योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २६९ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या करशुद्धिन्यास आदिर्यस्य न्यासस्य। जातावेक^१- वचनम्। समाहितः सावधानः। करशुद्ध्यादिन्यासश्चतुःशतीशास्त्रोक्तः (१।१२६- १२९)। अतो नात्रोच्यते, केवलं नाम्नैव गृह्यते ॥८१॥ तत्रानुक्तं विद्यान्यासमाह— मूर्ध्नि गुह्ये च हृदये ^२नेत्रत्रितय एव च। श्रोत्रयोर्युगले देवि^३ मुखे च भुजयोः पुनः ॥८२॥ पृष्ठे जान्वोश्च नाभौ च विद्यान्यासं समाचरेत्। विद्याया बीजत्रयेण न्यासो विद्यान्यासः। मूर्ध्नि वाग्भवबीजम्, गुह्ये काम- राजबीजम्, हृदये शक्तिबीजम्। एवं सर्वत्र^६ स्थानत्रये बीजत्रयमुच्चरन् न्यसे- दित्यर्थः। शिष्टं स्पष्टम् ॥८२-८३॥ करशुद्ध्यादीनां नामान्याह— करशुद्धि पुनश्चैव आसनानि षडङ्गकम् ॥८३॥ श्रीकण्ठादींश्च वाग्देवीः
का आधान कर रहा हूं, जिससे कि मेरे दोनों हाथ शुद्ध हो जांय और इनसे मैं जिन पदार्थों का स्पर्श करूं, वे भी शुद्ध हो जांय, उनमें किसी प्रकार का स्पर्शदोष न आवे ॥ इन न्यासों में पहला करशुद्धि न्यास है, अतः इनको करशुद्ध्यादि न्यास कहा जाता है। एकवचन समुदाय का वाचक है। समाहित का अर्थ है सावधान। करशुद्धि आदि न्यासों का वर्णन चतुःशती शास्त्र (१।१२६-१२९) में किया जा चुका है। अतः उनका वर्णन यहां नहीं किया गया है, केवल नाम से ही उनका उल्लेख कर दिया गया है ॥८१॥ चतुःशती शास्त्र में अनुक्त विद्यान्यास का यहां वर्णन करते हैं— हे देवि ! शिर, गुह्य और हृदय में, तीनों नेत्रों में, दोनों कान और मुंह में दोनों भुजा और पृष्ठ में, दोनों जानु और नाभि में विद्या न्यास करे ॥८२-८३॥ श्रीविद्या के तीन बीजों से जो न्यास किया जाता है, उसे विद्यान्यास कहते हैं। सिर में वाग्भव बीज, गुह्य में कामराज बीज और हृदय में शक्तिबीज का न्यास करे। इसी तरह सर्वत्र तीन-तीन स्थानों में तीनों बीजों का क्रमशः उच्चारण करता हुआ साधक इस विद्या न्यास को संपन्न करे। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥८२-८३॥ अब करशुद्धि आदि न्यासों के नाम बताते हैं— करशुद्धि न्यास, आसन न्यास, षडङ्ग न्यास, श्रीकण्ठादि न्यास और वशि- न्यादि न्यास यहां किये जाते हैं। ८४-८४॥ १. वेकत्वम्-ख. ने. झ. उ.। २. नेत्रेषु त्रितयेषु च-क. ग.। ३. चैव-क. ग.। ४. ततः-ग.। ५. विद्याया द्वे-क. ग.। ६. 'सर्वत्र' नास्ति-ख. ने. झ. उ.।