भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७३ पर्यन्तम्, नाभ्यादिगलान्तम्, गलादिशिरोऽन्तं ¹समुपस्पृश्य व्यापकं न्यसे- दित्यर्थः ॥८५-८६॥ भूयोऽपि पराहन्ताभावनामाह— स्वात्मीकृत्य परं पुनः । परं विश्वोत्तीर्णं तेजः, पुनः स्वात्मीकृत्य । पूर्वं श्रीचक्रन्यासानन्तरं “स्वाभेदेन विचिन्तयेत्” (३।८१) इति ²परेणैक्यमुक्तम्, इदानीं करशुद्ध्यादिन्यासानन्तर- मपि पुनः परज्योतिर्मायावशात् स्वभिन्नमिव प्रतीयमानं स्वाभेदेन विचिन्तयेदिति स्वात्मीकृत्य परं³ पुनः करशुद्ध्यादिन्याससामर्थ्यान्मायापगमे श्रीमहान्त्रिपुरसुन्दरीं स्वात्मतया विभाव्येत्यर्थः ॥८६॥ अमृतप्लावनमाह— सन्तर्पयेत् पुनर्देवीं सौम्याग्नेयामृतद्रवैः ॥८६॥ सौम्यं ब्रह्मारन्ध्राधोमुखसहस्रदलकमलकर्णिकामध्यगतपूर्णसोममण्डलमध्य- स्थितत्रिकोणान्तरस्थितमनच्कानुत्तरात्म हार्धकलात्मकं सौम्यम् । मूलाधारचतुर्दल- अन्त में तुरीय तत्त्व का तुरीय बीज से संयोजन कर पूरे शरीर में व्यापक न्यास करना चाहिये ॥८५-८६॥ पुनः अपने में पराहन्ता की भावना का उपदेश करते हैं— परम ज्योति की पुनः स्वात्मस्वरूप में भावना करे ॥ पर शब्द का अर्थ यहाँ विश्वोत्तीर्ण ज्योति है। उस विश्वोत्तीर्ण परम प्रकाश को पुनः अपने से अभिन्न बना ले। पहले (३।८१) श्रीचक्र न्यास के बाद अभेद वासना (भावना) का उपदेश दिया गया था। अब करशुद्धि आदि न्यासों को करने के बाद पुनः पर ज्योति से अपनी अभिन्नता की भावना की बात कही गई है। यह इसलिये कहा गया है कि माया के कारण साधक उस परम ज्योति को अपने से भिन्न देखने लगता है। न्यास करके साधक यह भावना करे कि वह मुझ से अभिन्न है। करशुद्धि आदि न्यासों की सामर्थ्य से जब उसका माया-मल हट जाय, तो वह अपने को महात्रिपुर- सुन्दरी के रूप में ही देखे, उससे अपने को अभिन्न माने ॥८६॥ इसके बाद अपने को अमृत से प्लावित कर ले— तब स्वात्मस्वरूप देवी को सौम्य और आग्नेय अमृत रस से सन्तृप्त कर ले ॥८६॥ ब्रह्मारन्ध्र स्थित अधोमुख सहस्रदल कमल की कर्णिका के मध्य में स्थित पूर्ण सोम- मण्डल के मध्य में विराजमान त्रिकोण के भीतर अनच्क, अनुत्तर, हार्धकलात्मक स्वरूप १. संस्पृश्य-ख. ने. ज. झ. उ. । २. 'परे''''विचिन्तयेदिति' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ३. 'परं' नास्ति-क. ग. ज. झ. उ. । १८

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