भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २७९ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भुवि संस्थिताः । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु १ शिवाज्ञया ॥ हूँ अस्त्राय फट् इति मन्त्रेण मन्त्रवित् साधकः, निर्गच्छतां विघ्नानां निजवामाङ्गसंकोचाद् २ मार्गं दत्त्वा उत्सार्य । भूमिगतान् नभोगतान् दिव्यांश्च विघ्नानुत्सारयेदित्याह— पाष्णिघातेन भौमांश्च तालेन च नभोगतान् ॥९२॥ अस्त्रमन्त्रेण ३दृष्ट्या च दिव्यान् विघ्नानपोहयेत् । ४पाष्णिघातेन पाष्णिघातत्रयेण । भौमान् भूमिष्ठान् विघ्नान् । अस्त्रमन्त्रेणेति सर्वत्रानुवर्तते । तालेन करतालत्रयेण । नभोगतान् अन्तरिक्षगतान् विघ्नान् । दृष्ट्या वीक्षणेन ५दिव्यांश्च विघ्नान् । अपोहयेत् निःसारयेत् ॥९२-९३॥ १अपसर्पन्तु इस श्लोक के उच्चारण के साथ "हूँ अस्त्राय फट्" इस मन्त्र का उच्चा- रण करते हुए साधक उस यागमण्डप से निकल भागते हुए विघ्नों को अपने बायें अंग को सिकोड़ कर मार्ग दिखाकर भगा दे । अपसर्पन्तु आदि श्लोक का अर्थ यह है कि जो प्राणी इस यागमण्डप की भूमि में छिपे हुए हैं, वे यहाँ से निकल भागें । जो प्राणी विघ्न उपस्थित करने वाले हैं, वे भगवान् शिव की आज्ञा से नष्ट हो जाँय ॥ इसके बाद भूमिगत, अन्तरिक्षगत और दिव्य विघ्नों को दूर करे— पाष्णिघात से भूमिगत, ताल से नभोगत और दृष्टि से दिव्य विघ्नों का उत्सारण करे । सर्वत्र अस्त्र मन्त्र का भी उच्चारण करे ॥९२-९३॥ पाष्णि (एडी) पर तीन बार आघात कर भूमिगत विघ्नों को अस्त्र मन्त्र का उच्चा- रण करते हुए निकाल भगावे । तीन बार ताली बजाकर अस्त्र मन्त्र का उच्चारण करते हुए अन्तरिक्षगत विघ्नों को निकाले और अपनी तिरछी दृष्टि से अस्त्र मन्त्र का उच्चारण करते हुए दिव्य विघ्नों को निकाल भगावे ॥९२-९३॥ १. गच्छन्तु–ख. ने. उ. । २. ङ्गसंकोचतः–क. ग., ङ्गं संकोच्य–उ. । ३. विद्यांश्च दृष्टचा–क. ग., दिव्यांश्च दृष्ट्या–उ. । ४. 'पाष्णि....दिव्यांश्च विघ्नान्' नास्ति– गा. ज. झ. उ. । ५. विद्यांश्च–क. ग. ।

  1. श्रौत और स्मार्त पद्धतियों में भी यह मन्त्र इसी रूप में उपलब्ध होता है । यह श्लोक योगिनीहृदय की किसी भी मातृका में नहीं मिलता और दीपिकाकार ने इसकी व्याख्या भी नहीं की है ।