योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९३ एवमर्घ्यशुद्धिं कृत्वा तदनन्तरं गुरून् पूजयेदित्याह— गुरुपोदालिमापूज्य भैरवाय ददेत् पुनः । गुरूणां परमशिवादित्वगुरुपर्यन्तानाम्, २पादांलि ३पादुकापरम्परां ४दिव्य- सिद्धमानवौघत्रयवतीम्, आपूज्य स्वशिरस्यर्घ्योदकाक्षतकुसुमैरभ्यर्च्य । शोधित- मर्ध्यमाललाटं ५त्रिुरुद्धृत्य महापद्मवनान्तस्थशृङ्गाटोदरवासिने गुरुरूपिणे पूर्वोक्त- (१।१)निर्वचनाय ६भैरवाय, ददेत् निवेदयेत् ॥१०४॥ तत् पुनः— तदाज्ञाप्रेरितं तच्च गुरुपङ्क्तौ निवेदयेत् ॥१०४॥ तस्य गुरुरूपिणो भैरवस्य, आज्ञा७प्रेरितम् अनुज्ञातम्, ८तच्च द्रव्यं पुनश्च गुरुपङ्क्तौ निवेदयेत् ॥१०४॥ इस तरह से अर्घ्य की शुद्धि के बाद गुरुपंक्ति की आराधना करे, यह विषय अब बताया जा रहा है— गुरुओं की पादुका-परम्परा का पूजन करने के उपरान्त इस अर्घ्य को भैरव को निवेदित करे ॥ परशिव से लेकर अपने गुरु तक की पादुका-परम्परा की, दिव्य, सिद्ध और मान- वौघ क्रम से चली आ रही गुरु-परम्परा की पूजा करने के उपरान्त, अपने ही सिर पर अर्घ्योदक, अक्षत और पुष्प के द्वारा पूजन करके तब उस शोधित अर्घ्य को तीन बार उठाकर महापद्मवन में स्थित त्रिकोण के मध्य में विराजमान गुरुरूपी भैरव के प्रति निवे- दित करे । भैरव पद का निर्वचन पहले (१।१) बता दिया गया है ॥१०४॥ इसके बाद— उस गुरुरूपी भैरव की आज्ञा प्राप्त कर उस अर्घ्य को गुरुपंक्ति के लिये निवेदित करे ॥१०४॥ उस गुरुरूपी भैरव की आज्ञा के मिल जाने पर उस द्रव्य (अर्घ्य) को पुनः गुरुपंक्ति के लिये अर्पित करे ॥१०४॥ १. पादावलि पूज्य-क. उ. । २. पादावलिं-क. उ., वलीं-ख. ने. । ३. 'पादुका' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । ४. दिव्यौघसिद्धौघ-क. ग. उ. । ५. त्रिः समु-ख. ने. ज. झ. उ. । ६. 'भैरवाय' नास्ति-ने. ज. झ. उ. । ७. आज्ञया-ख. ने. झ. उ. । ८. 'तच्च द्रव्यं पुनः' नास्ति-ख. ने. ज. उ. ।