भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८१ स्वप्रकाशशिव एव भास्करस्तद्विमर्शविभवा मरीचयः । ^१यैः स भासयति वेद्यमण्डलं तस्य पूजनमहन्तया मतिः ॥ (चि० स्त० ५) इत्यस्मदुक्तरीत्या सर्वं सामान्यार्घ्येण स्वात्माहम्भावनालक्षणया पूजया भाव- येदित्यर्थः । बाह्यार्थस्तु स्पष्ट एव ॥९४॥ अस्यैव गुणाधिक्यमाह— अरुणाकल्पमुज्ज्वलम् ॥९४॥ ग्रहादिपरिवारं च विश्वतेजोऽवभासकम्^२ । “स्वसंवित् त्रिपुरा देवी लौहित्यं तद्विमर्शनम्” इति प्रामाणिकवचनोक्तरीत्या ^३विमर्शविभवविधारणभूषणम् । उज्ज्वलम्, उदयास्तमयरहितत्वात् । ग्रहादिपरि- वारं च । विषयान् गृह्णन्तीति ग्रहा इन्द्रियाणि, तेषामादि मनः, तत्परिवारं च है परमशिव और विमर्श है शक्ति। प्रकाश शक्ति से नित्य समवेत है सूर्य। चिद्वि- लास स्तव में यह इस तरह से वर्णित है— स्वयं प्रकाशमान शिव ही भास्कर (सूर्य) है और शिव का विमर्शात्मक वैभव ही सूर्य की किरणें हैं। इन्हीं किरणों से वह (सूर्य और शिव) इस सारे वेद्यस्वरूप जगत् को भासित करते हैं। इनमें आत्मबुद्धि की भावना करना ही वास्तविक सूर्योपासना है ॥ इस तरह से प्रकाश और विमर्शात्मक शक्ति से सम्पन्न भगवान् सूर्य की सामान्यार्घ्य से, अर्थात् स्वात्मस्वरूप में उनकी भावना करके आन्तर पूजा सम्पन्न करे और बाह्य सामान्य अर्घ्य समर्पित कर बाह्य पूजा का अनुष्ठान करे ॥९४॥ अब सूर्य के ही विशेष गुणों को बताते हैं— यह सूर्य अरुण आभावाले अलंकारों से सुशोभित है, सभी इन्द्रियां इसका परिवार है और यही सारे तेजों का प्रकाशक ह ॥९४-९५॥ किसी ^1प्रामाणिक व्यक्ति ने कहा है—“स्वात्मसंवित् ही त्रिपुरा देवी है और लौहित्य (ललाई) इसकी विमर्श शक्ति है”। इसके अनुसार यह प्रकाशात्मक सूर्य अपनी विमर्शस्वरूपिणी ललाई का आभूषण धारण किये हुए है। यह उदय और अस्त से रहित होने से सदा प्रकाशमान है । विषयों का ग्रहण करने वाली इन्द्रियाँ यहाँ ग्रह नाम से १. तैः-ख. ने. ज. उ. । २. नम्-क. ग. । ३. विमर्शविधारणम्-ख. ज. झ. उ. ।

  1. यह श्लोकार्ध भी भास्करराय की सेतुबन्ध व्याख्या (५।४१) के अनुसार नित्या- षोडशिकार्णव का अंग है, किन्तु दीपिकाकार इसको प्रामाणिक व्यक्ति का वचन मानते हैं और ३।१६३ की व्याख्या में इसको अभियुक्त का वचन कहते हैं।