योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८३ सौम्यं कर्पूरम्, सोमनामवाच्यत्वात् । आग्नेयं काश्मीरम्, १अग्निशिखासंज्ञक- त्वात् । “काश्मीरजन्माग्निशिखम्” (२।६।१२४) इत्यमरः । रोचना गोरोचना; अगुरुः कालागुरुः, कुङ्कुमं घसृणम्, एतैः २सुधया पङ्कीकृत्य, तेन स्वर्णादिमये पट्टे हेमसूच्या ३विलिख्य । मूलं सौभाग्यविद्याम् । उच्चारयन्, परेण चेच्चक्रं लेखयति । स्वयं चेल्लिखति तदोच्चरन् । चक्रराजं चतुराम्नायमयत्वात् ४सर्व- पूजाचक्रेभ्योऽप्युत्तमम् । सम्यक् “समत्रिकोणशक्त्यग्रं समरेखं मनोहरम्” इत्य- भियुक्तवचनोक्तरीत्या, भावयेत् लिखेत्, लेखयेद् ५वा । तदुक्तमभियुक्तैः– “कस्तूरी- घसृणेन्दुचन्दन ६सुधाभिश्चक्रराजं लिखेत्” इति ॥९५-९६॥ योगिनीमूलमन्त्रेण क्षिपेत् पुष्पाञ्जलिं ततः ॥९६॥ सौम्य कपूर को कहते हैं, क्योंकि इसका भी नाम सोम है। काश्मीरी केसर आग्नेय कहलाती है, क्योंकि इसका नाम अग्निशिखा है। अमरकोश में (२।६।१२४) में काश्मीर- जन्मा, अग्निशिख आदि नाम इसके बताये गये हैं। रोचना गोरोचना (गोलोचन), अगुरु कालागुरु (अगर) और कुंकुम घृसृण (रोरी) को कहते हैं। इन सबको सुधा में मिलाकर चन्दन बना ले । इस चन्दन से सोने की सुई के द्वारा सोने आदि के पत्तर पर लिखे । दूसरे से लिखाते समय मूल सौभाग्यविद्या का उच्चारण कराया जाता है। साधक यदि स्वयं श्रीचक्र का लेखन करता है, तो वह मन्त्र का उच्चारण भी स्वयं ही करता है। इसको चक्रराज इसलिये कहा जाता है कि इसकी उपासना चारों आम्नायों में की जाती है, अतः यह अन्य पूजा-चक्रों की अपेक्षा उत्तम है। किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने बताया है– “श्रीचक्र को लिखते समय इसके शिव और शक्ति त्रिकोण एक समान होने चाहिये, रेखाएँ भी समान होनी चाहिये, जिससे यह देखने में मनोहर हो” । सम्यक्- लेखन से इसी प्रकार का लेखन अभिप्रेत है । 'भावयेत्' क्रिया का प्रयोग यहाँ लिखने अथवा लिखाने के अर्थ में हुआ है । इस प्रसंग में– “कस्तूरी, कुंकुम, कपूर, चन्दन और सुधा को मिलाकर चक्रराज का लेखन करे” यह १प्रामाणिक वचन भी स्मरणीय है ॥९५-९६॥ तब योगिनी के मूलमन्त्र से पुष्पांजलि समर्पित करे ॥९६॥ १. 'अग्नि....कत्वात्' नास्ति–ख. ने. ज. झ. । २. सुरया–ने. झ. उ. । ३. यन्त्र- राजं वि–उ. । ४. तत् सर्वं–ख. ने. ज. झ. उ. । ५. येच्च–ख. ने. ज. झ. उ. । ६. सुरा–ने. उ. ।
- श्लोक का यह अंश लुप्तागमसंग्रह, द्वितीय भाग (पृ० १२) में संगृहीत उदयाकर- पद्धति के श्लोक का चतुर्थ पाद है । ज्ञानदीपविमर्शिनी में यह उद्धृत है ।