भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७७ सम्प्रदायकुलकौलनिगर्भरहस्यातिरहस्यपरापररहस्ययोगिनीश्री^१पादुकाभ्यो नमः” इति योगिनीमूलमन्त्रेण स्वशिरसि पूजां कुर्यादित्यर्थः । ^२एतेन बाह्यपूजां सर्वा- मप्यादवान्तः^३ कुर्यादिति सूच्यते ॥९०॥ आन्तरविघ्ननिरासमाह— पिण्डरूपपदग्रन्थिभेदनाद् विघ्नभेदनँम् । गुह्यहृन्मुखमूर्धसु विद्यान्यासेन सुन्दरि ॥९१॥ गुह्यहृन्मुखमूर्धसु । गुह्यशब्देन गुदमेढ्रा^५न्तरालं लक्ष्यते । मुखशब्देन मुखाव- यवो ललाटं लक्ष्यते । गुह्यहृन्मुखमूर्धसु चतुर्षु ^६स्थानेषु विद्यान्यासेन, विद्यायाः सौभाग्यविद्याया बीजचतुष्टयन्यासेन । पिण्डं कुण्डलिनी । पिण्डशब्देन कुण्डलिनी- स्थानं गुदमेढ्रान्तरं कन्दं लक्ष्यते । रूपपदेति^७ व्यत्ययो ज्ञेयः । पदं हंसः । पदशब्देन स्वरूप श्रीचक्र के रूप में भावना करे और उसकी “समस्तप्रकट०” इत्यादि योगिनी मूल- मन्त्र से अपने सिर पर पुष्पप्रक्षेप पूर्वक पूजा करे । इससे यह सूचित होता है कि सारी बाह्य पूजा को पहले आन्तर पूजा के रूप में सम्पन्न करे ॥९०॥ आन्तर विघ्नों को दूर करने की विधि बताते हैं— हे सुन्दरि ! गुह्य, हृदय, मुख और मूर्धा इन चार स्थानों में विद्यान्यास से पिण्ड, पद, रूप और ग्रन्थि का भेदन कर साधक सभी आन्तर विघ्नों का भी भेदन कर देता है ॥९१॥ गुह्य शब्द से गुदा और लिंग के बीच का स्थान और मुख शब्द से उसका अवयव ललाट लक्षित होता । गुह्य, हृदय, ललाट और सिर इन चार स्थानों में सौभाग्यविद्या के चार बीजों के न्यास से पिण्ड आदि का भेदन करे । पिण्ड कुण्डलिनी को कहते हैं । यहाँ पिण्ड शब्द से कुण्डलिनी का स्थान कन्द गृहीत होता है, जिसकी स्थिति गुदा और लिंग के बीच में मानी गई है । ^१रूप और पद में व्यत्यय जानना चाहिये, अर्थात् पहले १. ‘श्री’ नास्ति—ख. ने. उ., श्रीचक्र—झ. । २. अत एव—ख. ने. ज. उ. । ३. वन्ते क—क. विहाय सर्वत्र । ४. भेदकम्—क. ग. । ५. न्तरं—ख. ने. झ. उ. । ६. ‘स्थानेषु’ नास्ति—ख, ने. ज. उ. । ७. देऽपि—उ. ब. विहाय सार्वत्रिकः पाठः । १. इसका अभिप्राय यह है कि श्लोक के ‘रूपपद’ इस पाठ में रूप शब्द को पहले और पद शब्द को बाद में छन्द के अनुरोध से पढ़ दिया गया है, किन्तु उनका क्रम ‘पद- रूप’ ऐसा होना चाहिये, क्योंकि पिण्ड के बाद पद और तब रूप की स्थिति मानी जाती है । इसी बात को व्याख्याकार ने “रूपपदेति व्यत्ययो ज्ञेयः” इस वाक्य में कहा है ।