भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

२५४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः सर्वसिद्धिप्रदादीनां शक्तीनां दशकं प्रिये । सर्वसिद्धिप्रदाद्याः सर्वसिद्धिप्रदासर्वसम्पत्प्रदासर्वप्रियङ्करीसर्वमङ्गलकारिणी- सर्वकामप्रदासर्वदुःखविमोचनीसर्वमृत्युप्रशमनीसर्वविघ्ननिवारिणीसर्वाङ्गसुन्दरीसर्व- सौभाग्यदायिन्यः । शेषं स्पष्टम् ॥५९-६०॥ अन्तर्दशारचक्र¹व्यापकमाह— तदन्तश्च दशारादिचक्राय नम इत्यपि ॥६०॥ विन्यस्य तदन्तः बाह्यदशारान्तः, “अन्तर्दशारचक्राय नमः” इति मन्त्रेण दक्षिणनासादि- ³दशकोणानि संस्पृश्य व्यापकं विन्यस्य ॥६०-६१॥ दशकोणेषु न्यस्तव्याः शक्तीराह— तस्य कोणेषु सर्वज्ञाद्याश्च विन्यसेत् । सर्वज्ञाद्याः सर्वज्ञासर्वशक्तिसर्वैश्वर्य⁴प्रदासर्वज्ञानमयीसर्वव्याधिविनाशिनीसर्वा- धारस्वरूपा⁵सर्वपापहरासर्वानन्दमयीसर्वरक्षास्वरूपिणीसर्वेप्सितफलप्रदाः । स्पष्ट- मन्यत् ॥६०॥ हे प्रिये ! इन दस कोणों के दस स्थानों में सर्वसिद्धिप्रदा इत्यादि दस शक्तियों का विन्यास करे ॥५९-६०॥ सर्वसिद्धिप्रदा, सर्वसम्पत्प्रदा, सर्वप्रियङ्करी, सर्वमङ्गलकारिणी, सर्वकामप्रदा, सर्व- दुःखविमोचिनी, सर्वमृत्युप्रशमनी, सर्वविघ्ननिवारिणी, सर्वाङ्गसुन्दरी और सर्वसौभाग्य- दायिनी ये दस शक्तियाँ है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥५९-६०॥ अन्तर्दशार चक्र का व्यापक न्यास बताते हैं— बाह्य दशार के भीतर “अन्तर्दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से अन्तर्दशार चक्र का विन्यास करे ॥६०-६१॥ बाह्य दशार चक्र के भीतर “अन्तर्दशारचक्राय नमः” इस मन्त्र से दस कोणों के प्रतिनिधि दक्षिण नासा आदि स्थानों को स्पर्श करते हुए व्यापक न्यास करे ॥६०-६१॥ इन दस कोणों में न्यस्तव्य शक्तियाँ ये हैं— अन्तर्दशार के दस कोणों से सर्वज्ञा आदि शक्तियों को विन्यस्त करे ॥६१॥ सर्वज्ञा, सर्वशक्ति, सर्वैश्वर्यप्रदा, सर्वज्ञानमयी, सर्वव्याधिविनाशिनी, सर्वाधारस्वरूपा, सर्वपापहरा, सर्वानन्दमयी, सर्वरक्षास्वरूपिणी, सर्वेप्सितफलप्रदा ये दस शक्तियाँ हैं। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥ १॥ १. तथा-क. ग. । 'चक्र' नास्ति-ख. झ. उ. । ३. दक्ष(श) स्थानानि-क. ग. । ४. प्रदायिनी-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. स्वरूपिणी-ख. ।

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