भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२७६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः षट्त्रिंशत्तत्त्वपर्यन्तं क्षित्यादिशिवान्तं तत्त्वसमुदाय¹रूपमासनं परिकल्प्य चिन्मरीचीनामाधारत्वादासनं श्रीचक्रं परिकल्प्य । तदुक्तं श्रीपराक्रमे— हृत्सरोजान्तरे ध्यायन्² पृथिव्यादिशिवान्तकम् । ³गुप्तादितत्कुसुमक्षेपेणाऽऽसनतां नयेत् ॥ इति । गुप्तादियोगिनीनामित्यत्र⁴ आदौ समस्तप्रकटपदमध्याहार्यम् । आदिपदेन गुप्ततरसम्प्रदायकुलकौलनिगर्भरहस्यातिरहस्यपरापररहस्ययोगिन्यो गृह्यन्ते । बलिः पूजा । तत्र निघण्टुः—"बलिः पूजोपहारेऽपि" इति । महाकविभिरप्युक्तम्— “अवचितबलिपुष्पा" (कु० सं० १।६०) इति । कोऽर्थः ? भावितात्मा⁵ बाह्यपूजा- करणात् पूर्वम् "यद्यद् बाह्यं वक्ष्यमाणं तत्तदान्तरमाचरेत्" इत्यस्मदुक्तरीत्याऽ- ऽन्तर्यागार्थं स्वशरीरं तत्त्वसमुदायरूपं श्रीचक्रं विभाव्य "समस्तप्रकटगुप्तगुप्ततर- पृथ्वी से शिव पर्यन्त छत्तीस तत्त्वों के समुदाय स्वरूप अपने शरीर को आसन मान- कर, चिच्छक्ति की किरणों का प्रसार इसी के सहारे होता है, ऐसा मानकर, इसमें श्रीचक्र की भावना करके साधक उसकी पूजा करे । श्रीपराक्रम में बताया गया है— पृथिवी से शिव पर्यन्त छत्तीस तत्त्वों का अपने हृदयकमल में ध्यान करता हुआ साधक गुप्ता आदि योगिनियों के मन्त्र से अभिमन्त्रित पुष्प के प्रक्षेप द्वारा उनको अपना आसन बना ले ॥ यहाँ गुप्ता आदि योगिनियों से पहले समस्त¹ प्रकट पद का अध्याहार किया जाता है । आदि शब्द से गुप्ततर, सम्प्रदाय, कुलकौल, निगर्भ, रहस्य, अतिरहस्य और परा- पररहस्य योगिनियों का ग्रहण किया जायगा । बलि का अर्थ यहाँ पूजा है । निघण्टु में बलि शब्द पूजा और उपहार का वाचक माना गया है । महाकवि कालिदास ने कुमार- संभव में पार्वती के लिये 'अवचितबलिपुष्पा' विशेषण दिया है । उसका अर्थ है पूजा के लिये जिसने पुष्प चुन लिये हैं । इसका अभिप्राय यह है कि "बाह्य पूजा में जो कुछ बताया गया है, उसकी पहले आन्तर रूप से भी भावना करे" हमारी बताई गई इस पद्धति से भावितात्मा साधक अन्तर्याग की सिद्धि के लिये अपने शरीर की तत्त्वसमुदाय १. 'रूप' नास्ति—ने. ज. झ. उ. । २. व्याप्तं—ख. ज. उ. । ३. सौवर्णं—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. मित्यस्य—क. ग. । ५. तात्मपूजा—ख. ने. ज. उ. ।

  1. इन सबको मिलाकर नौ योगिनियों के नाम ये होंगे—प्रकटा, गुप्ता, गुप्ततरा, सम्प्रदाया, कुलकौला, निगर्भा, रहस्या, अतिरहस्या और परापररहस्या । त्रिपुरा आदि नौ चक्रेश्वरी विद्याएँ ही प्रकटा आदि नामों से पूजित होती हैं । इसका वर्णन आगे किया जायेगा । इसलिए यहाँ...