योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९१ अमृता मानदा १पूषा पुष्टिः प्रीतिर्महेश्वरि । रेवती ह्रीमती चैव२ श्रीः कान्तिश्च सुधा ततः ॥ ज्योत्स्ना हैमवती चैव छाया सम्पूरिणी३ तथा । वामा रामा४ कलानां च नामान्येतानि वल्लभे ॥ इति ॥१०१॥ अमृतेशीं च तन्मध्ये भावयेच्च नवात्मना । नवात्मना ततो देवि५ तर्पयेद्धातुदेवताः ॥१०२॥ आनन्दभैरवं चैव वौषडन्तेन तर्पयेत् । ८लकुलीशं समुद्धृत्य भृगुं९ संवर्तकं तथा । पिनाकिनं च खड्गीशं भुजङ्गं१० बालिनं तथा ॥ योजयित्वा क्रमेणैव कार्यकारणमस्तकम् । अर्धीशं योजयेदन्ते नवात्माऽयं समुद्धतः ॥ कहूँगा, हे सर्वाङ्गसुन्दरि ! तुम सुनो । हे महेश्वरि ! हे वल्लभे ! अमृता, मानदा, पूषा, पुष्टि, प्रीति, रेवती, ह्रीमती, श्री, कान्ति, सुधा, ज्योत्स्ना, हैमवती, छाया, संपूरिणी, वामा और रामा—ये नाम हैं चन्द्रमा की इन सोलह कलाओं के ॥१०१॥ उस पात्र में नवात्म मन्त्र से अमृतेशी की भावना करे । तब नवात्म मन्त्र से ही हे देवि ! डाकिनी आदि धातुदेवताओं को तृप्त करके वौषट् मन्त्र का उच्चा- रण करते हुए आनन्दभैरव को भी तृप्त करे ॥१०२॥ लकुलीश (हकार) का उद्धार करके भृगु (सकार), संवर्तक (षकार), पिनाकी (लकार), खड्गीश (वकार), भुजङ्ग (रकार) और बाली (यकार) का भी उद्धार कर उनको क्रमशः लिख ले । अन्त में बिन्दु और नाद जिसके मस्तक पर हैं, ऐसे अर्धीश (ऊकार) का संयोजन करे । इस प्रकार से १नवात्म-मन्त्र का उद्धार किया जाता है ॥ १. पुष्टिस्र्तुष्टि-ख. ज. झ. उ. । २. देवि-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. रिता-क. ग. । ४. रामा श्यामा-क. ग. । ५. गौरि-ख. ने. च. छ. ज. झ. उ. । ६. आनन्द- भैरवायेति-ख. झ. । ७. वं वौषडन्तेनैव-क. ग. । ८. अमृतेशीं-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. भृगुः संवर्तकस्ततः-ख. ने. ज. उ. । १०. भुजगं यावनं-क. ग. ।
- स्वच्छन्दसंग्रह के प्रस्तुत उद्धरण में आठ ही वर्णों का उद्धार मिलता है । भास्कर- राय ने यहाँ ज्ञानार्णव (१४।१३-१४) के प्रमाण से नवात्म-मन्त्र का उद्धार इस तरह से किया है—शिव हकार, चन्द्र सकार, मातृकान्त क्षकार, काल मकार, शक्र लकार, अम्बु वकार, वह्नि रेफ, वायु यकार और वामकर्ण ऊकार का उद्धार कर उसको बिन्दु- नाद से संयोजित करना चाहिये । स्वच्छन्दसंग्रह के उक्त वचन में मकार का उद्धार नहीं हो पाया है ।