योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः कमलकर्णिकामध्यगतपूर्णवह्निमण्डलमध्यगतत्रिकोणान्तरस्थितमनच्कानुत्तरात्म- सपरार्धकलारूपमाग्नेयम् । द्वयोरमृतानलकुण्डलिनीरूपयोरधऊर्ध्वं १प्रसरतोर्योनि- लिङ्गाकारयोः सामरस्यात् २प्रसरदमृतद्रवासारैः सन्तर्पयेत् आप्लावयेत् । अयमेव सम्प्रदायविद्भिर्देशिकैः पद्धतिषु परान्यास ३इत्युच्यते ॥८६॥ ४उक्तचतुर्विधन्न्यासमनुवादपुरःसरमुपसंहरति— एवं चतुर्विधो न्यासः कर्त्तव्यो वीरवन्दिते । षोढान्यासोऽणिमाद्यश्च मूलदेव्यादिकः प्रिये ॥८७॥ करशुद्ध्यादिकश्चैव साधकेन सुसिद्धये । एवमुक्तप्रकारेण । षोढान्यासादिः सुसिद्धये सुखेन न्याससामर्थ्यान्निराकृत- प्रत्यूहतया परमनःश्रेयसप्राप्तये । साधकेन मुमुक्षुणा कर्त्तव्यः, न तु सिद्धेन, तस्य मुक्तत्वात् । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः— को यहाँ सौम्य कहा गया है और मूलाधार स्थित चतुर्दल कमल की कर्णिका के मध्य में स्थित पूर्ण वह्निमण्डल के मध्य में विराजमान त्रिकोण के भीतर अनच्क, अनुत्तर सपरार्धकलात्मक स्वरूप को आग्नेय । ये दोनों अमृत और अनिल (अग्नि) कुण्डलिनियों के स्वरूप हैं । इनका जब नीचे और ऊपर प्रसार होता है, तो ये योनि और लिंग का स्वरूप धारण कर लेती हैं । इनके सामरस्य के कारण प्रवहमान अमृत रस की वृष्टि से अपने को सन्तृप्त कर ले, आप्लावित कर ले । त्रिपुरा सम्प्रदाय के जानकार आचार्यगण इसी को परा न्यास कहते हैं ॥८६॥ उक्त चतुर्विध न्यास का अनुवाद के साथ उपसंहार करते हैं— हे वीरवन्दिते ! इस तरह से यह चतुर्विध न्यास करना चाहिये । हे प्रिये ! साधक को परम कल्याण की प्राप्ति के लिये षोढा न्यास, अणिमादि न्यास, मूलदेव्यादि न्यास और करशुद्धादि न्यास करना चाहिये ॥८७-८८॥ इस तरह ऊपर बताई गई पद्धति से षोढान्यास आदि का न्यास करना चाहिये । इन न्यासों की सहायता से साधक सभी विघ्नों को दूर कर परम कल्याण की प्राप्ति में समर्थ हो जाता है । मुमुक्षु साधक को ही ये न्यास करने हैं । मुक्त सिद्ध को इनकी आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह तो मुक्त हो चुका है । विज्ञानभैरव भट्टारक ने कहा है— १. प्रसृतयो-उ. । २. क्षरद-ख, ने. ज. झ. उ. । ३. 'इति' नास्ति-ख. । ४. एव- मुक्ते-घ.