भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

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तृतीयः ] दीपिकाभाषानुवादसहितम् २९७ आन्तरामेव पूर्णाहूतिमाह— अहन्तेदन्तयोरैक्यमुन्मन्यां१ स्रुचि कल्पितम् । मथनोद्रेकसम्भूतं वस्तुरूपं महाहविः ।।१०७।। हुत्वा हुत्वा स्वयं चैवं२ सहजानन्दविग्रहः । ३प्रदानैस्तर्पणैः सम्यग्वि शुद्धैरमृतात्मभिः । ४महाहन्तीकरोमीदं विश्वं हव्यवपुर्धरम्५ ।। (सु० वा० ३९) इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या अहन्तेदन्तयोरैक्यम्, अहन्ता प्रमाता, इदन्ता प्रमेयम्, तयोरैक्यं प्रमाणम्, तत्त्रितयसामरस्यात्मकम्६ । विश्वक्षिप्तपदं७प्रमेयसुभगां ब्राह्मीं महावाग्भवे८ विश्वोत्तीर्णमहा९प्रकाशवपुषं शक्तिं च१० नैसर्गिकीम् । अब आन्तर पूर्णाहूति का विवरण देते हैं— मन्त्ररूपी अरणि के मथन के उद्रेक से उत्पन्न प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण की सामरस्य वस्तुरूप महाहवि को उन्मनी नाम की स्रुचा में रखकर उसकी बार-बार आहुति दे और इस तरह से साधक सहजानन्द से परिपूर्ण हो जाय ।।१०७-१०८।। सुभगोदयवासना में शिवानन्द मुनि ने कहा है— भलीभांति शोधित होने से अमृतस्वरूप वस्तुओं के अर्पण और तर्पण से, हवि का स्वरूप धारण करने वाले इस सारे विश्व को मैं अपनी महाहन्ता में विलीन कर दे रहा हूँ ।। इसके अनुसार अहन्ता का अर्थ प्रमाता, इदन्ता का अर्थ प्रमेय और इनके ऐक्य का नाम प्रमाण होगा । इन तीनों की सामरस्य स्थिति का वर्णन किसी प्रामाणिक व्यक्ति ने इस तरह से किया है— महावाग्भव त्रिकोण में सृष्टिकर्त्री ब्राह्मी शक्ति के रूप में इस विश्वरूपी प्रमेय पदवी में प्रविष्ट होने वाली, विश्वोत्तीर्ण अवस्था में महाप्रकाश और उसकी स्वाभाविक विमर्श शक्ति के रूप में प्रमाता पदवी में स्थित रहने वाली, प्रमाण पदवी की तरफ बढ़ने पर १. मनीस्रु-ख. ने. च. छ. ज. झ. । २. चैव-च. छ. ज. झ. उ. । ३. नैदानैरिति सार्वत्रिको दी० पाठः । ४. मदहन्तां-क. ग., समाहन्तां-ख. ने. ज. झ. उ. । ५. पुरः- सरम्-क. ग. । ६. स्वरूपम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. वर-ज. झ., लसत्-ख., बसत्-ने. ब. उ. । ८. वैभवैः-ख. ब. उ., भूसरैः-ज., भूभवैः-झ. । ९. प्रमातृ- वपुषः-ख. ने. ज. झ. ब. उ. । १०. तु-ख. ने. ज. झ. ब. उ. ।

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