योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)
Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi
अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९६ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः शिखायां महाशून्ये व्यवस्थिते सर्वप्राणिष्वात्मनि प्रकाशलक्षणे कामाग्नौ "आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन" (न्या० भा० १।१।४) इति तन्त्रा- न्तरोक्तरीत्या बहिरर्थेषु प्रसृतचिन्मरीचिरूपाक्षवृत्तिलक्षणं हविस्तेनैव मार्गेणान्त- र्मुखतया मनसा सह^१ जुहुयादित्यर्थः । तदुक्तं विज्ञानभैरवभट्टारकैः- महाशून्यालये वह्नौ भूताक्षविषयादिकम् । ^२हूयते मनसा सार्धं स^३ होमश्चेतनास्त्रुचा ॥ इति । (श्लो० १४६) ^४अयमेवान्तरो होमः । तदुक्तं पद्धतिषु- धर्माधर्महविर्दीप्ते आत्माग्नौ मनसा स्रुचा । सुषुम्नावर्त्मना नित्यमक्षवृत्तोजुंहोम्यहम् ॥ इति ॥१०६॥ है"^1 । इसका अभिप्राय यह है कि कुण्डलिनी की शिखा में, महाशून्य में विराजमान सभी प्राणियों में स्वात्मस्वरूप महाप्रकाश (कामात्मक) वह्नि में बाह्य विषयों के रूप में प्रसृत समस्त इन्द्रियों की वृत्तियों की आहुति दे दी जाती है । "आत्मा मन से, मन इन्द्रियों से और इन्द्रियाँ अर्थ से संयुक्त होती हैं" न्यायभाष्य की इस पद्धति से बाह्य विषयों की तरफ आकृष्ट चिन्मरीचिस्वरूप इन्द्रियों की वृत्तियों को ही आहुति माना गया है । यहाँ आहुति का तात्पर्य जिस पद्धति से ये बाहर आईं, उसी पद्धति से इनको अन्तर्मुख बनाकर उनको मन के साथ अपनी आत्मा को समर्पित कर देना है। विज्ञानभैरव भट्टारक का इस विषय में कहना है- महाशून्य स्थान में विराजमान चित्स्वरूपिणी वह्नि में अपनी चेतना की स्रुचा बना- कर मन के साथ पाँच महाभूतों, बाह्य इन्द्रियों और उनके विषयों की जो आहुति दी जाती है, वही वास्तविक होम है ॥ इसी को आन्तर होम कहा जाता है, जैसा कि ^2पद्धतियों में बताया गया है- धर्म और अधर्म रूपी आहुति से प्रज्वलित आत्मचिदग्नि में मन रूपी स्रुचा की सहा- यता से मैं अपने सुषुम्ना मार्ग को खोल कर अपनी इन्द्रियों की वृत्तियों की नित्य आहुति देता हूँ ॥१०६॥ १. 'सह' नास्ति-ख. ने. ज. झ. उ. । २. वातेन-ख. ने. ज. उ. । ३. महामहिम- शालिनि-ख. ने. उ. । ४. महामहिमशाली चाय-झ. ।
- विज्ञानभैरव का पूरा श्लोक और उसको व्याख्या हमारे भाषानुवाद में देखी जा सकती है ।
- यह श्लोक अनेक पद्धति-ग्रन्थों तथा तन्त्र-ग्रन्थों में भी मिलता है ।