योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः अर्घ्यपात्रं प्रतिष्ठाप्य तत्र सूर्यकला यजेत् ॥ १००॥ पात्रे सूर्यकलाश्चैव कभादि द्वादशार्चयेत् । ¹पात्रे अर्घ्यपात्रमध्ये, सूर्यबिम्बमभ्यर्च्य । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— ²अस्त्रप्रक्षालितं शङ्खं स्थापयित्वा तथोपरि । हृदयात् सूर्यबिम्बं च समावाह्य स्वमन्त्रतः ॥ इति । अत्र सूर्यकलाः पूजयेत् । कादिठान्तं भादिडान्तं वर्णजातं ³क्रमोत्क्रमात् । द्वयं द्वयं ⁴प्रयोक्तव्यं कलाश्च तदनन्तरम् ॥ इत्यस्मदुक्तरीत्या कभादि ककारादिभकारादि वर्ण⁵युगलयुक्तद्वादशादित्यकलाः क्रमात् तपिन्याद्या द्वादश अर्चयेत् । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— आधार पर अर्घ्यपात्र को स्थापना करके वहां सूर्य और उसकी कलाओं का पूजन करे । सूर्य को बारह कलाओं का पूजन ककार आदि तथा भकार आदि बारह-बारह वर्णों से किया जाता है ॥१००-१०१॥ आधार पर स्थापित उस पात्र में सूर्यमण्डल की पूजा करनी चाहिये । इस विषय में स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है— उस आधार पर अस्त्र मन्त्र से प्रक्षालित शंख की स्थापना करे और उस पात्र में अपने हृदय में से सूर्यमन्त्र के द्वारा सूर्य का आह्वान कर उस पात्र में स्थापित करे ॥ इसी पात्र के चारों तरफ सूर्य की कलाओं का पूजन करे । जैसा कि ¹हमने बताया है— ककार से ठकार पर्यन्त बारह वर्णों का उच्चारण क्रम से तथा भकार से डकार पर्यन्त बारह वर्णों का उच्चारण व्युत्क्रम (उलटा क्रम) से किया जाता है । इस तरह से दो-दो वर्णों का प्रयोग कर तब कलाओं का उच्चारण करे ॥ इस तरह से ककार आदि और भकार आदि दो-दो वर्णों का उच्चारण करते हुए सूर्य की तपिनो आदि बारह कलाओं का पूजन करे । स्वच्छन्दसंग्रह में इस विषय का वर्णन मिलता है— १. पात्रमभ्यर्च्य पात्रमध्ये–ख. ने. ज. झ. उ. । २. अथ प्र–ख. ज. उ. । ३. क्रमोऽक्रमात्–क. ग., क्रमात् क्रमात्–ने. झ. । ४. च वक्तव्यम्–ख. ने. झ. उ. । ५. युग्म–ख उ. ।
- अमृतानन्द के मुद्रित ग्रन्थों में यह वचन नहीं मिलता । उनके अप्रकाशित ग्रन्थ तत्त्वविमर्शिनी का यह हो सकता है ।