भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२९२ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः इति स्वच्छन्दसंग्रहोद्धृतं नवात्मानम् । तन्मध्ये१ तेन मन्त्रेण अमृतेशीम् प्रसृतामृतरश्म्योघसन्तर्पितचराचराम् । भवानि ! भवशान्त्यै त्वां भावयाम्यमृतेश्वरीम् ॥ (सौ० हृ० ७) इत्यभियुक्त२वचनोक्तरीत्याऽमृतस्राविणीं भावयेत् । नवात्मना ततो देवि३ धातुदेवता डाकिन्याद्याः । अत्रैवोक्तम्— विशुद्धौ हृदये नाभौ स्वाधिष्ठाने च मूलके । आज्ञायां धातुनाथाश्च न्यस्तव्या डादिदेवताः ॥ (३।३०) इति । नवात्मना पूर्वोक्तेन तर्पयेत् । आनन्दभैरवं चैवेत्येवकारेण नवात्मनैव४ आनन्दभैरवं तर्पयेदिति । नवात्मानमुच्चार्य "आनन्दभैरवाय वौषट्" इति तर्प- येदित्यर्थः ॥१०२-१०३॥ सामान्यार्घ्यप्रकारं विशेषार्घ्येऽप्यतिदिशति— तथैवार्घ्यं विशेषेण साधयेत् साधकोत्तमः ॥१०३॥ स्पष्टम्५ ॥१०३॥ स्वच्छन्दसंग्रह में ऊपर बताई गई पद्धति से नवात्म-मन्त्र का उद्धार बताया गया है । शंख के जल में इस नवात्म-मन्त्र से अमृत की वर्षा करने वाली अमृतेशी की भावना करे । इसकी भावना का प्रकार शिवानन्द मुनि ने अपने सौभाग्यहृदय नामक स्तोत्र में इस तरह से बताया है— हे भवानि ! अपनी अमृतमयी किरणों से समस्त चराचर जगत् को तृप्त करने वाली अमृतेश्वरी के रूप में मैं तुम्हारी भावना करता हूँ, जिससे कि सारे जगत् में शान्ति का साम्राज्य फैले ॥ डाकिनी आदि धातुदेवताओं का वर्णन पहले (३।३०) किया जा चुका है । वहाँ बताया गया है कि विशुद्धि आदि छः स्थानों में इन छः डाकिनी आदि देवताओं का न्यास करना चाहिये । नवात्म-मन्त्र से ही इनको भी यहाँ तृप्त करे । साथ ही नवात्म-मन्त्र से आनन्द- भैरव को भी तृप्त करे । यहाँ नवात्म-मन्त्र का उच्चारण करने के बाद "आनन्दभैरवाय वौषट्" इस वाक्य का भी उच्चारण करे ॥१०२-१०३॥ सामान्यार्घ्य की विधि से ही विशेषार्घ्य की भी शुद्धि करे, इसी विषय को अब बताया जा रहा है— साधकप्रवर को चाहिये कि वह इसी विधि से विशेषार्घ्य की भी शुद्धि कर ले ॥१०३॥ इसका अर्थ स्पष्ट है ॥१०३॥ १. ध्येयेनेन-ख. झ. उ. । २. युक्तोक्त्या-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. गौरि-ख. ने. ४. तौवानन्तरमन्त्रै-ग. । ५. स्पष्टमेतत्-ज.।