भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 302

२५२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः वामोरौ वामपार्श्वे च वामांसे वामगण्डके । ललाटवामभागे च तथा वै पृष्ठ इत्यपि ॥५७॥ दक्षभागे ललाटस्यैव। ललाट इति प्रकृतत्वाद् दक्षगण्डदक्षांसमध्यत¹ इत्यर्थः। ²पार्श्वान्तरूरुजङ्घान्तैरिति त्रिभिरपि दक्षशब्दो युज्यते। वामजङ्घादि इत्यादि- शब्दः शिष्टार्थारम्भद्योतकः। वामांस इत्यत्रापि मध्य इति योज्यम्। पृष्ठमिति शिरसः पृष्ठमेव³ ज्ञेयम्, दक्षवामयोः प्रथमं ललाटोपादानात्। ललाटं शिरसः पुरस्ताद्भागः ॥५५-५७॥ बहिर्दशारचक्रव्यापकमाह— ⁴ततो दशारचक्राय नम इत्यपि पार्वति। ततः चतुर्दशारकोणन्यासानन्तरम्, “दशारचक्राय नमः” इति मन्त्रेण दक्षा- क्ष्यादिदशकोणानि संस्पृश्य व्यापकम्, अपिशब्दाद्विन्यसेदिति योज्यम् ॥ से हे पार्वति ! बाईं पिण्डली, जंघा, पार्श्व, स्कन्ध, कपोल और ललाट के वाम भाग में एवं ललाट के पृष्ठ भाग में इन दलों की भावना करे ॥५६-५७॥ ललाट में और ललाट के ही दाहिने हिस्से में ये दो स्थान होंगे। ललाट के दक्षभाग की तरह गण्ड, अंस आदि का भी दक्ष भाग ही गृहीत होगा। इसी तरह से पार्श्व, ऊरु और जंघा के साथ भी दक्ष शब्द संयुक्त होगा। वाम जंघा के बाद का आदि शब्द विपरीत क्रम से उन सभी स्थानों का सूचक है, जिनका वर्णन अभी किया गया है। न्यास करते समय इन सभी स्थानों के मध्य भाग का स्पर्श किया जाता है, अतः वामांस के साथ भी मध्य शब्द जुड़ेगा। पृष्ठ शब्द यहाँ सिर के पृष्ठ भाग का सूचक है, क्योंकि दक्ष और वाम ललाट के अतिरिक्त यहाँ ललाट का भी अलग से ग्रहण किया गया है। इसलिये परावर्तन क्रम में यहाँ ललाट का पृष्ठ भाग, अर्थात् सिर का पृष्ठ भाग ही गृहीत होगा, क्योंकि ललाट सिर का पूर्व भाग है ॥५५-५७॥ बहिर्दशार चक्र का न्यास बताते हैं— हे पार्वति ! इसके बाद “बाह्यदशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से बहिर्दशार चक्र का न्यास करे ॥ चतुर्दशार चक्र के कोणों का न्यास सम्पन्न करने के उपरान्त “दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से दाहिनी आँख आदि दस स्थानों का स्पर्श करते हुए व्यापक न्यास करे ॥ १. मध्य इ-उ. । २. पार्श्वोरुज-ख. ने. । ३. मिति ज्ञेयम्-क. ग., मवसेयम्- ४. पु. बहिर्दशार-क.

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