योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तस्य कोणाष्टकमाह— चिबुकं कण्ठहृदयनाभीनां चैव दक्षिणम्। ज्ञेयं पार्श्वचतुष्कं च मणिपूरादि वामकम्॥६४॥ चतुष्टयं च पार्श्वनामेतत् कोणाष्टकं पुनः। चिबुकादीनां पार्श्वचतुष्कं दक्षिणम्। मणिपूरादि, मणिपूरकं नाभिस्थानम्, नाभिहृदयकण्ठचिबुकानां वामकं^२ पार्श्वचतुष्कं चैतत्कोणाष्टकम्॥६४-६५॥ अनन्तरमायुधावरणन्यासमाह— हृदयस्थत्रिकोणस्य चतुर्दिक्षु बहिर्न्यसेत्॥६५॥ शरचापौ पाशसृणी हृदये^३ वक्षसि तिष्ठतीति हृदयस्थं स्तनद्वयमध्यनिम्नत्रिकोणाकारं हृदयस्थ- त्रिकोणमित्युच्यते। तस्य बहिश्चतुर्दिक्षु प्रागादिषु कामेश्वरीकामेश्वरयोः शरचापौ पाशसृणी ^४चेत्यायुधंचतुष्टयं ^५मिलितं न्यसेत्। ^६शरचापौ पाशसृणी इति पुंस्त्री- भेदेन प्रत्येकं द्वन्द्वमित्यष्टौ। अत्रैव वक्ष्यति— इसके आठ कोणों को कहते हैं— चिबुक (ठोडी), कण्ठ, हृदय और नाभि इन चारों का दाहिना भाग तथा मणिपूर (नाभि) आदि का बायां भाग, ये ही सब मिल कर अष्टकोण चक्र के आठ कोण बनते हैं ॥६४-६५॥ चिबुक (ठोडी) आदि के चार दाहिने पार्श्व (भाग) और मणिपूर आदि, अर्थात् नाभि, हृदय, कण्ठ, चिबुक के चार बायें पार्श्व मिलकर इस कोणाष्टक की रचना करते हैं ॥६४-६५॥ अब आयुधावरण न्यास को कहते हैं— हृदय में स्थित त्रिकोण की चारों दिशाओं में बाहर की तरफ बाण, धनुष, पाश और अंकुश का न्यास करे ॥६५-६६॥ हृदयस्थ त्रिकोण का अर्थ है दोनों स्तनों के मध्य में नीचे विद्यमान त्रिकोण के आकार का स्थान। उसके बाहर पूर्व आदि चारों दिशाओं में कामेश्वरी और कामेश्वर दोनों के बाण, धनुष, पाश और अंकुश इन चार-चार आयुधों का न्यास करे। शरचापौ तथा पाशसृणी पदों में 'शरो च चापौ च, पाशौ च सृणी च' इस तरह का द्विवचनान्त १. मतम्—क. ग.। २. वाम-ख. ग. ने. ज., नास्ति-झ. उ.। ३. 'हृदये''''प्रागादिषु' इति पाठाऽग्रे 'पाशद्वयं न्यसेत्' इत्यतः परं दृश्यते-ख. ज. झ. उ.। ४. चेत्यायुधाष्टकं-क.। ५. 'मिलितं' नास्ति-क. ग. ने. उ.। ६. 'शर''''मिलितं' केवलं झ. दृश्यते।