भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२९० योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः विधृते तु पुनर्द्रव्ये षोडशेन्दुकला यजेत् ॥१०१॥ तस्मिन् विधृते द्रव्ये १ द्रव्ये । द्रवात्मकं द्रव्यं विशेषार्घ्यम् । मद्यं द्रवमयमेव हि । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— अतो हि विशेषार्घ्यस्य साधनं प्रोच्यतेऽधुना । आधारपात्रयोश्चैव तयोर्वह्न्यर्कपूजनम् ॥ सामान्यार्घ्योक्तमार्गेण २कृतपूजितपूज्यके । पात्रे त्वासवमापूर्य शिरोमन्त्रेण पूर्ववत् ॥ इति । षोडशेन्दुकलाः३ क्रमादकारादिषोडशस्वरादिका अमृताद्याः षोडश४ कलाः, यजेत्५ । तदुक्तं स्वच्छन्दसंग्रहे— आदिकान्तान्तगाः६ सौम्याः कला षोडश कीर्तिताः । तासां नामानि वक्ष्यामि शृणु सर्वाङ्गसुन्दरि ॥ उस शंख पात्र में भरे गये द्रव्य में चन्द्रमा की सोलह कलाओं का पूजन करे ॥१०१॥ उस शंख पात्र में भरे गये द्रवात्मक द्रव्य में, अर्थात् विशेषार्घ्य में १६ चन्द्रकलाओं का पूजन करे । द्रवमय द्रव्य से यहाँ मद्य का ग्रहण किया जाता है, जैसा कि स्वच्छन्द- संग्रह में कहा गया है— इसीलिये अब विशेषार्घ्य के साधन की पद्धति बताई जा रही है । आधार में और उस पर रखे शंखपात्र में वह्नि और सूर्य का पूजन सामान्य अर्घ्य की पद्धति से करके तब उस शंख पात्र में आसव भर कर पहले बताई गई पद्धति से शिरोमन्त्र, बीजमन्त्र और चतुर्थ्यन्त पद के साथ नमः पद जोड़ कर इन्दुकलाओं का पूजन करे ॥ चन्द्र की अमृता आदि सोलह कलाएँ क्रमशः अकार आदि सोलह स्वरों से संयुक्त की जाती हैं, जैसा कि स्वच्छन्दसंग्रह में कहा गया है— अकार से लेकर ककार के आदि में स्थित अःकार में जिनकी समाप्ति हो जाती है, ऐसे सोलह स्वर चन्द्र की जिन सोलह कलाओं से क्रमशः संयुक्त होते हैं, उनके नाम मैं १. द्रव्ये हव्ये । द्रव्यात्मकं मद्यं विशेषात्मकं मद्यं च । द्रव्यमयत्वमेव हि विशे- षार्घ्यस्य-ख. ने. ज्ञ. उ. । २. कृत्वा पूजेत सूर्यके-क. ग. । ३. ला यजेदिति-क. ग. ने. । ४. षोडशेन्दुकलाः-ज्ञ. । ५. यजेद् ध्यायेत्-उ. । ६. न्तिकाः-क. ख. ग. ने. ज्ञ. ।