भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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पृष्ठ 328

२८० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः निर्गतानां विघ्नानां पुनरप्रवेशाय वह्निप्राकारभावनामाह— दिक्ष्वधोध्वं महावह्निप्राकारं परिभावयेत् ॥९३॥ संविदग्नौ महासारे विमर्शैकशरीरिणि । भेदाभासमिदं हव्यं जुहोम्यपुनरुद्भवम् ॥ (सु० वा० ६४) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या सर्वतः स्फुरितपरसंविदेव महावह्निः, स एव "प्राकारः, दुर्लङ्घ्यत्वात् । सर्वतो दिक्षु परिस्फुरदद्वयपरसंविदात्मकमहावह्नि- प्राकारपरिकल्पनभावनया भेदप्रतीतिलक्षणानां विघ्नानामप्रवेश इत्यर्थः ॥९३॥ सूर्यपूजामाह— सामान्यार्घ्येण देवेशि मार्तण्डं परिपूजयेत् । प्रकाशशक्तिसहितम् सामान्यार्घ्यं विशेषार्घ्यं च वक्ष्यते (३।९८-१०३) । प्रकाशशक्तिसहितः, प्रकाशः परमः शिवः, शक्तिर्विमर्शाख्या, तया सहितो नित्यसमवेतः । [निकाले गये विघ्न पुनः वापस न आ जाँय, इसके लिये यागमण्डप के चारों तरफ अग्नि के बने परकोटे की भावना करे— सभी दिशाओं में ऊपर-नीचे सर्वत्र प्रज्वलित महावह्नि के प्राकार की भावना करे ॥९३॥ सुभगोदयवासना में शिवानन्द मुनि ने कहा है— विमर्श के साथ समरसीभूत परम सारवान् संविद्रूपी प्रकाशात्मक वह्नि में मैं इस भेद रूप में भासित हो रहे सारे जगत् रूपी द्रव्य की आहुति दे रहा हूँ, जिससे कि यह फिर पैदा न हो जाय ॥ इस वचन के अनुसार सर्वत्र प्रकाशित हो रही परा संवित् ही महावह्नि है। इसी में प्राकार (परकोटा) की कल्पना की जाती है, क्योंकि इसको लाँघ पाना कठिन है। सभी दिशाओं में प्रज्वलित हो रही अद्वयात्मक परा संवित् स्वरूपिणी महावह्नि में प्राकार की भावना करने से भेददृष्टि के कारण उत्पन्न होने वाले विघ्नसमुदाय का उस यज्ञस्थल में पुनः प्रवेश नहीं होने पावेगा, यही इसका भाव है ॥९३॥ अब सूर्यपूजा की विधि बताते हैं— हे देवेशि ! सामान्य अर्घ्य से प्रकाश शक्ति के साथ मार्तण्ड (सूर्य) की पूजा करे ॥ सामान्यार्घ्य और विशेषार्घ्य का आगे (३।९८-१०३) वर्णन किया जायगा। प्रकाश १. दिग्बन्धं च—च. उ. । २. ततो—ख. ने. च. छ. ज. झ. । ३. सर्व—ख. ने. ज. झ. उ. । ४. सर्ववस्तुतापर—ख. ग. ने. ज. उ. । ५. महाप्राकारः—ज. । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)

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