योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः हंसस्थानं हृदयं लक्ष्यते । रूपं बिन्दुः । रूपशब्देन बिन्दुस्थानं ललाटं लक्ष्यते । ग्रन्थिशब्देन यत्र विश्वं सूत्रे मणिरिव ग्रथ्यते तद् विश्वमूलं ब्रह्मरन्ध्रं चिन्मयं लक्ष्यते । एतच्चतुष्टयभेदनाद् विघ्नभेदनम् । कोऽर्थः ? गुह्यादिस्थानचतुष्टये विद्याबीजचतुष्टयन्यासेन "पातालादिषु लोकेषु ये विघ्ना भेदलक्षणाः" (सु० वा० २३) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या पातालादिरूपाणि १ पिण्डपदरूप२ग्रन्थिस्थानि ३ गुदहृदयललाटब्रह्मरन्ध्राणि भेदलक्षणानि भित्त्वा तदूर्ध्वं ४ तदतीतचिन्मयाद्वय- पदविश्रान्तिरन्तरो विघ्ननिरास इत्यर्थः । एतेन सर्वमपि बाह्यपूजान्त५मन्तः कुर्यादित्युपलक्ष्यते ॥९१॥ अन्तर्यागे देहस्यैव यागगृहत्वात् तदन्तर्विघ्नान्निरस्य बहिर्याग६मन्दिरगतानां विघ्नानामुत्सारणं कुर्यादित्याह— यागमन्दिरगांश्चैव विघ्नानुत्सार्य मन्त्रवित् । पद और बाद में रूप को रखना चाहिये । पद का अर्थ है हंस । पद शब्द से हंस (प्राण) का स्थान हृदय लक्षित होता है । रूप का अर्थ है बिन्दु । यहाँ रूप पद से बिन्दु का स्थान ललाट गृहीत है । ग्रन्थि शब्द ब्रह्मरन्ध्र का वाचक है । इस चिन्मय स्थान में सारा विश्व सूत्र में मणियों की तरह गुंथा हुआ है । इसीलिये यह विश्व का मूल कारण है । इन चारों का सौभाग्य विद्या के चार बीजों से भेदन करना ही सभी प्रकार के विघ्नों के नाश का परम उपाय है । इसका अभिप्राय यह है कि सुभगोदयवासना में शिवानन्द मुनि ने पाताल आदि लोकों में भेद दृष्टि को जन्म देने वाले विघ्नों की चर्चा की है । यहाँ पिण्ड, पद, रूप और ग्रन्थि स्थित गुदा, हृदय, ललाट और ब्रह्मरन्ध्र ही पाताल आदि लोकों के विघ्न माने गये हैं । इनमें विद्यमान भेददृष्टि का उन्मूलन कर साधक ऊपर उठे और इन सबके ऊपर प्रज्वलित चिन्मय अद्वय पद में विश्राम करे । आन्तर विघ्नों का नाश इसी पद्धति से होता है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि बाह्य पूजा की सभी विधियों को पहले आन्तर पूजा के रूप में सम्पन्न करना चाहिये ॥९१॥ अन्तर्याग में यह शरीर ही यागगृह है । इस तरह से देहगत विघ्नों का निरास कर अब साधक बाहर यागमन्दिर गत विघ्नों का भी उत्सारण करे, उसकी विधि बताते हैं— मन्त्रवित् साधक यागमन्दिर में घुसे विघ्नों का भी उत्सारण करे ॥ १. रूपेण—ख. ने. ज. झ. उ. । २. रूपरूपातीतस्थानानि—ख. ने. ज. झ. उ. । ३. कन्द—ख. ने. ज. उ. । ४. तदूर्ध्वं ज्वलन्ती ततश्चिन्मया—क. ग. । ५. पूजानन्तर— घ.। ६. 'मन्दिर' नास्ति—ख. ने. ज. झ. उ. ।