भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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२९४ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रसादग्रहणमाह— तदीयं शेषमादाय कोमाग्नौ विश्वतस्त्विषि । पादुकां मूलविद्यां च जपन् होमं समाचरेत् ॥१०५॥ तदीयं शेषं गुरुदेवतयोर्निवेदितं³ शेषं द्रव्यमादाय तत्त्वचतुष्टयशोधनमन्त्रैः “कामो देवः स⁴ काम्यत्वात्” (सौ० सु० ४।३) इत्यस्मदुक्तरीत्या विश्वघस्मर- ⁵कलाजाले कामेश्वराख्ये सर्वप्राणिष्वात्मन्यग्नौ⁶ । विश्वतस्त्विषि⁷ “विश्वग्रसन- शीलं तद्रूपं तेजोमयं ततः” इत्याज्ञावतारोक्तरीत्या विश्वघस्मरकलाजाले⁸ । पादुकां स्वगुरुश्रीपादुकाम्, मूलविद्यां सौभाग्य⁹विद्यां च जपन् । होमं भेदेन्धन- प्रक्षेपलक्षणं समाचरेत् । तदुक्तं श्रीपराक्रमे— निवेद्य१० मस्तकस्थाय गुरवेऽर्घ्यं तदाज्ञया । कल्पान्तहुतभुकल्पचिदग्नौ विश्वघस्मरे ॥ ११मेयराशिमयं हव्यं वासनात्मोपदर्शकम् । १२व्यतिषङ्गेण स जुह्वन् जपेदात्मानमामृशन् ॥ इति ॥१०५॥ इसके बाद स्वयं प्रसाद ग्रहण करे— गुरु और देवता को अर्पण करने के बाद उनके प्रसाद के रूप में सारे विश्व का ग्रास करने वाली कामाग्नि में गुरुपादुका और मूलविद्या का जप करते हुए आहुति दे ॥१०५॥ गुरु और देवता को अर्पित करने के बाद बचे हुए द्रव्य (अर्घ्य) की चार तत्त्वों का शोधन करने वाले मन्त्रों से शुद्धि कर विश्व का ग्रास करने में समर्थ कलाओं से संपन्न सभी प्राणियों में स्वात्मस्वरूप में विराजमान कामेश्वर रूपी अग्नि में उसकी आहुति दे। इस कामेश्वर का वर्णन हमने सौभाग्यसुभगोदय (४।३) में किया है। आज्ञावतार नामक ग्रन्थ में भी विश्व के ग्रास में समर्थ इस तेजोमय स्वरूप का वर्णन मिलता है। चारों तरफ से प्रकाशमान इस कामाग्नि में अपने गुरु की पादुका का और मूलमन्त्र (सौभाग्यविद्या) का जप करते हुए हवन करे, अर्थात् अपनी भेददृष्टि रूपी इन्धन को उस कामाग्नि में डाल कर स्वयं अद्वयतत्त्व में प्रतिष्ठित हो जाय। श्रीपराक्रम में बताया गया है— मस्तक में विराजमान गुरु को निवेदित करने के उपरान्त उसकी आज्ञा से विश्व का ग्रास करने में समर्थ कल्पान्त-कालीन अग्नि के समान प्रभास्वर चिदग्नि में मेयराशि के रूप में स्थित इस सारे जगत् को हवि मान कर और अपनी वासनाओं को चबैना १. शिवाग्नौ-ख. ने. च. छ. ज. झ. । २. स्थुषी-क. ग. । ३. तायाः पीतशेषं- ख. ने. झ. उ. । ४. प्रकाम्यमानत्वात्-मु. । ५. कीलाले-क. ग. । ६. णिस्वा- त्माग्नौ-ख. । ७. स्युषि-क. ग. । ८. कीलालजाले-क. ग. । ९. ग्यमूलवि-ख. ने. ज. झ. उ. । १०. निवेद्यामस्तकं स्वीयगुरोरर्घ्यं-ख. ने. ज. झ. उ. । ११. ज्ञेय-ख. ज. झ. उ. । १२. एतेषां गणशो जुह्वन्-ख. ज. झ. उ. ।