भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 333

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८५ तथाऽकरणे निष्फलतामाह— शून्ये विघ्नास्त्वनेकंशः ॥९७॥ मण्यादिभिः शून्ये सति श्रीचक्रेऽनेकंशः १ बहुशः, विघ्नाः सपर्यान्तरायाः संभ- वेयुः ॥९७॥ सामान्यार्घ्यविधानमाह— श्रीचक्रस्यात्मनश्चैव मध्ये त्वर्घ्यं प्रतिष्ठयेत् । श्रीचक्रस्य पूर्वोक्तरीत्या उद्धृतस्य, साधकस्य च मध्ये, अर्घ्यं वक्ष्यमाणरीत्या २प्रतिष्ठयेत् ३प्रतिष्ठापयेत् ॥९७॥ अर्घ्यप्रतिष्ठा४प्रकारमाह— चतुरस्रान्तरालस्थकोणषट्के सुरेश्वरि ॥९८॥ षडासनानि सम्पूज्य त्रिकोणस्यान्तरे पुनः । पीठानि चतुरो देवि कामूजाओ इति क्रमात् ॥९९॥ अर्चयित्वाऽर्घ्यपादे तु वह्नेर्दश कला यजेत् । ऐसा न करने पर पूजा निष्फल हो जाती है— श्रीचक्र के शून्य रहने पर अनेक विघ्न आते हैं ॥९७॥ श्रीचक्र के मणि इत्यादि से शून्य रहने पर अनेक विघ्न पूजा के समय उपस्थित होने लगते हैं ॥ ९७॥ अब सामान्य अर्घ्य की विधि बताते हैं— श्रीचक्र के और अपने बीच में अर्घ्य की स्थापना करे ॥ पूर्वोक्त पद्धति से उद्धृत श्रीचक्र और साधक के बीच के स्थान में आगे बताई जा रही पद्धति से अर्घ्य की स्थापना करे ॥ ९८॥ अर्घ्य की स्थापना का प्रकार यह है— हे सुरेश्वरि ! चतुरस्र के अन्तराल में षट्कोण चक्र बनावे और उसमें छः आसनों की पूजा करे । इसके बाद हे देवि ! षट्कोण के अन्तराल में स्थित त्रिकोण में का पू जा ओ नामक चार पीठों की क्रम से पूजा करके तब अर्घ्य के आधार पात्र में वह्नि की दस कलाओं की पूजा करे ॥९८-१००॥ १. कशो विघ्ना बहवो विघ्नाः-ख. ने. झ. उ. । २. प्रतिक्षिपेत्-क. ग. । ३. 'प्रतिष्ठापयेत्' नास्ति-ख. ज. झ. व. उ. । ४. 'प्रकार' नास्ति-ख. ने. ज. उ. । ५. पीठांस्त्रिचतुरो-क. च. उ. । ६. पात्रे-उ. ।