योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
पृष्ठ 307, कुल 485 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५७ बाणान् नेत्रे भ्रुवोश्चापौ कर्णे पाशद्वयं न्यसेत् । १सृणिद्वयं च नासाग्रे दक्षिणाग्रं तु विन्यसेद् ॥ (३।७०-७१) इति ॥६५-६६॥ ततस्त्रिकोण२चक्रव्यापकमाह— त्रिकोणाय नमस्तथा । विन्यस्य “त्रिकोणाय नमः” इति मन्त्रेण रेखात्रयं संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य ॥ त्रिकोणे न्यस्तव्या देवीराह— तस्य कोणेषु अग्रदक्षान्तरेषु च ॥६६॥ कामेश्वर्यादिदेवीनां३ मध्ये देवीं च विन्यसेत् । तस्य त्रिकोणस्य, अग्रदक्षोत्तरेषु कामेश्वरीवज्रेश्वरीभगमालिन्यः, तासां कामे- श्वर्यादिदेवीनां मध्ये देवीं च विन्यसेदिति । मध्ये बैन्दवे श्रीचक्रे । देवीं प्रकाश- विमर्शसामरस्यरूपां त्रिपुरसुन्दरीं च४ विन्यसेदित्यर्थः ॥६६-६७॥ द्वन्द्व समास है । इससे पुरुष और स्त्री, कामेश्वर और कामेश्वरी के भेद से आठ आयुधों का विन्यास किया जायगा । यहीं आगे (३।७०-७१) आठ आयुधों के विषय में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि दोनों नेत्रों में बाणों को, दोनों भौंहों पर धनुषों को, दोनों कानों में पाशों को और नासाग्रों में दक्षिणाग्र अंकुशों को रखे ॥६५-६६॥ इसके बाद त्रिकोण चक्र का न्यास बताते हैं— “त्रिकोणाय नमः” इस मन्त्र से इस चक्र का न्यास करे ॥ “त्रिकोणाय नमः” इस मन्त्र का उच्चारण करते हुए तीनों रेखाओं का स्पर्श करते हुए व्यापक न्यास करे ॥ त्रिकोण में इन देवियों का न्यास किया जाता है— उस त्रिकोण के अग्र, दक्षिण और उत्तर में कामेश्वरी आदि देवियों का और मध्य भाग में त्रिपुरसुन्दरी का न्यास करे ॥६६-६७॥ उस त्रिकोण की आगे की, दाहिनी और बाईं रेखाओं में कामेश्वरी, वज्रेश्वरी और भगमालिनी देवी का और तीनों देवियों के बीच में देवी (त्रिपुरसुन्दरी) का विन्यास करे । मध्य का अर्थ यहाँ बैन्दव चक्र है । इस बैन्दव चक्र में प्रकाशविमर्शसामरस्य-स्वरूपिणी त्रिपुरसुन्दरी का न्यास करना चाहिये ॥६६-६७॥ १. नास्ति श्लोकार्धः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'चक्र' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ३. देवाश्च-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ४. 'च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । १७