भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२८२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः विविधविषयग्रहणलक्षणसंकल्पप्रत्ययप्रवाहप्रवर्तकमित्यर्थः । अत्रोपनिषत् — “धियो यो नः प्रचोदयात्” (ऋ० ३।४।१०) इति । विश्वतेजोऽवभासकम् । “तदेव१ ज्योतिषां ज्योतिः” (मु० उ० २।२।९) २इत्युपनिषदुक्तरीत्या बाह्यतेजो३गणप्रतीति- कारणनिजस्फुरणम् । बाह्यार्थस्तु—सोमादयोऽत्र४ ग्रहाः, सूर्यस्य प्रधानत्वात् । आदिशब्देन५ षडङ्गानि गृह्यन्ते । स्पष्टमन्यत् ॥९४-९५॥ बाह्यचक्रोद्धारमाह— सौम्याग्नेययुतैर्देवि रोचनागुरूकुङ्कुमैः ॥९५॥ मूलमुच्चारयन् सम्यग् भावयेच्चक्रराजकम् । कही गई हैं। इन इन्द्रियों में पहला मन है और बाकी इन्द्रियाँ उसका परिवार । यह मन ही बाकी इन्द्रियों को विविध विषयों के ग्रहण में लगाता है और उसके द्वारा गृहीत विषयों को अपनी संकल्प शक्ति के सहारे निरन्तर प्रवाहित करता रहता है। यह मन ही यहाँ सूर्य है और अन्य इन्द्रियाँ उसका परिवार । इसी के लिये प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र में बताया गया है— “जो हमारी बुद्धि को प्रेरित करता है”। यह प्रकाशात्मक सूर्य ही अन्य समस्त तेजों का प्रकाशक है। मुण्डक श्रुति कहती है— “वही सब ज्योतियों की ज्योति है”। इन बाह्य तेजों को प्रकाशित करने के लिये ही वह स्वयं प्रकाशित होता है। इस श्लोक में बताई गई बाह्यपूजा की विधि तो स्पष्ट है। ग्रह शब्द से इस पक्ष में सोम आदि ग्रहों का ग्रहण किया जायगा, क्योंकि इनमें सूर्य ही प्रधान है और सोम आदि ग्रह उसका परिवार है । आदि शब्द से १षडंग का ग्रहण किया जाता है। बाकी का अर्थ स्पष्ट है ॥९४-९५॥ बाह्य चक्र के उद्धार की पद्धति बताते हैं— हे देवि ! कपूर, केसर के साथ रोचना, अगुरु और कुंकुम को मिलाकर मूलमन्त्र का उच्चारण करते हुए भली भाँति चक्रराज श्रीयन्त्र का लेखन करे ॥९५-९६॥ १. तदेवानुत्तरं-ख. ने. ज. झ. । २. इति श्रुत्युक्त-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. गुण- ख. ने. ज. झ. उ. । ४. ‘अत्र’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. शब्दात्-क. ख. ग. । ६. गालिखे-ख. ने. च. छ. ज. झ. ।

  1. पहले (२।५७) एक सौ ग्यारह आवरण देवताओं के प्रसंग में षडंगों की चर्चा आ चुकी है। ऋजुविमर्शिनीकार (पृ० ११९) ने प्रपंचसार के एक श्लोक (६।६) को उद्धृत किया है। वहाँ षडंगों का उल्लेख है। सुभगोदय (पृ० २८६) भी देखिये । यहाँ उन्हीं षडंगों की पूजा का विधान है।