भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 335

तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८७ षट्कोणान्तस्त्रिकोणे तु वह्निबिम्बं कलायुतम् । आवाह्याधारतो देवि पूजयेन्मन्त्रवित्तमः ॥ इति । क्रमाद् यादिक्षान्तदशवर्णपूर्वास्तस्य१ वह्नेर्दशकला धूम्रार्चिराद्या यजेत् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— यादिक्षान्तानि२ वर्णानि कला वह्नेर्महेश्वरि । एताः कलाः समभ्यर्च्य स्वस्ववर्णैर्यथाविधि ॥ स्वबीजाद्याश्चतुर्थ्यन्तनाममध्या नमोऽन्तिमाः३ । प्रोक्ता वह्निकलामन्त्रा नामानि शृणु साम्प्रतम् ॥ धूम्रार्चिर्नीलरक्ता४ च कपिला विस्फुलिङ्गिनी । ज्वालामालिन्यर्चिष्मती तदूर्ध्वं हव्यवाहिनी ॥ अष्टमी कव्यवाहा च रौद्री संहारिणी५ ततः६ ॥ इति । [७धूम्रार्चिरू(ष्टा?ष्मा) ज्वलिनी ज्वालिनी विस्फुलिङ्गिनी । सुश्रीः सुरूपा कपिला हव्यकव्यवहेश्वरी ॥ (शा० ति० २।१५) इति तन्त्रान्तरे] ।।९८-११०।। हे देवि ! उत्तम मन्त्रवेत्ता साधक षट्कोण के अन्तराल में निर्मित त्रिकोण में अर्घ्य- पात्र की स्थापना कर उसमें अग्नि की कलाओं के साथ अग्निमण्डल की पूजा करे ।। यहाँ क्रमशः यकार से क्षकार पर्यन्त दस वर्णों के उच्चारण के साथ धूम्रार्चि आदि दस कलाओं की पूजा की जाती है। स्वच्छन्दसंग्रह में इसकी विधि वर्णित है— हे महेश्वरि ! यकार से क्षकार पर्यन्त दस वर्ण हैं। अग्नि की कलाएँ भी दस ही हैं। अपने अपने बीजवर्णों से इनकी पूजा करनी चाहिये। पहले अपना बीजाक्षर, तब चतुर्थी विभक्ति के साथ नाम तथा अन्त में नमः पद का संयोजन करना चाहिये। अग्नि की दस कलाओं के ये ही मन्त्र हैं। अब तुम इन कलाओं के नाम सुनो—धूम्रार्चि, नीलरक्ता, कपिला, विस्फुलिङ्गिनी, ज्वालामालिनी, अर्चिष्मती, हव्यवाहिनी, कव्यवाहा, रौद्री और संहारिणी ।। अन्य तन्त्र (शारदातिलक, २।१५) में इन दस कलाओं के नाम ये बताये गये हैं— धूम्रार्चि, ऊष्मा, ज्वलिनी, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, सुधी, सुरूपा, कपिला, हव्यकव्यवहा और ईश्वरी ।।९९-१००।। १. स्तस्यैव-ख. ने. ज. झ. उ. । २. न्तात्म-क. ग. । ३. न्तिकाः-क. ग. ज. । ४. लक्ता-क. ग., वक्त्रा-ज., वर्णा-उ. । ५. संवाहिनी-क. ग. । ६ तथा-क. ग. । ७. 'धूम्रा...न्तरे' नास्ति-ख. ने. झ. उ. ।