योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९५ ननु कः कामाग्निः ? स कुत्र¹ वा निवसति ? किं वा हविरित्यत आह— महाप्रकाशे विश्वस्य संहारवमनोद्यते । मरीचिवृत्तीर्जुहुयान्मनसा कुण्डलीमुखे ॥१०६॥ कुण्डलीमुखे, व्यवस्थिते इति शेषः । अत्र श्रुतिः—"तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः" (तै० आ० १०।११।१२) इति । महाप्रकाशे निरिन्धनदीप्ते निर्वाणरहिते प्रमातरि वह्नौ । विश्वस्य संहारवमनोद्यते । विश्वस्य शिवादि-² भूम्यन्तस्य, संहारे निजकारणतावन्मात्राऽवस्थितौ, वमने सर्जने चोद्यते । ³विश्वा- द्यैव शक्तिः । ⁴तदुक्तमाज्ञावतारे—"स्वेच्छयैव जगत्सर्वं निगिरत्युद्गिरत्यपि" इति । मनसा सार्धं मरीचिवृत्तीर्जुहुयात् । आन्तरस्य चिदनलस्य⁵ मरीचयोऽ- ⁶क्षाणि, ⁷बहिरर्थेषु तेषां ⁸सञ्चारा वृत्तयः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः—"यत्र⁹ यत्राक्षमार्गेण चैतन्यं व्यज्यते प्रभोः" (श्लो० ११४) इति । कोऽर्थः ? कुण्डलिन्याः मानकर उनकी बारी-बारी से आहुति देता हुआ अपने स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जप करे ॥१०५॥ प्रश्न होता है कि यह कामाग्नि क्या है ? वह कहाँ रहती है ? और वह हवि कौन सी है, जिसकी कि आहुति देने की बात है, इन्हीं का अब विवरण देते हैं— कुण्डलिनी के मुख में व्यवस्थित महाप्रकाशरूपी वह्नि में, जो कि स्वेच्छा से संसार के संहार और सर्जन में लगी हुई है, मन के साथ सभी इन्द्रियों की वृत्तियों की आहुति दे दे ॥१०६॥ यह कामाग्नि कुण्डलिनी के मुंह में विराजमान है । यह तैत्तिरीयारण्यक श्रुति इसमें प्रमाण है—"उस कुण्डलिनी रूप कामाग्नि के मध्य में परमात्मा विराजमान हैं" । यह कामाग्नि महाप्रकाशमय है, बिना ही इन्धन के निरन्तर बिना बुझे जलती रहती है । यह प्रमातृस्वरूपिणी महाप्रकाशमयी वह्नि शिव से भूमि पर्यन्त समस्त संसार को कारणता मात्र रूप में अपने में छिपा लेती है और फिर वही कार्य के रूप में इसको अपने से बाहर निकाल देती है । यह शक्ति सारे विश्व की जननी है । आज्ञावतार नामक ग्रन्थ में बताया गया है—"अपनी इच्छा से ही यह सारे जगत् को निगलती और उगलती रहती है" । इसमें मन के साथ इन्द्रियों की वृत्तियों की आहुति दे । आन्तर चिदग्नि की किरणें इन्द्रियां हैं। बाह्य अर्थों की तरफ इनका संचार ही वृत्तियां कहलाती हैं। विज्ञानभैरव भट्टारक ने कहा है—"जहाँ जहाँ इन्द्रियों के प्रसार के कारण प्रभु का चैतन्य अभिव्यक्त होता १. कुत्र निवसन्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. वादेर्भू-ख. ने. ज. झ. उ. । ३. शिवस्या- शैवेच्छा-क. ग. । ४. 'तदुक्तमाज्ञावतारे' नास्ति-ख. ज. झ. उ. । ५. चित्कलस्य- क. ग. । ६. अक्षनिबहः-ख. ने. झ. उ. । ७. 'बहिः' नास्ति-ख. ने. झ. उ. । ८. संवाहिकाः-ख. ने. ज. झ. उ. । ९. तत्र तत्रा-सार्वत्रिको दी० पाठः ।