाय समयाचारनिष्ठाय देयम् । पशुसमयाचार⁶निष्ठाय न देयमित्यर्थः ॥ ननु कौलिकसमयस्थायाऽपि⁷ सर्वस्मै देयम् ? नेत्याह— नाशिष्याय कदाचन ॥६८॥ समयस्थायापि अशिष्याय⁸ न देयम् ॥६८॥

इस श्रीचक्रन्यास का अब उपसंहार करते हैं— हे देवि ! इस तरह से मैंने तुमको इस न्यास की अत्यन्त गोपनीय पद्धति को समझाया है ॥६७॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥६७॥ यह अत्यन्त गोपनीय है, इसीलिये तुम्हें भी इस न्यास को गुप्त रखना चाहिये— हे वीरवन्दिते ! तुम्हें भी इसे अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये ॥ इसका अर्थ स्पष्ट है । क्या इसे किसी को नहीं बताना चाहिये, इस पर कहते हैं— नियमों का पालन करने वाले को ही इसे बताना चाहिये ॥ समय (नियम) का पालन करने वाले कौलिक को ही, आचारनिष्ठ साधक को ही इसका उपदेश करना चाहिये । अन्य सम्प्रदायों के आचार, नियम आदि का अनुसरण करने वालों को इसका उपदेश नहीं करना चाहिये ॥ क्या सभी कौलिकों को इसका उपदेश किया जा सकता है? इस पर कहते हैं, नहीं— जो शिष्य नहीं है, उसको इसका उपदेश कभी न करे ॥६८॥ कौलिक आचार-विचार का पालन करने वाला भी यदि शिष्य नहीं बना है, तो उसको इस विषय का उपदेश नहीं करना चाहिये ॥६८॥

१. स्पष्टमेतत्–ज. । २. तरं–ख. च. छ. ज. झ. उ. । ३. स्पष्टमेतत्–ज. । ४. आह–क. ग. । ५. कौलिकसम–ख. ने. झ. उ. । ६. पराय–ख. ने. ज. झ. उ. । ७. 'अपि' नास्ति–ख. ने. ज. झ. उ. । ८. ष्याय अन्याशिष्याय–क. ग. झ. ।