योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः योगिनीनां प्रकटादीनाम्, मूलमन्त्रेण “समस्तप्रकट०” इत्यादिना पूर्वोक्तेन, पुष्पाञ्जलिं ततः तत्र१ श्रीचक्रे निक्षिपेत् ॥९६॥ २पुष्पाणामभावेऽपि कार्यतामाह— मणिमुक्ताप्रवालैर्वा विलोमं मूलविद्यया । अशून्यं सर्वदा३ कुर्यात् विलोमं प्रतिलोमम् । उच्चरितया ४मूलविद्यया सौभाग्यविद्यया । वाशब्दः काकाक्षिवदुभयत्रापि५ संबद्धयते । अशून्यम् अविरहितम् । सर्वदा६ येन केन प्रकारेण कुर्यात् । पुष्पाणामभावे मण्यादिभिर्वा योगिनीमूलमन्त्रेण सौभाग्यविद्यया वा सर्वदा७ अशून्यं चक्रं कुर्यात्, पूजयेदित्यर्थः ॥९७॥ योगिनी शब्द यहाँ प्रकटा आदि योगिनियों का सूचक है। उन योगिनियों का मूल- मन्त्र “समस्तप्रकट०” यहाँ पहले (३।९०) बताया जा चुका है। श्रीचक्र के लेखन के बाद इसी मन्त्र से उस श्रीचक्र पर पुष्पांजलि समर्पित करे ॥९६॥ १पुष्प आदि के न मिलने पर यह करना चाहिये — मणि, मुक्ता, प्रवाल से अथवा विलोम उच्चरित मूलविद्या से उस श्रीचक्र को सदा अशून्य रखे ॥९७॥ विलोम का अर्थ है प्रतिलोम (उलटा)। मूलविद्या, सौभाग्यविद्या का उलटा उच्चा- रण करते हुए इस श्रीचक्र को कभी शून्य न करे। काक (कौआ) की आँख की तरह यहाँ ‘वा’ शब्द का संबन्ध मणि इत्यादि से अथवा मूलविद्या से भी हो जाता है। इनमें से किसी एक के बिना इस श्रीचक्र को नहीं रखना चाहिये। सदा किसी न किसी एक का संबन्ध उससे अवश्य रहना चाहिये। पुष्पों के अभाव में मणि इत्यादि से, योगिनी मूल- मन्त्र से अथवा विलोम उच्चरित सौभाग्यविद्या से सदा इस चक्र को अवश्य अशून्य रखकर पूजा करनी चाहिये ॥९७॥ १. ‘तत्र’ नास्ति-क. ख. ग. । २. पुष्पादीना-क. ग. । ३. सर्वथा-ख. च. छ. ज. झ. । ४. ‘मूलविद्यया’ नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. यत्र संयुज्यते-ख. ने. झ. उ. । ६. सर्वथा एकेनापि प्रकारेण-ख. ने. झ. उ. । ७. सर्वथा अशून्यं चक्रं पूज-ख. ने. ज. झ. उ. ।
- पुष्पों के अभाव में मणि, मुक्ता, प्रवाल आदि बहुमूल्य रत्नों की चर्चा अटपटी सी लगती है, किन्तु साथ ही यहाँ विकल्प के रूप में मूलविद्या की भी चर्चा है। इसका अभिप्राय यह है कि सम्पन्न व्यक्ति श्रीचक्र को मणि, मुक्ता, प्रवाल आदि से अशून्य रखे तथा साधनहीन व्यक्ति उस चक्र पर विलोम क्रम से मूलविद्या को ही लिख ले।