योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः तत्त्वत्रयम् आत्मविद्याशिवाख्यतत्त्वानां त्रयम् । समस्तं च तत्त्वत्रयसमष्टिरूपं तुरीयं तत्त्वम् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— धरादिमायान्तमात्मतत्त्वं१स्यान्तर्गतं स्मृतम् । शुद्धविद्येश्वरसदाशिवा विद्याख्यतत्त्वगाः ॥ शिवशक्तिद्वयं चैव शिवतत्त्वं प्रकीर्तितम् । प्रमातृमेयप्रमितिरूपमेतत्तत्त्रयात्मकम् ॥ एतत् तत्त्वं शिवतत्त्वं सर्वतत्त्वमयं शुभम् । इति । विद्याबीजत्रयान्वितम् । विद्याया२ बीजानि वाग्भवकामराजशक्तिबीजानि, एतद्बोजसमुदायरूपं ३तुर्यबोजम्, तैश्चतुर्भिर्बीजैरन्वितम् । पादादिनाभिपर्यन्तम्४ । ५पर्यन्तपदसामर्थ्यान्नाभ्याद्यागलं ६लक्ष्यते, शिरस इति पञ्चमीसामर्थ्याद् गलादिति च७ लभ्यते । कोऽर्थः ? आत्मविद्याशिवतुरीयतत्त्वानि मूलविद्यावाग्भव- कामराजशक्तितुरीयबीजादिकानि चतुर्थ्यन्तनमो८न्तान्युच्चार्य पादादिनाभि९- आत्मा, विद्या और शिव ये तीन तत्त्व हैं। समस्त रूप से इन्हीं तीन तत्त्वों का समष्टि तुरीय तत्त्व कहलाता है। इनका वर्णन स्वच्छन्दसंग्रह में मिलता है— पृथिवी से लेकर माया पर्यन्त तत्त्व आत्मतत्त्व के अन्तर्गत माने जाते हैं। शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव ये विद्यातत्त्व के अन्तर्गत हैं। शिव और शक्ति ये दो तत्त्व शिव- तत्त्व कहे जाते हैं। ये तीनों तत्त्व प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के प्रतिनिधि हैं। इन सब तत्त्वों का समष्टिस্বরূপ, जहाँ कि इन भेदों की प्रतीति समाप्त हो जाती है, तुरीय परम शिवतत्त्व है। ये चारों तत्त्व विद्या के तीन बीजों से व्यष्टि और समष्टि के रूप में जुड़े हुए हैं। विद्या के तीन बीज वाग्भव, कामराज और शक्तिबीज के नाम से प्रसिद्ध हैं। इन बीजों की समष्टि से तुर्यबीज बनता है। इन चार बीजों से उक्त चार तत्त्वों को संयुक्त करना चाहिये। तब एक-एक बीज का उच्चारण करते हुए एक-एक तत्त्व का क्रमशः पैर से लेकर नाभि पर्यन्त, पर्यन्त शब्द को आगे भी जोड़ कर नाभि से कण्ठ पर्यन्त, 'शिरसः' इस पंचमी विभक्ति के उदाहरण से गले से लेकर सिर तक उक्त तीन तत्त्वों का न्यास करना चाहिये। इसका अभिप्राय यह है कि आत्मा, विद्या, शिव और तुरीय तत्त्वों को मूलविद्या के वाग्भव, कामराज, शक्ति और तुरीय बीजों से संयुक्त कर उनको चतुर्थी विभक्ति और नमः पद के साथ जोड़ देना चाहिये। तब एक-एक का उच्चारण करते हुए पैर से नाभिपर्यन्त, नाभि से कण्ठपर्यन्त, कण्ठ से मस्तक पर्यन्त और फिर १. त्वमन्त-क. ग. । २. विद्याबी-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. तुरीय-ख. ने. उ. । ४. न्तं स्पष्टम्-क. ग. । ५. आगलमित्यादिसा-क. ग. । ६. लभ्यते-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. 'च' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. नमोऽन्तकानि-क. ग. । ९. नाभ्यन्तम्-ख. ने.