भारतकोश
योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

योगिनी हृदयम् (अमृतानन्दनाथ विमर्शिनी एवं पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी सविस्तार सटीक)

Yogini Hridayam with Amritanandanatha Dipika by Vraj Vallabha Dwivedi

अमृतानन्दनाथ (भाष्यकार: पं. व्रजवल्लभ द्विवेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished485 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 485 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 346

२९८ योगिनीहृदयम् [ पूजासंकेतः प्रामाण्यं १प्रवणत्रिशक्तिखचिता २मध्युष्टचातुर्दशीं ३संवित्यर्कसमिद्धवस्तुभरितो मथ्नामि ४मन्त्रारणिम् ॥ इत्यभियुक्तवचनोक्तरीत्या मन्त्रारणिमथनोद्रेकसम्भूतं तत्त्रितयसमष्टि- रूपम्५। वस्तुरूपम्, वस्तु ६द्रव्यम्, तद्रूपम् । तदुक्तं मुख्याम्नायक्रमे—“स्वीकुर्यात् सततं वस्तु यदानन्दसुखं भवेत्” इति । महाहविः। यस्मिन् हुते स्वप्रमेयक्षणे हविषि प्रमातृलक्षणं ज्योति७रनवरतं प्रज्वलति, तन्महाहविः। पूर्णाहूतिहोमे८ उन्मन्यां स्रुचि कल्पितम्। उन्मनी नाम९ पूर्वोक्त(१।३४)लक्षणा, सा स्रुगिच्युते, तस्यां स्रुचि, तन्मयेनामृतेनापूर्य पूर्णाहूतिं जुहुयात् । एवंग्रूपं हविर्हुत्वा । आनन्दं ब्रह्मणो रूपं तच्च देहे१० प्रतिष्ठितम् । तस्याभिव्यञ्जकं द्रव्यं११ योगिभिस्तेन पीयते ॥ तीन शक्तियों का स्वरूप धारण करने वाली और फिर इन सबकी सामरस्यमयी तुरीया स्थिति में रहने वाली मन्त्ररूपी अरणि को मैं ज्ञानरूपी सूर्य के प्रकाश से परिपूर्ण हो मथता हूँ ॥ इसके अनुसार मन्त्र रूपी अरणि के मथन की चरम स्थिति में प्रमाता, प्रमेय और प्रमाण की समरस दशा का उन्मीलन होता है । मुख्याम्नायक्रम में इसी के लिये कहा गया है—“साधक उसी वस्तु का ग्रहण करे, जिससे ब्रह्मानन्द सहोदर सुख की उत्पत्ति हो”। इसी को महाहवि कहते हैं। प्रमेय स्वरूप हवि की आहुति दे देने पर प्रमातृ स्वरूप ज्योति ही निरन्तर जलती रहती है, अतः इसी को महाहवि कहा जाता है। यह पूर्णाहूति होम इसी आहुति से सम्पन्न होता है । इस आहुति को उन्मनी रूपी स्रुचा में रखकर दिया जाता है । उन्मनी का स्वरूप पहले (१।३४) बताया जा चुका है । इस उन्मनी रूप स्रुचा में ऊपर बताये गये सामरस्य समुद्भूत अमृत को भर कर पूर्णाहूति दे । इसकी आहुति देने के बाद— आनन्द ब्रह्म का ही स्वरूप है । यह आनन्द इसी शरीर में छिपा हुआ है । इसका अभिव्यंजक द्रव्य (मद्य) है । इसी लिये योगी इसका पान करते हैं ॥ १. प्रणयेन श-क. ने. ज. झ. ब. उ. । २. तां मध्ये तु-क. ग., मध्युष्टचान्तर्दिशो- ज. । ३. संवित्पाकसुसिद्ध-ब. उ. । ४. तन्त्रा-क. ग. झ. उ. । ५. 'रूपम्' नास्ति-ख. ज. । ६. मद्यम्-ख. ने. ज. झ. उ. । ७. निरन्तरं-ख. ने. ज. झ. उ. । ८. होमः-क. ग. ज. । ९. नाम समनोर्ध्वे निरस्तकालकलाक्रियादिका पू-क. ग. । १०. मोक्षे-ख. ने. ज. झ. उ. । ११. मद्यं-ने. ज. उ., हव्यं-ज. ।