योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २८९ कादिठान्ताक्षरा देवि मूर्तिनाम्ना समीरिताः । तपिनो तापिनी चैव शोधनी शोषणी तथा ॥ भ्रामणी क्लेदिनी चैव वरेण्याकर्षिणी तथा । सुषुम्ना ^१वृष्टिवाहा च ज्येष्ठा चैव हिरण्यदा ॥ एताः सौरकलाश्चैव व्युत्क्रमाद् ^२भादिडान्तिमाः । इति । ^३कभादिकथनाद् यकारादयो दश वह्निकलाः, अकारादयः षोडशः ^४स्वराः सोमकला इति गम्यते । तत्र पात्रे लवङ्गादिभिः सुगन्धिकुसुमैश्च^५ वासितं सलिलमापूर्य तस्मिन्निन्दुमण्डलमभ्यर्च्य । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— एलालवङ्गकङ्कोलान् जातीफलसुसंयुतान् । सुगन्धिकुसुमैर्द्रव्यैः^६ सह तस्मिन् जले क्षिपेत् ॥ इति । नवयोनिं समालिख्य पूर्ववज्जलमध्यतः । विशुद्धितः समावाह्य ^७चन्द्रमण्डलमर्चयेत् ॥ इति (च) ॥१००-१०१॥ हे देवि ! ककार से ठकार पर्यन्त अक्षरों वाली सूर्य की मूर्ति मानी जाती है। तपिनो तापिनी, शोधनी, शोषणी, भ्रामणी, क्लेदिनी, वरेण्या, आकर्षणी, सुषुम्ना, वृष्टिवाहा, ज्येष्ठा और हिरण्यदा—ये बारह सूर्यकलाएँ हैं। इनमें भकार से डकार पर्यन्त वर्णों का भी व्युत्क्रम से विन्यास किया जाता है ॥ कभादि को यहाँ सूर्य की कला बताया गया है। तदनुसार यकार आदि दस वर्ण वह्नि की कलाएं तथा अकार आदि सोलह स्वर सोम की कलाएं हैं, इसकी जानकारी हो जाती है। इस तरह से शंख पात्र में सूर्यमण्डल और उसकी कलाओं के पूजन के बाद उस पात्र में लवङ्ग आदि सुगन्धि द्रव्यों और पुष्पों से सुवासित जल भरे और तब उसमें चन्द्रमण्डल की पूजा करे, जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में बताया गया है— इलायची, लौंग, कक्कोल, जायफल आदि सुगन्धि द्रव्यों के साथ सुगन्धित पुष्पों से सुवासित जल उस पात्र में भरे। ^1पहले नवयोनि चक्र का निर्माण करे और तब जलीय धारणा के सहारे विशुद्धि चक्र से चन्द्रमण्डल का आह्वान कर वहाँ उसकी पूजा करे ॥१००-१०१॥ १. तुष्टि-ख. ने. । २. डादिभान्तिमाः-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. कठादि-झ. । ४. कलाः-ने. ज. झ. उ. । ५. मैर्वा वासितममृतसलिल-ख. ने. । ६. दिव्यैर्महत्तस्मिन् जलं किरेत्-ख. ने. झ. उ. । ७. चतुरस्रे सम-ख. ने. छ. ज. झ. उ. ।
- यहाँ के दोनों श्लोक स्वच्छन्दसंग्रह के ही लगते हैं। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)