भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 303, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 303

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २५३ दशारचक्रस्य कोणान्याह— तस्य कोणानि दक्षाक्षिनासिकामूलनेत्रके¹ ॥५८॥ कुक्षीशवायुकोणेषु जानुद्वयगुदेषु च । कुक्षिनैर्ऋतिवह्व्याख्यकोणे² ष्वैव³ तस्य दशारचक्रस्य, कोणानि देशाऽपि, दशसु दक्षाक्ष्यादिस्थानेषु, भावनी- यानीति⁴ शेषः । कुक्षीशवायुकोणेषु । छान्दसत्वाद् द्वित्वे बहुवचनम् । बाहुद्वय- मारभ्योरुद्वयपर्यन्तं कुक्षिशब्देन लक्ष्यते । तेन कुक्षेरुपरिभागः प्राची, अधोभागः प्रतीची, दक्षिणवामपार्श्वे दक्षिणोदीच्यौ । कोणशब्देन बाहू ऊरू च लक्ष्येते । तेन वामबाहुमूलमीशकोणः, वामोरूमूलं वायुकोणः, दक्षिणोरूमूलं नैर्ऋतिकोणः, दक्षिण- बाहुमूल⁵मग्निकोणः । सुगममन्यत् ॥५८-५९॥ दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— न्यसेत् पुनः ॥५९॥ अब इस दशार चक्र के कोणों को बताते हैं— इस दशार चक्र के कोणों की दाहिनी आँख, नासिकामूल, बाईं आँख, वाम बाहु, वामोरु, दक्षिण और वाम जानु, गुदा, दक्षिण ऊरु और दक्षिण बाहु इन दस स्थानों में भावना करे ॥५८-५९॥ उस दशार चक्र के सभी दस कोणों की दक्षिण नेत्र आदि दस स्थानों में भावना करनी चाहिये । कुक्षीशवायुकोणेषु तथा कुक्षिनैर्ऋतिवह्व्याख्यकोणेषु इन दोनों स्थानों में द्विवचन के स्थान पर बहुवचन का प्रयोग वैदिक पद्धति के अनुसार मानना चाहिये । कुक्षि शब्द यहाँ दोनों बाहुओं से दोनों जंघाओं तक फैले धड़ का वाचक है । इसके अनुसार धड़ का ऊपरी भाग प्राची (पूर्व), नीचे का भाग प्रतीची (पश्चिम) दिशा का और उसका दाहिना तथा बायां भाग दक्षिण और उत्तर दिशा का सूचक होगा । कोण शब्द से दोनों बाहुओं और दोनों जंघाओं बोध होगा । इस तरह से वाम बाहुमूल, ईशान कोण, वाम जंघामूल वायु कोण, दक्षिण जंघामूल नैर्ऋति कोण और दक्षिण बाहुमूल अग्निकोण का सूचक माना जायगा । बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥५८-५९॥ इन दस कोणों में न्यस्तव्य शक्तियाँ ये हैं— १. नासामूलास्यनेत्रके-क. ग., लान्यनेत्रके-से. । २. णयोश्च-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ३. 'दशापि' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ४. नीत्यर्थः-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. न्नेर्ऋता-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. ।