भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२८६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः चतुरस्रान्तरालस्य कोणषट्के आदौ चतुरस्रं लिखित्वा तदन्तर्वृत्तं तदन्तः षट्- कोणं तन्मध्ये त्रिकोणमिति मण्डलं गोमयोपलिप्तभूतले मत्स्यमुद्रया विलिखेदिति सामर्थ्यलभ्यम्। तदुक्तं श्रीपराक्रमे— ततो गोमयसंलिप्ते चतुरस्रे भुवः स्थले। प्रवहच्छ्वासहस्तेन कृतया मत्स्यमुद्रया॥ दिव्यगन्धं तुल्ययुक्तं विलिखेदर्घ्यमण्डलम्। वेदास्रवृत्तषट्कोणत्रिकोणाभ्यन्तरेऽन्तरे ॥ इति। एवं चतुरस्रवृत्तान्तरालकोणषट्के षडासनानि सम्पूज्य अमृतार्णवपोताम्बुजा- त्मचक्रसर्वमन्त्रसाध्यसिद्धासनानि सम्पूज्य षट्कोणान्तरस्थत्रिकोणमध्ये का काम- गिरिपीठम्, पू पूर्णगिरिपीठम्, जा जालन्ध्रपीठम्, ओ ओड्याणपीठं च क्रमात्² त्रिकोणकोणेषु त्रयं मध्ये चैकमर्चयित्वा अर्घ्यपादे आधारे तत्र पात्रं प्रतिष्ठाप्याऽ- भ्यर्च्य तन्मध्ये वह्निबिम्बमभ्यर्च्य तत्परितः कलाश्चाभ्यर्चयेत्। तदुक्तं स्वच्छन्द- संग्रहे— 'चतुरस्रान्तरालस्थकोणषट्के' इस समस्त पद का यह अर्थ है कि पहले चतुरस्र को लिखकर उसके अन्दर वृत्त बनावे और उस वृत्त के अन्दर षट्कोण और उसके मध्य में त्रिकोण का लेखन करे। गोबर से लीप कर पवित्र की गई भूमि में मत्स्य मुद्रा से इस मण्डल का निर्माण करना चाहिये। इस विषय में श्रीपराक्रम का यह वचन प्रमाण है— तब गोबर से लीपी गई चतुरस्र भूमि पर, जिधर की श्वास चल रही है, उसी हाथ से बनाई गई मत्स्य मुद्रा से सभी सुगन्धि द्रव्यों को समान मात्रा में मिला कर अर्घ्य- मण्डल की रचना करे। चतुरस्र, वृत्त, षट्कोण और त्रिकोण की स्थिति एक दूसरे के अन्दर बनानी चाहिये॥ इस प्रकार अर्घ्यमण्डल का निर्माण करके चतुरस्र और वृत्त के बीच के छः कोनों में ¹अमृतार्णव, पोताम्बुज, आत्म, चक्र, सर्वमन्त्र, साध्यसिद्ध नामक छः आसनों की पूजा करे। तब षट्कोण के अन्तराल स्थित त्रिकोण के—का कामरूप पीठ, जा जालन्धर पीठ, पू पूर्णगिरि पीठ और ओ ओड्याण पीठ—इन चार पीठों में, अर्थात् त्रिकोण के तीन कोनों में और बीच में क्रमशः एक एक देवी की पूजा करे। इसके बाद उस पर अर्घ्यपात्र के आधार की स्थापना और पूजा करके उस आधार पात्र में अग्नि की और उसके चारों तरफ अग्नि की कलाओं की पूजा करे। स्वच्छन्दसंग्रह में इस विषय में कहा गया है — १. णिज्य—ब. विहाय सार्वत्रिकः पाठः। २. क्रमात् त्रिचतुरस्त्रीन् वा चतुरो वा त्रिकोणकोणेषु चतुरस्रे तन्मध्ये चार्चयित्वा, तत्राधारं प्रतिष्ठाप्य, अर्घ्यपादमाधारम्, तस्मिन् मध्ये वह्निबिम्ब-क. ग.। १. अमृतार्णवासन, पोताम्बुजासन, आत्मासन, चक्रासन, सर्वमन्त्रासन और साध्य- सिद्धासन नामक छः आसनों की चर्चा ज्ञानदीपविमर्शिनी की नामपद्धति में हुई है।