योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वाग्देव्यो वशिन्याद्याः । श्रीकण्ठादिन्यासः १ स्वच्छन्दसंग्रहोक्तः । तन्त्रान्तरे प्रसिद्धत्त्वादिह नोक्तः । शिष्टं स्पष्टम् ।।८३-८४।। कामेश्वर्यादिदेवीनां न्यासमाह— आधारे हृदये पुनः । शिखायां बैन्दवस्थाने त्वग्निचक्रादिका न्यसेत् ।।८४।। बैन्दवस्थाने शिखायामिति व्यत्ययेन क्रमो ज्ञेयः । बैन्दवस्थानम् "दीपाकारो- ऽर्धमात्रश्च ललाटे वृत्त इष्यते" (१।२८) इति पूर्वोक्तं ललाटम् । शिखा नाम कुण्ड- लिन्या अग्रं शिवस्य विश्रान्तिस्थानम् । अत्र श्रुतिः—"तस्याः शिखाया मध्ये पर- मात्मा व्यवस्थितः" २ (तै० आ० १०।१२।१२) इति । तेन शिखाशब्देन तद्व्याप्ति- स्थानं ब्रह्मरन्ध्रं लक्ष्यते । अग्निचक्रादिकाः—"अग्निचक्रे कामगिर्यालये मित्रेश- नाथात्मके ३श्रीकामेश्वरीदेवीरुद्रात्मशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि, सूर्यचक्रे जाल- न्ध शनाथात्मके वज्रेश्वरीदेवीविष्ण्वात्मशक्तिश्रीपादुकां पूजयामि, वशिनी आदि वाग्देवता कहलाती हैं। श्रीकण्ठादि न्यास स्वच्छन्दसंग्रह में वर्णित है। १अन्य तन्त्रों में यह प्रसिद्ध है, अतः यहाँ उसका वर्णन नहीं किया गया है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ।।८३-८४।। कामेश्वरी आदि देवियों का न्यास अब बताते हैं— आधार, हृदय, बैन्दव स्थान और शिखा में क्रमशः कामेश्वरी आदि देवियों का विन्यास करे ।।८४।। श्लोक में शिखा का पहले और बैन्दव स्थान का उल्लेख बाद में है, किन्तु इनका क्रम बदल कर पहले बैन्दव स्थान और बाद में शिखा को रखना चाहिये। पहले (१।२८) बताया जा चुका है कि बैन्दव स्थान ललाट को कहते हैं। कुण्डलिनी का अग्रभाग यहाँ शिखा शब्द से बोधित होता है, जहाँ कि शिव विश्राम करते हैं। तैत्तिरीय आरण्यक कहती है —"इस शिखा के मध्य में परमात्मा विराजमान हैं"। इस तरह से शिखा शब्द से शिव की व्याप्ति का स्थान ब्रह्मरन्ध्र लक्षित होता है। अग्निचक्र आदि में कामे- श्वरी आदि देवियों का न्यास निम्न मन्त्रों का उच्चारण करते हुए करना चाहिये— "मित्रेशनाथ जिसके अधिपति हैं, ऐसे कामगिरि पीठरूप अग्निचक्र में रुद्रात्मक श्रीकामेश्वरी देवी की पादुका का मैं पूजन करता हूँ। षष्ठीशनाथ जिसके अधिपति हैं, १. श्रीकण्ठन्यासः-ख. ने. ज. झ. उ. । २. इतः परम्-'स ब्रह्मा स शिवः (स हरिः) सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट्' इत्याधिकः पाठः-उ. । ३. 'श्री' नास्ति-ख. ने. ज. झ. । १. प्रपञ्चसार प्रदर्शित श्रीकण्ठ न्यास की चर्चा पहले पृ० १६५ की तीसरी टिप्पणी में की जा चुकी है।