योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७५ यैरेव पूज्यते द्रव्यैस्तर्प्यते वा परापरः । यश्चैव पूजकः ¹सर्वः स एवैकः क्व पूजनम् ॥ इति ॥८७-८८॥ (वि० भै०, श्लो०१५०) न्यासचतुष्टयस्य कालभेदेन विनियोगमाह— प्रातःकाले² तथा पूजासमये होमकर्मणि ॥८८॥ जपकाले³ तथा तेषां विनियोगः पृथक् पृथक् । पूजाकाले समस्तं वा कृत्वा साधकपुङ्गवः⁴ ॥८९॥ प्रातःकाले षोढान्यासम्, पूजासमयेऽणिमादिन्यासम्, होमसमये⁵ मूलदेव्यादिक- न्यासम्, जपकाले करशुद्ध्यादिन्यासं कुर्यादित्ययं⁶ पृथक् पृथग् विनियोगः । अथवा पूजाकाले समस्तं चतुर्विधं न्यासं कृत्वा साधकपुङ्गवः साधकश्रेष्ठः, चतु- र्विधन्यासकरणसामर्थ्याद् विशीर्यमाणपाश⁷पटलत्वात् प्रत्यासन्नमोक्षत्वात्⁸ कृत- कृत्य एव ॥८८-८९॥ षट्त्रिंशत्तत्त्वपर्यन्तमासनं परिकल्प्य च । गुप्तादियोगिनीनां च मन्त्रेणाऽथ बलिं ददेत् ॥९०॥ परा देवी के साथ पर भैरव की जिन पुष्प आदि द्रव्यों से पूजा की जाती है और जिन खीर मावा आदि से तृप्ति कराई जाती है तथा जो यह सब पूजा आदि करता है, वह सब कुछ भगवान् भैरव का ही स्वरूप है। ऐसी स्थिति में कौन, किसका, किससे पूजन करेगा ? ॥८७-८८॥ इन चारों न्यासों का समय के अनुसार विनियोग बताते हैं— प्रातःकाल, पूजा के समय, होम के समय और जप करते समय क्रमशः इनका अलग-अलग विनियोग करना चाहिये। अथवा श्रेष्ठ साधक को चाहिये कि वह इन सबका पूजा के समय अनुष्ठान करे ॥ प्रातःकाल षोढान्यास, पूजा के समय अणिमादि न्यास, होम के समय मूलदेव्यादि न्यास और जप के समय करशुद्ध्यादि न्यास करे। इस तरह से इन न्यासों का अलग- अलग विनियोग किया जाता है। अथवा पूजा के समय समस्त चतुर्विध न्यास करके साधकश्रेष्ठ अपूर्व शक्ति को प्राप्त कर लेता है। इससे उसके सारे पाशजाल छिन्न- भिन्न हो जाते हैं और वह शीघ्र ही जीवन्मुक्त अवस्था को प्राप्त कर कृतकृत्य हो जाता है ॥८८-८९॥ पृथ्वी से शिव पर्यन्त छत्तीस तत्त्वों की आसन के रूप में कल्पना कर के गुप्ता आदि योगिनियों के मन्त्र से पूजा करे ॥९०॥ १. सर्व-ख. ने. झ. उ. । २. लेऽथवा पूजाकाले वा हो-ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. लेऽथवा-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ४. सत्तमः-ख. ने. च. झ. । ५. काले मूलविद्या- ६. विनियोगः-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ७. पटलत्वात्-ख. ने. । ८. त्वात् कृतकृत्य एव-ख. उ. ।